दो डिग्री बढ़ा तापमान तो अलास्का की आधी बर्फ़ पिघल जाएगी और फिर...

जलवायु परिवर्तन

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    • Author, सारा गॉदर्ज़ी
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

धरती का तापमान तेज़ी से बढ़ रहा है. इससे ध्रुवीय इलाक़ों से लेकर अंटार्कटिका तक जमी बर्फ़ पिघल रही है. नतीजा ये कि कई द्वीपों और समुद्र तटीय शहरों के समंदर में समा जाने का ख़तरा मंडरा रहा है.

इस ख़तरे से निपटने के लिए ही दुनिया के कई देशों ने पेरिस जलवायु समझौता किया था. इसका मक़सद था धरती को गर्म करने वाली गैसों को बनने से रोकना, ताकि धरती के गर्म होने की रफ़्तार धीमी हो सके.

पेरिस समझौते से हटा अमेरिका

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अलास्का में ठंड के हालात

लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमरीका को पेरिस जलवायु समझौते से अलग कर लिया. अब शायद इसका बड़ा खामियाज़ा अमरीका के ही एक सूबे को भुगतना पड़े.

अमरीका से अलग-थलग स्थित अलास्का अमरीका का 49वां राज्य है. यहां पूरे साल भयंकर ठंड रहती है. अलास्का के ज़्यादातर हिस्से पर सदियों से बर्फ़ जमी हुई है. यहां तक कि ज़मीन के भीतर भी भयंकर ठंड की वजह से मिट्टी में बहुत से पेड़ पौधे वैसे के वैसे जमे हैं, जैसे वो सदियों पहले थे.

अलास्का में बर्फ़ीला आलम ये है कि यहां सड़कें भी बर्फ़ के ऊपर ही बना दी गईं. किसी को कभी लगा ही नहीं कि ये बर्फ़ पिघलेगी भी. मगर, अब ये यक़ीन टूट रहा है. अलास्का के कई हिस्सों में भयंकर सर्दी वाले हालात यानी पर्माफ्रॉस्ट अब बदल रहे हैं.

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पर्माफ्रॉस्ट

पर्माफ्रॉस्ट वो स्थिति है जब भयंकर ठंड और बर्फ़ीले माहौल की वजह से ज़मीन भी भयंकर सर्द हो जाती है. ऐसे माहौल में जो चीज़ जैसी है, वैसी ही रही आती है. जैसे कि अगर कोई दरख़्त मरकर ज़मीन पर गिरा, तो उसकी पत्तियां और लकड़ियां सड़ने लगती हैं.

मगर जहां पर पर्माफ्रॉस्ट होता है, वहां पर वो पेड़ गिरने के बाद वैसी ही हालत में रहता है. क्योंकि माहौल में गर्मी न होने की वजह से बैक्टीरिया उस पर काम नहीं कर पाते. इसीलिए पेड़ की लकड़ियां और पत्तियां सड़ती नहीं हैं.

अलास्का में पर्माफ्रॉस्ट के हालात न जाने कितने बरस से हैं. ज़मीन के भीतर कई मीटर की गहराई तक बेहद सर्द माहौल के हालात हैं. ठंड की वजह से मिट्टी और दूसरी चीज़ें इतनी सख़्त हैं कि नीचे खोदना भी मुमकिन नहीं.

अलास्का के जियोफ़िज़िकल इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक व्लादिमिर रोमानोवस्की

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अलास्का के हालात

लेकिन, अब ऐसा लग रहा है कि अलास्का में हालात अगले कुछ सालों में ही बदलने वाले हैं. अलास्का के जियोफ़िज़िकल इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक व्लादिमिर रोमानोवस्की के हाथ कुछ ऐसे सबूत लगे हैं, जो ये संकेत दे रहे हैं. असल में रोमानोवस्की, अलास्का में कई जगह पर ज़मीन के भीतर मशीनें लगाई हुई हैं. इन मशीनों में ज़मीन के भीतर का तापमान और हालात दर्ज होते हैं.

हाल ही में जब रोमानोवस्की ने इन मशीनों में जमा आंकड़ों की पड़ताल की, तो चौंकाने वाली बातें सामने आईं. रोमानोवस्की बताते हैं कि अलास्का में जो ज़मीन सदियों से जमी हुई थी, उस पर धरती के बढ़ते तापमान का असर दिखने लगा है. पिछले कुछ सालों में अलास्का का औसत तापमान एक डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है.

