स्वाद असली का मतलब ये नहीं कि चीज़ भी असली हो

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- Author, वेरोनिक ग्रीनवुड
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
हिंदुस्तानी लोगों को देसी खाने और देसी ज़ायके ज़्यादा पसंद आते हैं. इसकी एक वजह ये भी है कि यहां हर तरह का खाना और स्वाद लोगों को मिल जाता है.
यहां खाना बनाने के लोगों के देसी अंदाज़ हैं. सबका अपना अपना तरीक़ा है. लेकिन खाने का बाज़ारीकरण बढ़ जाने के चलते खान-पान में कुछ नए तरह के स्वाद भी चखने को मिलने लगे हैं. खानों का स्वाद बढ़ाने के लिए उनमें तरह-तरह की दूसरी चीज़ें मिलाई जाती हैं.
मसलन, बाज़ारों में आज बहुत तरह के जूस मौजूद हैं. लेकिन ये ज़रूरी नहीं कि जिस फल या सब्ज़ी का जूस आप पी रहे हैं, वो उसी फल या सब्ज़ी का है. उसमें स्वाद को बढ़ाने के लिए बहुत सी चीज़ें मिला दी जाती है. जैसे, बाज़ार में जितने भी आम के जूस बनाए जा रहे हैं, उसमें कद्दू का इस्तेमाल होता है. लेकिन उनकी ख़ुशबू और ज़ायक़ा एकदम आम जैसा लगता है.
गाजर तो आप सभी ने खाई होगी. हम अपने बाज़ार में सर्दी के मौसम में हर सब्ज़ी वाले के पास गाजर का ढेर लगा देखते हैं. हमारे देश में ज़्यादातर लाल रंग की गाजर की पैदावार है. इसके अलावा नारंगी और बैंगनी रंग वाली गाजर भी खूब दिखने लगी है. हालांकि ये भारत की पैदावार नहीं है.
विदेशों में बैंगनी गाजर को सेहत के लिए अच्छा माना जाता है. इसका बैंगनी रंग एंथोसियानिन्स की वजह से होता है. जो कि कैंसर जैसी बीमारी से लड़ने में बहुत कारगर है. इसके अलावा भी इसमें और बहुत से गुण होते हैं, जिसके लिए लोगों को इसे खाने की सलाह दी जाती है. एंथोसियानिन्स गाजर, ब्लैक राइस, ब्लू बेरी और सर्दी के मौसम में पैदा होने वाली बहुत तरह की पत्तियों में भी पाया जाता है.

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एंथोसियानिन्स के औषधीय गुणों के कारण ही यूरोपीय यूनियन और ब्रिटेन में इस रंग वाले फलों और सब्ज़ियों को दूसरे तरह के फलों और सब्ज़ियों के जूस में शामिल करने की इजाज़त दी गई है.
अब चूंकि कंपनियां कम लागत लगाकर ज़्यादा से ज़्यादा पैसा कमाना चाहती हैं, लिहाज़ा उन्होंने लोगों की आंख में धूल झोंकना शुरू कर दिया.
वैज्ञानिकों ने एक ऐसी दही का टेस्ट किया. जिसके लिए दावा किया गया था कि उसमें पेरू में पाई जाने वाली एक बेर का इस्तेमाल हुआ है. जबकि रिसर्च में पता चला कि उसमें बैंगनी भुट्टे का इस्तेमाल किया गया था.
ये चालबाज़ी है
लेकिन अब इस धोखाधड़ी पर लगाम लगाने के लिए सरकारें भी सख़्ती बरत रही हैं. फ्रूट जूस और खान-पान की दूसरी चीज़ों के बारे में यूरोपीय यूनियन के नियम एकदम अलग हैं.
इनके मुताबिक़, कंपनियों को जूस की बोतल पर ये साफ़ लिखना होगा कि उसमें कौन से फलों का, कितनी मात्रा में इस्तेमाल किया गया है. अगर सेब के जूस में सेब का इस्तेमाल कम करके दूसरे फल या पाउडर मिलाकर सेब का स्वाद पैदा किया गया है, तो इसे सेब का जूस नहीं कहा जा सकता.
जिस किसी भी चीज़ का इस्तेमाल सबसे ज़्यादा हुआ है उसी के नाम पर जूस का नाम रखा जाएगा. कंपनी को ये बात साफ़ तौर पर बोतल के लेबल पर लिखनी होगी.

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दरअसल ज़्यादातर कंपनियां ये चालबाज़ी करती हैं कि वो महंगे फलों का जूस सस्ते दामों में देने का दावा करती हैं. लेकिन वो सिर्फ़ दावा ही होता है. असल चीज़ बोतल से ग़ायब होती है. मिसाल के लिए लीची, आम वग़ैरह के जूस में कुछ हद तक सेब भी मिला लिया जाता है. लिहाज़ा जूस का नाम फिर उसी आधार पर तय किया जाना चाहिए.
इसके अलावा जूसों में बहुत तरह की ख़ुशबुओं का इस्तेमाल भी होता है. जो ये भ्रम पैदा करते हैं कि जूस ताज़ा फलों से तैयार किया गया है.
उपभोक्ता रखें ध्यान
बच्चों के लिए टॉफ़ी बनाने वाली कंपनी जेली बेली ने बच्चों के लिए एक पंपकिन पाई जेली तैयार की थी. शुरूआती दौर में तो ये कामयाब हुई. लेकिन बाद में इसकी मक़बूलियत कम होने लगी. माना जाने लगा कि जिस तरह इसे बनाने का दावा किया गया है, ये वैसी तैयार नहीं हुई है. लिहाज़ा पंपकिन पाई को बाज़ार से हटा लिया गया.

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2014 में एक बार फिर कंपनी ने इसे नए अंदाज़ में बाज़ार में उतारा. खाने वालों को ये एहसास दिलाया गया कि इस बार इसे उसी अंदाज़ में बनाया गया है जिस अंदाज़ में लोग इसे खाना चाहते हैं. लिहाज़ा कहा जा सकता है कि कंपनियों को अपने उपभोक्ताओं को भरोसे में लेना ज़रूरी है. वो जिस चीज़ का दावा करें वही चीज़ उन्हें सौंपी जाए.
अब नियमों की ये सख़्ती पश्चिमी देशों में ज़्यादा हो रही है. तो, वहां के खान-पान को लेकर लोग जागरूक भी हो रहे हैं. हमारे देश में तो अभी भी बहुत से नियमों या नए रिसर्च की जानकारी ही नहीं है. लिहाजा अक्सर ग्राहक मूर्ख बनाए जाते हैं.
बेहतर होगा कि हम इसके बारे में जानकारी बढ़ाएं और ग्राहकों के अधिकार को लेकर बड़ी लड़ाई छेड़ें.
(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)
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