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इंडिया को यूं लिखना-पढ़ना सिखा रहा है बॉलीवुड!
- Author, प्रीति सेलियन
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
2011 की जनगणना के मुताबिक़, भारत में 78 करोड़ लोग साक्षर हैं. मगर आप ये जानकर हैरान हो जाएंगे, कि इनमें से क़रीब 40 करोड़ लोग ऐसे थे, जो बमुश्किल अपना नाम लिख पाते थे. यानी ये सिर्फ़ नाम के पढ़े-लिखे हैं.
जब देश की एक तिहाई आबादी निरक्षर हो और एक तिहाई आबादी सिर्फ़ नाम की पढ़ी-लिखी तो वाक़ई फ़िक्र की बात है.
सरकार और तमाम स्वयंसेवी संगठन लोगों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं, ताकि लोग दस्तख़त करने के सिवा पढ़ने-लिखने के और भी काम ख़ुद से कर सकें.
इस काम में टीवी काफ़ी मददगार हो सकता है.
आप पूछेंगे, वो कैसे?
इसका भी जवाब मिलेगा. ज़रूर मिलेगा.
अब ये तो कमोबेश सब को पता है कि हिंदुस्तान के लोग फ़िल्मों के दीवाने हैं. सिनेमाघरों में जाकर फ़िल्में देखते हैं. टीवी पर फ़िल्में देखते हैं और गाने सुनते हैं. आज टेलिविज़न देश में मनोरंजन का सबसे बड़ा ज़रिया है.
पढ़े-लिखे हों या निरक्षर, सभी टीवी देखते हैं.
ऐसी ही एक महिला हैं महाराष्ट्र की यशोदा लक्ष्मण केनी. यशोदा रोज़ाना कई घंटे टीवी देखती थीं. टीवी देखते-देखते वो अच्छा-ख़ासा पढ़ने-लिखने लगी हैं. जबकि पहले वो बमुश्किल अपना दस्तख़त कर पाती थीं.
असल में टीवी देखते वक़्त जो गाने चलते थे, उनके गीत के बोल भी टीवी स्क्रीन पर लिखे हुए आते थे. उनको पढ़ने की कोशिश करते-करते यशोदा को काफ़ी कुछ पढ़ना और लिखना आ गया.
देश में जो 78 करोड़ लोग साक्षर हैं, वो रोज़ाना औसतन 3 घंटे टेलीवीज़न देखते हैं. बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो गुजराती, मराठी या दूसरी देसी भाषाएं बोलते-समझते हैं. मगर वो बॉलीवुड फ़िल्मों के भी शौक़ीन हैं.
ऐसे में बहुत से टीवी चैनल उनके लिए सब-टाइटल वाले गाने प्रसारित करते हैं. यानी जब गाने चलते हैं, तो उनके बोल भी स्थानीय भाषा में लिखकर स्क्रीन पर चलते रहते हैं. यशोदा जैसे बहुत से लोग हैं, जो इन बोलों को पढ़कर, अपनी पढ़ाई का स्तर बेहतर कर रहे हैं.
जैसे गुजरात की छायाबेन सोंधा. वो सिर्फ़ गुजराती समझ पाती थीं. लेकिन वो टीवी पर रोज़ रंगोली नाम का कार्यक्रम देखती थीं. रंगोली के प्रसारण में वो गाने के बोल पढ़ने की कोशिश करने लगीं. धीरे-धीरे उनकी पढ़ाई काफ़ी सुधर गई. अब छायाबेन अपने बहुत से फॉर्म ख़ुद भर लेती हैं.
साफ़ है कि देश के क़रीब चालीस करोड़ निरक्षर लोगों के लिए टेलीवीज़न, साक्षरता का बड़ा ज़रिया बन सकता है.
भारत में ऐसे बहुत से लोग हैं जो होमवर्क में अपने बच्चों की मदद नहीं कर पाते. डॉक्टर का पर्चा नहीं पढ़ पाते. सरकारी योजनाओं की जानकारी नहीं हासिल कर पाते. या फिर अख़बारों में निकली नौकरियों के विज्ञापन नहीं देख पाते.
ऐसे लोग स्कूल के अलावा कहीं और जाकर पढ़ सकें, इसकी सख़्त ज़रूरत महसूस की जा रही है.
ऐसे लोगों की मदद प्लैनेटरीड नाम की स्वयंसेवी संस्था कर रही है. ये संस्था सेम लैंग्वेज सबटाइटलिंग (SLS) के ज़रिए टीवी देखने वाले लोगों को साक्षर बना रही है.
सेम लैंग्वेज सबटाइटलिंग क्या है?
SLS के तहत टीवी स्क्रीन पर उस कार्यक्रम के बोल स्थानीय भाषा में लिखकर आते हैं, जो उस वक़्त चल रहा होता है. यानी दर्शक, टीवी देखने के साथ पढ़ भी सकते हैं. कई मुश्किल शब्द लोग इसी तरह सीख जाते हैं. बार-बार वही शब्द देखते हुए दर्शकों को वो याद हो जाते हैं.
प्लैनेटरीड के संस्थापक बृज कोठारी कहते हैं कि लोग कोशिश कर के नहीं पढ़ते. बल्कि वो गाने और बोल के बीच तालमेल बिठाते हुए पढ़ने लगते हैं.
इटली में हुए एक रिसर्च के मुताबिक़ टीवी स्क्रीन पर सबटाइटल लिखने से देखने वालों को समझने में आसानी होती है.