अलास्का में तापमान बढ़ने के नतीजे ख़तरनाक हो सकते हैं. यहां की सर्द मिट्टी गर्म होने पर दरकने लगी है. इससे बर्फ़ीले इलाक़ों में बनी सड़कें, गैस, तेल, पानी और बिजली की पाइपलाइनें भी फटने लगी हैं.

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कब बदलते हैं पर्माफ्रॉस्ट के हालात?

रोमानोवस्की बताते हैं कि अगर किसी इलाक़े का तापमान ज़ीरो से माइनस छह डिग्री सेल्सियस नीचे है, तो वहां के हालात बदलने का डर नहीं रहता. लेकिन अगर किसी सर्द जगह का तापमान ज़ीरो से ज़रा ही नीचे है, तो ये इस बात का संकेत है कि वहां पर्माफ्रॉस्ट के हालात बदलने वाले हैं. अलास्का में ज़मीन के भीतर लगे थर्मोमीटर यही संकेत दे रहे हैं.

यूं तो गर्मियों में अलास्का में ज़मीन की ऊपरी परत गर्मी से पिघल ही जाती है. मगर इसकी गहराई में अब तक हालात बदलने के संकेत नहीं दिखते थे. लेकिन अब तस्वीर बदल रही है. रोमानोवस्की बताते हैं कि अब अलास्का में पर्माफ्रॉस्ट के हालात बहुत दिनों के मेहमान नहीं.

वो इन संकेतों को शुभ नहीं मानते. रोमानोवस्की के मुताबिक़ ऐसा हुआ, तो अलास्का के कई गांवों को उनकी मौजूदा जगह से हटाकर कहीं और बसाना होगा. अलास्का की बहुत सी इमारतों की नींव दरक जाएगी. ज़मीन के भीतर बिछाई गई पाइपलाइनों पर भी दबाव बढ़ेगा.

बात सिर्फ़ यहीं तक रहती तो भी गनीमत थी. रोमानोवस्की तो और भी डराने वाली बात करते हैं. वो कहते हैं कि सदियों से अलास्का में पर्माफ्रॉस्ट के हालात हैं. इसलिए यहां के जीव और पेड़ पौधे सड़े नहीं. अब बर्फ़ पिघलेगी तो ये कार्बन खुले में आ जाएगा. इसकी वजह से पूरी दुनिया का तापमान बढ़ने की रफ़्तार तेज़ हो सकती है.

सड़कों में दरार

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अचानक आने लगी सड़कों में दरार

तापमान बढ़ने के बाद अलास्का के हवाई अड्डों से लेकर मकानों और दूसरी इमारतों पर ख़तरा बढ़ जाएगा. उनमें दरारे आने का डर है.

अलास्का के इंजीनियर जेफ करे कहते हैं कि पूरे अलास्का में सड़कों में दरारों की शिकायत अचानक काफ़ी बढ़ गई है. जेफ बताते हैं कि अलास्का के उत्तरी-पश्चिमी इलाक़े में पानी और सीवर की लाइनें ख़तरे में हैं. इनके टूटने की शिकायतों में इज़ाफ़ा हो गया है.

अलास्का का तापमान बढ़ने से सबसे ज़्यादा ख़तरा गांवों में रहने वालों पर मंडरा रहा है. जानकार मानते हैं कि कई ऐसे गांव हैं, जिन्हें एक जगह से ले जाकर दूसरी जगह बसाना पड़ेगा. अब इस में तो भारी लागत आएगी. और हो सकता है कि जिस जगह ये नई बस्तियां बसाई जाएं, वहां पर भी आने वाले वक़्त में हालात बदल जाएं.

ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि आख़िर अमरीकी सरकार इन गांवों को नई जगह बसाने पर पैसे ही क्यों ख़र्च करेगी, जब उसे पता है कि कुछ साल बाद फिर से ऐसा करना पड़ेगा. नई बस्तियों मे भी पानी-बिजली और दूसरी चीज़ों की किल्लत होनी तय ही है.

गांवों को अगले दस सालों में नई जगह बसाना पड़ेगा

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नई जगह बसाना पड़ेगा

अमरीका के जियोलॉजिकल सर्वे की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ अलास्का के कई गांवों को अगले दस सालों में नई जगह बसाना पड़ेगा. 300 लोगों की आबादी वाले एक गांव को नई जगह बसाने का ख़र्च क़रीब बीस करोड़ डॉलर आएगा. नई बस्ती भी कितने दिन काम आएगी, कह नहीं सकते.

