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समुद्र में खुदाई कर गहरे राज़ निकालता यह जहाज़
- Author, विवियन कमिंग और क्रिस्टियन डेलफ़िना
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
अंटार्कटिका महाद्वीप पूरी तरह से बर्फ़ से ढका हुआ है. सिवा बर्फ़ के दूर-दूर तक कुछ नहीं दिखता. इसे बर्फ़ीला रेगिस्तान कहा जाता है.
मगर, अंटार्कटिका पर हमेशा से ही बर्फ़ रही हो ऐसा नहीं है. आज से 12 करोड़ साल पहले अंटार्कटिका बाक़ी महाद्वीपों की तरह ही हरा-भरा और ज़िंदगी से लबरेज़ था.
उस युग को जीवाश्म वैज्ञानिक क्रिटेशियस महायुग कहते हैं. उस महायुग में अंटार्कटिक की आबो-हवा आज के सर्द माहौल से बिल्कुल अलग थी.
भारत, ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका एक दूसरे से जुड़े हुए थे. यही तीनों ज़मीनी विस्तार मिल कर दक्षिणी ध्रुव का इलाक़ा बनाते थे.
जीवाश्म वैज्ञानिक ब्रायन ह्यूबर कहते हैं कि आज अंटार्कटिका पर पुराने दौर के सुबूत तलाशना बहुत बड़ी चुनौती है. इसकी वजह ये है कि पूरा महाद्वीप बर्फ़ की मोटी परत से ढका हुआ है.
मगर इसका एक फ़ायदा ये भी है कि करोड़ों साल पहले के जीवाश्म, बर्फ़ में सुरक्षित दबे हुए हैं. ऐसे में अंटार्कटिका के गुज़रे हुए कल के बहुत से राज़ समंदर अपनी बांहों में समेटे हुए है.
अंटार्कटिका के आस-पास के समुद्री इलाक़ों में बड़ी गहराई में छुपे हुए ये राज़, अंटार्कटिका के करोड़ों साल के इतिहास को बयां करते हैं.
समुद्र में गहरी खुदाई
ब्रायन ह्यूबर कहते हैं कि साठ के दशक से ही गहरे समुद्र में खुदाई करके चट्टान की परतों में छिपे धरती के इतिहास को खंगाला जा रहा है. वैज्ञानिक मिशन पर निकला क्रूज़ शिप जोडीज़ रिजॉल्यूशन दुनिया भर के समुद्रों में गहरे छुपी चट्टानों से ये राज़ निकालने का काम करता है.
समुद्री भूवैज्ञानिक कारा बोगस बताती हैं कि ये जहाज़ हमेशा कुछ सीधे सवालों के जवाब तलाशता फिरता है. समुद्र के भीतर स्थित चट्टानों से ये पता लगाता है कि टेक्टोनिक प्लेट्स यानी धरती के गर्भ में छिपी चट्टानों की परतें किस तरह हिलती-डुलती हैं. उनसे धरती पर क्या बदलाव आते हैं. कहां तबाही मचती है और कहां ये बदलाव फ़ायदे का सौदा होते हैं.
इस जहाज़ का मिशन नंबर 369 ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका में क्रिटेशियस कल्प के दौरान के हालात पता लगाने के लिए था. ये वो युग था, जब धरती पर डायनासोर पाए जाते थे.
भूवैज्ञानिक रिचर्ज हॉब्स, जोडीस रिजॉल्यूशन पर सवार होकर तमाम वैज्ञानिक सवालों के जवाब तलाशते हैं. वो कहते हैं कि हमें धरती के इतिहास के बारे में गहरी जानकारी नहीं है. धरती के करोड़ों साल पुराने ज़्यादातर राज़ समंदर में छिपे हैं.
समंदर, धरती के दो तिहाई हिस्से में फैले हुए हैं. रिचर्ड कहते हैं कि इंसान ने अब तक समंदर का महज़ पांच फ़ीसद हिस्सा ही खंगाला है. रिचर्ड बताते हैं कि ये जहाज़ समुद्र की गहराई और तलहटी से आंकड़े जमा करने के लिए ख़ास तौर से डिज़ाइन किया गया है.
जोडीस रिजॉल्यूशन में ऐसी मशीनें लगी हैं, जो समुद्र में क़रीब चार किलोमीटर तक गहराई में जाकर चट्टानों की खुदाई कर सकती हैं. वहां से नमूने इकट्ठे कर सकती हैं. ऐसी क्षमता वाला ये दुनिया का इकलौता जहाज़ है.