वहीं, प्लैनेटरीड का दावा है कि सबटाइटल की वजह से लोग ख़ुद ब ख़ुद पढ़ने की तरफ़ खिंचते हैं. अगर किसी कार्यक्रम के बोल स्क्रीन पर लिखे आते हैं, तो आम तौर पर लोग उसे पढ़ते ही हैं.
ब्रिटेन की नॉटिंगम यूनिवर्सिटी के मुताबिक़ जो लोग SLS यानी सबटाइटल वाले कार्यक्रम देखते हैं, वो दूसरों के मुक़ाबले ज़्यादा पढ़-लिख सकते हैं.
बृज कोठारी ने 1996 में गांवों, रेलवे स्टेशनों और स्लम का दौरा किया था. वो अपने साथ दो स्क्रीन लेकर गए थे. एक सबटाइटल के साथ वाली स्क्रीन थी.. जबकि दूसरी उसके बग़ैर थी.
बृज बताते हैं कि ज़्यादातर लोगों ने सबटाइटल वाली स्क्रीन देखना पसंद किया. इसी के बाद उन्हें टीवी पर सबटाइटल के ज़रिए लोगों को साक्षर बनाने का आइडिया आया.
कोठारी चाहते हैं कि सरकार हर निजी चैनल के लिए सबटाइटल वाले कार्यक्रमों का प्रसारण अनिवार्य कर दे. हालांकि फिलहाल ऐसा हो नहीं पाया. लेकिन अगर सरकार ये क़दम उठाती है, तो देश की आबादी के बड़े हिस्से को इससे फ़ायदा होगा.
SLS कार्यक्रम की शुरुआत 1999 में हुई थी. 2002 में दूरदर्शन पर आधे घंटे के बॉलीवुड फ़िल्मों के गाने वाले कार्यक्रम में बोल, स्क्रीन पर लिखकर आने लगे थे. कुछ ऐसे शो भी हैं जो हफ़्ते में 10 बार प्रसारित होते हैं. इससे साक्षरता अभियान को काफ़ी मदद मिली है.
'साक्षरता अभियान से सस्ता विकल्प'
बृज कोठारी बताते हैं कि सबटाइटल वाले गाने देखने वालों के बीच अख़बार पढ़ने वालों में 70 फ़ीसद का इज़ाफ़ा हुआ है. सबटाइटल वाले टीवी कार्यक्रम देखने वाले 3 से 5 साल में आसानी से पढ़ना सीख जाते हैं.
प्लैनेटरीड का कहना है कि ये किसी भी साक्षरता अभियान से सस्ता विकल्प है. 50 हफ्ते के टीवी कार्यक्रमों के सबटाइटल बनाने में सालाना सिर्फ़ 10 लाख डॉलर का ख़र्च आएगा. जो कि दूसरे अभियानों के ख़र्च से बहुत कम है.
पर दिक़्क़त ये है कि न तो सरकार इस प्रस्ताव को लेकर गंभीर है, और न ही दूसरी स्वयंसेवी संस्थाओं ने इसे ज़्यादा भाव दिया है.
वहीं टीवी चैनलों का मानना है कि इससे दर्शक का ध्यान भटकेगा. इसलिए वो सबटाइटल लगाने को तैयार नहीं. जबकि बृज कोठारी का दावा है कि 90 फ़ीसद दर्शक किसी भी कार्यक्रम को सबटाइटल के साथ देखना पसंद करेंगे.
कुछ निजी चैनल पैसे के एवज में SLS करने को तैयार हैं. क्योंकि वो इसे कॉपीराइट का मामला मानते हैं.
कुछ लोग ये भी कहते हैं कि गाने के बोल बड़ी तेज़ी से स्क्रीन से गुज़र जाते हैं. इससे इन्हें पढ़ने में दिक़्क़त होती है. लेकिन बृज कोठारी कहते हैं कि लोग मज़े लेकर सबटाइटल पढ़ते हैं.
मिल गई सैद्धांतिक मंज़ूरी
प्लैनेटरीड ने प्रोजेक्ट DRUV के तहत साक्षरता का साझा अभियान चलाया हुआ है. इस प्रोजेक्ट के तहत लोगों को वेब कंटेंट सबटाइटल के साथ मुहैया कराया जा रहा है. इसे टीवी पर भी दिखाया जा सकता है. फिलहाल ये कार्यक्रम राजस्थान के क़रीब पांच हज़ार घरों तक पहुंचाया जा रहा है.
बृज कोठारी की संस्था को USAID, विश्व बैंक और अमरीकी लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस से काफ़ी मदद मिल रही है. इससे वो क़रीब दो करोड़ दर्शकों तक सबटाइटल वाले कार्यक्रम पहुंचा पा रहे हैं.
अच्छी बात ये है कि इस साल जुलाई में भारत सरकार ने भी कोठारी के प्रस्ताव को सैद्धांतिक तौर पर ही सही, मंज़ूरी दे दी है. साथ ही कोठारी ने कहा है कि सरकार ऐसा क़ानून बनाए कि तमाम प्रसारण कंपनियां अपनी कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी यानी CSR के तहत कमाई का एक फ़ीसद हिस्सा SLS यानी कार्यक्रमों की सबटाइटलिंग में ख़र्च करें.
तब टीवी देखते-देखते पढ़ना-लिखना सीख जाएगा इंडिया!
(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)
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