रोमानोवस्की बताते हैं कि फिलहाल 70 ऐसे गांवों की पहचान की गई है, जिन्हें अगले कुछ साल में नई जगह जाना ही होगा. लेकिन नई जगह पर बुनियादी सुविधाएं अगले 25-30 साल तक चलेंगी, ये पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता.

अलास्का के सरकारी अधिकारी विलियम श्नाबेल कहते हैं कि नए निर्माण कार्य से पर्माफ्रॉस्ट के तेज़ी से पिघलने का ख़तरा है. क्योंकि सड़कें और इमारतें बनाने में बिजली ख़र्च होगी. पेड़ काटे जाएंगे. इससे तापमान और बढ़ेगा. इसका सीधा असर पर्माफ्रॉस्ट वाले इलाक़ों पर पड़ेगा, जहां ज़मीन का तापमान बढ़ना तय है.

अब अलास्का अकेले इस मुसीबत को झेलेगा, ये बात भी नहीं है. अमरीका के बाक़ी राज्यों पर भी इसका असर होगा ही. बाक़ी दुनिया पर भी अलास्का का तापमान बढ़ने का असर दिखेगा.

हालात आज से तीन गुने ज़्यादा ख़राब होंगे

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...तो आधा से ज़्यादा बर्फ़ पिघल जाएगा

धरती का तापमान दो डिग्री सेल्सियस भी बढ़ा, तो अलास्का की आधी से ज़्यादा बर्फ़ पिघल जाएगी. ज़मीन की अकड़ कम हो जाएगी. बैक्टीरिया सक्रिय हो जाएंगे. इससे जितना कार्बन खुले माहौल में मिलेगा, उससे धरती की आबो-हवा और ज़हरीली हो उठेगी. धरती का तापमान और बढ़ने लगेगा.

रोमानोवस्की कहते हैं कि सन् 2100 के आते-आते अलास्का में ज़मीन के पांच मीटर अंदर तक गर्मी पहुंच जाएगी. इससे ज़मीन में दबा कार्बन खुले में आ जाएगा. इससे हवा में कार्बन डाई ऑक्साइड और मिथेन गैसें घुलेंगी.

जानकार कहते हैं कि आज से क़रीब पांच करोड़ साल पहले जब धरती का तापमान अचानक बढ़ा था, तो उसके पीछे इन्हीं गैसों यानी कार्बन डाई ऑक्साइड और मीथेन के माहौल में घुलने का हाथ था.

अलास्का में मौजूद सारा कार्बन माहौल में मिला, तो हालात आज से तीन गुने ज़्यादा ख़राब होंगे.

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जीवों पर भी पड़ रहा असर

अब अगर अलास्का में पर्माफ्रॉस्ट के हालात बिगड़े, तो इन्हें एक पीढ़ी में तो नहीं ही संभाला जा सकता. फिर से पर्माफ्रॉस्ट के हालात बनाने के लिए हमें धरती को गर्म होने से रोकना होगा. ये काम तो पेरिस के जलवाय समझौते के बस का भी नहीं.

ग्लोबल वार्मिंग का असर अलास्का के जीवों पर भी पड़ रहा है. यहां के डेनाली नेशनल पार्क में काम करनेवाली एना मूर एक दिलचस्प बात बताती हैं.

एना कहती हैं कि पहले यहां पाए जाने वाले खरहे, मौसम के हिसाब से रंग बदले थे. बर्फ़ीले माहौल में वो सफ़ेद नज़र आते थे. वहीं गर्मी आने पर उनका रंग भूरा हो जाता था. लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा.

जानवरों को बचाने पर फिलहाल कोई ध्यान नहीं दे रहा

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ग्लोबल वार्मिंग के बुरे असर से जानवरों को बचाने पर फिलहाल कोई ध्यान नहीं दे रहा.

ग्लोबल वार्मिंग के ख़तरों को देखते हुए, अलास्का के लोगों को अपने भविष्य की फिक्र सता रही है. हमें भी उनकी फिक्र में साझीदार होना चाहिए. क्योंकि अलास्का का तापमान बढ़ा, तो इससे पूरी दुनिया पर असर पड़ेगा.

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