रिचर्ड हॉब्स बड़े तजुर्बेकार भूवैज्ञानिक हैं. वो बताते हैं कि आज धरती की जो आबो-हवा है, वो आज से 12 करोड़ साल पहले हुई भूवैज्ञानिक घटना का नतीजा है. उस दौर में भारतीय उपमहाद्वीप का पूर्वी हिस्सा अंटार्कटिका और ऑस्ट्रेलिया से जुड़ा हुआ था. लेकिन, धरती के भीतर टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल से ये विशाल भूखंड एक-दूसरे से अलग हो गए.
ऑस्ट्रेलिया के अलग होने से निकली धारा
अंटार्कटिका और ऑस्ट्रेलिया के अलग होने का नतीजा ये हुआ कि समुद्र में एक ठंडी धारा बह चली. इसे हम ध्रुवीय समुद्री धारा या सर्कमपोलर करेंट के नाम से जानते हैं. इस सर्द समुद्री धारा से ही आज दुनिया का मौसम निर्धारित होता है. ये अंटार्कटिका महाद्वीप के इर्द-गिर्द बहती है.
समुद्र की गहराई से जो चट्टानें निकाली जाती हैं, उनमें के कीटाणुओं के जीवाश्म मिलते हैं. इनसे चट्टानों की उम्र का पता चल जाता है. यानी ये जानकारी हो जाती है कि वो धरती के किस युग से ताल्लुक़ रखती हैं.
इन चट्टानों से ये भी पता चलता है कि उस वक़्त धरती पर कैसा माहौल था.
क़िस्सा मुख़्तसर ये कि करोड़ों साल पुरानी ये चट्टानें एक ख़ुफ़िया जासूस का काम करती हैं, जो धरती पर करोड़ों साल पुराने दौर के राज़ फ़ाश करती हैं.
ब्रायन ह्यूबर कहते हैं कि अलग-अलग दौर की ये चट्टानें किसी पहेली के अलग-अलग जवाब हैं. जब इन सब को जोड़ा जाता है, तो बहुत सारे सवालों का उत्तर मिलता है. पता चलता है कि धरती का तापमान क्यों बदला.
आबो-हवा से समुद्र में पहुंची कार्बन डाई ऑक्साइड
चट्टानों की परतों से पता चलता है कि ज्वालामुखी विस्फोटों ने धरती के विकास में क्या रोल निभाया. उस दौर में चट्टानों के हिलने-डुलने से धरती पर क्या बदलाव आए. पर्यावरण कैसे बदलता गया.
समुद्र की ये चट्टानें जब एक तरतीब से रखी जाती हैं, तो ऐसे सवालों के जवाब एक-दूसरे से पिरोए जाते हैं. और हमारी धरती के विकास के उपन्यास के अध्याय तैयार होते हैं.
क्रिटेशियस युग की चट्टानों से जुटाए गए आंकड़े बताते हैं कि उस वक़्त समुद्र में कार्बन डाई ऑक्साइड की तादाद बहुत ज़्यादा थी. आबो-हवा से कार्बन डाई ऑक्साइड लगातार समुद्र के पानी में घुल रही थी. इससे उस दौर के जीवों का दम घुट रहा था. जीवों की बहुत सारी नस्लें ऐसे ही हमेशा के लिए ख़त्म हो गईं.
ब्रायन ह्यूबर कहते हैं कि उस युग के सुबूत आज के माहौल से मेल खाते हैं. हम धीरे-धीरे उसी तरह के दौर की तरफ़ बढ़ रहे हैं. आज इंसान धरती के पर्यावरण में भारी तादाद में कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ता है. ये ठीक उसी तरह है, जैसे क्रिटेशियस युग में ज्वालामुखी से निकली कार्बन डाई ऑक्साइड हवा में घुल रही थी. मगर इसकी रफ़्तार उस दौर से कई गुना ज़्यादा है.
अगर, हम ने अपनी करतूतों पर लगाम न लगाई, तो हम ऐसी आबो-हवा की तरफ़ बढ़ रहे हैं, जैसा माहौल क्रिटेशियस युग में था, जब डायनासोर आख़िरी सांसें गिन रहे थे.
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)
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