आख़िरी वक़्त पर खिलाड़ी इस्तेमाल करते हैं 'क्वाइट आई'

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- Author, डेविड रॉबसन
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
हार को जीत में बदलने का हुनर अगर सीखना है तो मशहूर अमरीकी टेनिस खिलाड़ी सरीना विलियम्स से सीखिए.
उन्होंने अपने करियर में ऐसे कई मैच खेले जब लगा कि अब बाज़ी सरीना के हाथ से निकल गई है. लेकिन आख़िरी लम्हों में उन्होंने बाज़ी पलट दी और जीत अपने नाम कर ली.
2003 में किम क्लाइसटर्स के ख़िलाफ़ ऑस्ट्रेलियन ओपन का सेमीफ़ाइनल मैच इसकी सबसे शानदार मिसाल है. आख़िरी सेट में सरीना विलियम्स 5-2 से पीछे थीं. लेकिन उन्होंने हार कर हथियार डालने के बजाय मुक़ाबला किया और फिर क्लाइसटर्स को हरा दिया.
ज़्यादातर खिलाड़ियों के करियर में ऐसे लम्हे आते हैं. लेकिन सरीना ने ऐसा कारनामा एक बार नहीं कई बार किया.
सरीना ने 2005 के ऑस्ट्रेलियन ओपन, 2009 के विम्बलडन और 2014 के चाइना ओपन में शानदार वापसी की. उन्होंने भारी दबाव में भी आख़िरी वक़्त तक उम्मीद नहीं छोड़ी बल्कि पूरा ध्यान अपने खेल पर केंद्रित किया और जीत हासिल की.

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खिलाड़ियों के साथ ऐसा क्यों होता है?
इस सवाल का जवाब मनोवैज्ञानिकों और न्यूरोसाइंटिस्ट ने ढूंढ निकाला है. इनके मुताबिक़ खेल के दौरान खिलाड़ी का दिमाग़ जीतने की रणनीति बनाता रहता है और आँखें विरोधी का दांव समझने के लिए खुली रहती हैं.
खिलाड़ी के दिमाग़ की इस स्थिति को 'क्वाइट आई' कहा जाता है. तनाव की स्थिति में दिमाग़ इस दिशा में ज़्यादा काम करता है.
मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक़, क्वाइट आई के साथ ध्यान केंद्रित करने से सिर्फ़ खिलाड़ियों को ही फ़ायदा नहीं होता बल्कि ऑपरेशन के दौरान डॉक्टरों को भी इसका फ़ायदा पहुंचता है.

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ब्रिटेन में एक्स्टर यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर सैम वाइन का कहना है कि आंख के ज़रिए हमारा दिमाग़ हालात को समझता है. फिर उसके हिसाब से फ़ैसले लेता है.
क्वाइट आई यानी तनाव में आंखों की गतिविधि का अध्ययन करने वाली काइनेसियोलॉजिस्ट जोअन विकर्स ने दी है. वो स्पोर्ट्स साइंस की छात्रा और एथलीट रह चुकी हैं. वो इस बात से हैरान थीं कि हर रोज़ खिलाड़ियों की प्रतिभा का दायरा बदल कैसे जाता है.
यूनिवर्सिटी की बास्केटबॉल टीम में खेलते हुए एक बार उन्होंने मैच के पहले ही हिस्से में करिश्माई 27 प्वाइंट बना लिए. इसी तरह वॉलीबॉल खेलते हुए टीम को ज़बरदस्त जीत दिलाई थी. लेकिन, ये दोनों ही करिश्मे सिर्फ़ एक बार ही मुमकिन हो पाए.

विकर्स सोचने लगीं कि उनमें कोई बदलाव नहीं आया. ना ही उन्होंने अपनी रणनीति बदली. तो फिर अचानक करिश्मा कैसे हुआ? और एक बार के बाद दोबारा क्यों नहीं हुआ? वो सोचने लगीं सभी बड़े खिलाड़ी अच्छे प्रदर्शन का सिलसिला बरक़रार कैसे रखते हैं?

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अनुभवी और नए खिलाड़ी में अंतर
कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलम्बिया में पीएचडी के दौरान उन्होंने खिलाड़ियों पर नज़र रखनी शुरू कर दी. एक डिवाइस के ज़रिए उन्होंने गोल्फ़ के पेशेवर खिलाड़ियों के शॉट लगाते समय आंखों की गति का मुआयना किया.
इसमें पाया गया कि माहिर खिलाड़ी के शॉट लगाने से पहले उनकी आंखें सिर्फ़ उस प्वाइंट पर ध्यान केंद्रित करती हैं, जहां उन्हें शॉट लगाना है. जबकि नौसिखिए खिलाड़ियों की आंख केंद्रित होने के बावजूद ध्यान भटकता रहता है.
विकर्स का कहना है कि मुश्किल हालात में माहिर खिलाड़ियों के सोचने की क्षमता धीमी पड़ जाती है. वो सिर्फ़ शांत आंखों से अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करते हैं.

प्रोफ़ेसर विकर्स की खोज के परिणाम निर्णायक साबित हुए. आज बास्केटबॉल, वॉलीबॉल, फुटबॉल, टेनिस, तलवार बाज़ी और आइस हॉकी के खेल के दौरान खिलाड़ियों के व्यवहार पर रिसर्च करने के लिए प्रोफ़ेसर विकर्स की रिसर्च को आधार बनाया जा रहा है.

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बताया जाता है कि नौसिखिए खिलाड़ियों की तुलना में धुरंधर 62 फ़ीसद ज़्यादा दूरी तक अपने लक्ष्य पर निशाना साधे रहते हैं.
आंखों से ध्यान केंद्रित करने के अंतर के आधार पर पूरी तरह से नौसिखिए और माहिर खिलाड़ियों के प्रदर्शन में फ़र्क़ की भविष्यवाणी करना मुश्किल है.
मैदान में सभी खिलाड़ी आंख और दिमाग़ दोनों से खेल पर ध्यान केंद्रित करते हैं. लेकिन इसी बीच किसका दिमाग़ और आंख तेज़ी से काम कर जाए कहना मुश्किल है. हालांकि, माहिर खिलाड़ी ही अक्सर बाज़ी मारते हैं.
कैमिलो सैंज मोनकालियानो नाम के एक रिसर्चर ने हाल ही में टेनिस खिलाड़ियों की क्वाइट आई का अध्ययन किया.
उनका कहना था कि ज़्यादातर खिलाड़ी जान-बूझकर अपनी आंख नहीं घुमाते बल्कि वो आदतन ऐसा करते हैं. उनका ये अमल व्यावहारिक है. लेकिन इसकी ट्रिक खिलाड़ियों को सिखाकर उनका प्रदर्शन बेहतर किया जा सकता है.

प्रोफ़ेसर विकर्स ने तो यूनिवर्सिटी की बास्केटबॉल टीम को आई ट्रैकिंग डिवाइस के ज़रिए ट्रेनिंग भी दी थी और इसके नतीजे काफ़ी सकारात्मक रहे. खिलाड़ियों के प्रदर्शन में 22 फ़ीसद सुधार हुआ.

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क्वाइट आई की ट्रेनिंग
हाल में हुई रिसर्च साबित करती है कि क्वाइट आई का ज़्यादा मज़बूत और स्थिर असर होता है. क्वाइट आई के ज़रिए प्रदर्शन बेहतर करने के मुद्दे पर यूरोपियन जर्नल ऑफ़ स्पोर्ट्स साइंस ने एक पूरा अंक निकाला था.
क्वाइट आई पर की गई रिसर्च के ज़बरदस्त नतीजों को देखते हुए अब वैज्ञानिकों ने दूसरे क्षेत्र के लोगों पर भी रिसर्च शुरू कर दी है.
मिसाल के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ़ एक्सटर ने अपनी स्टडी में पाया है कि क्वाइट आई के ज़रिए बच्चों की शारीरिक क्षमताएं बेहतर करने में मदद मिलती है. इसी तरह की रिसर्च मिलिट्री के साथ भी की गई.
प्रोफेसर विकर्स की रिसर्च से साबित होता है कि क्वाइट आई ट्रेनिंग के ज़रिए डॉक्टरों को नए हुनर आसानी से सिखाए जा सकते हैं. प्रोफ़ेसर विकर्स के ग्रुप ने माहिर सर्जन के घूरने की ताक़त को मापा. फिर उन्हें आंख घुमाने की ट्रेनिंग दी गई. देखा गया कि पारंपरिक ट्रेनिंग वाले डॉक्टरों के मुक़ाबले इनका प्रदर्शन बेहतर हुआ था.

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फ़िलहाल क्वाइट आई की ट्रेनिंग महंगी है. इसीलिए, ये आम आदमी की पहुंच के परे है. लेकिन तकनीक तेज़ी से बदल रही है.
उम्मीद की जा रही है बहुत जल्द इस ट्रेनिंग के लिए सस्ते उपकरण बना लिए जाएंगे जिससे सभी को ये ट्रेनिंग देना आसान हो जाएगा. लेकिन तब तक वैज्ञानिक अपनी थ्योरेटिकल समझ को और पुख़्ता करने में लगे हैं.
वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी उनके पास ट्रेनिंग सेशन के लिए पोर्टेबल एफएमआरआई स्कैनर नहीं हैं. जिससे तनाव के वक़्त खिलाड़ियों के दिमाग़ में क्या चल रहा होता है, ये समझने में मुश्किल आती है.
इसके अलावा तजुर्बे के दौरान अगर प्रतिभागियों में चिंता बढ़ जाती है तो उनसे सही फ़ीडबैक नहीं मिल पाता. लेकिन जिन खिलाड़ियों की ट्रेनिंग हो जाती है, वो अपने अंदर पनपने वाली नकारात्मक सोच को दरकिनार करके खेल पर ध्यान केंद्रित करते हैं.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ एक्स्टर की रिसर्च के मुताबिक़, क्वाइट आई का ताल्लुक़ पूरे शरीर में होने वाले मनोवैज्ञानिक बदलावों से भी है. मिसाल के लिए दिल की धड़कन धीमी पड़ने लगती है और शरीर के अंग अपने आप ही शिथिल होने लगते हैं. इससे पता चलता है कि क्वाइट आई से ध्यान केंद्रित करने पर शरीर और दिमाग़ मुश्किल घड़ी में भी फोकस किए रहते हैं.
यहां एक बात का और ध्यान रखना ज़रूरी है. सिर्फ़ क्वाइट आई ट्रेनिंग ही किसी खिलाड़ी को महान नहीं बनाती है बल्कि उसके साथ और भी कई चीज़ें जुड़ी होती हैं. लेकिन ये ट्रेनिंग किसी खिलाड़ी को महान बनाने में अहम रोल निभाती है इसमें भी कोई शक नहीं है.
(नोटः ये डेविड रॉबसन की मूल स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी के पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं)
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