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वो शख्स जिसकी मदद से दुनिया ने अंधेरे में देखा
- Author, निक फ़्लेमिंग
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
दुनिया की आबो-हवा बिगड़ रही है. पर्यावरण का संतुलन बेतरतीब हो रहा है. इसकी बड़ी वजह है क़ुदरती संसाधनों का बेरोक-टोक इस्तेमाल. बिजली-पानी से लेकर खाने-पीने तक के सामान की बर्बादी, पर्यावरण का संतुलन बिगड़ने की बड़ी वजह हैं. अब मिसाल के तौर पर हम अपने घर को ही ले लें.
छोटी-छोटी गड़बड़ियों की वजह से हमारे घरों में बिजली का ज़्यादा इस्तेमाल होता है. इसका दोहरा नुक़सान होता है. बिजली का बिल भी ज़्यादा आता है. और, बिजली की खपत भी बढ़ती है. अब अगर ये बिजली गैस, तेल या कोयले से बनाई जा रही है, तो उसे बनाने का ख़र्च बढ़ता है.
फिर इसमें जो क़ुदरती संसाधन इस्तेमाल होते हैं, उनका ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल होता है. हम अपने घर में छोटे-छोटे एहतियात बरतकर बिजली की खपत को कम कर सकते हैं. ब्रिटेन के ब्रायन हार्पर इन दिनों यही काम कर रहे हैं. वो थर्मल इमेजिंग मशीन के ज़रिए पता लगाते हैं कि हमारे घर में ऐसी कौन सी गड़बड़ियां हैं.
इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन
इनके चलते बिजली की खपत ज़्यादा हो रही है. ब्रायन हार्पर जिस थर्मल इमेजिंग तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, उसे उन्होंने ही पचास साल पहले ईजाद किया था. इसकी मदद से आप अंधेरे में भी देख सकते हैं. ब्रायन ने इस तकनीक को पहले मिलिट्री के लिए ईजाद किया था.
थर्मल इमेजिंग तकनीक का आविष्कार 1929 में हंगरी के वैज्ञानिक कलमान तिहानी ने किया था. इसकी मदद से उन्होंने दुनिया का पहला इन्फ्रा-रेड कैमरा बनाया था. इन्फ्रा-रेड असल में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन होता है. यानी ये ऐसी रेडियोएक्टिव किरणे होती हैं, जिन्हें इंसान देख नहीं सकता.
हां वो इसकी गर्मी ज़रूर महसूस कर सकते हैं. जितना ही वो गर्म महसूस करेंगे, उतना ही रेडिएशन निकलेगा. इन्हीं रेडियोएक्टिव किरणों को थर्मल इमेजिंग कैमरे से कैप्चर किया जाता है. इसी तकनीक की मदद से अंधेरे में भी देखा जा सकता है. किसी भी जानवर या इंसान को इस तकनीक से अंधेरे में पकड़ा जा सकता है.
थर्मल इमेजिंग कैमरा
सबसे पहले दूसरे विश्व युद्ध में जर्मन सेना ने इस तकनीक का इस्तेमाल किया था. तब से तमाम सेनाएं इस तकनीक का इस्तेमाल जंग में करती आ रही हैं. ब्रिटेन में इस तकनीक को बेहतर बनाने के लिए वोर्सेस्टरशायर में रॉयल रडार एस्टैब्लिशमेंट की स्थापना की गई थी. ब्रायन हार्पर ने इसमें एक छात्र के तौर पर दाखिला लिया था.
1970 के दशक में जो सेंसर इन्फ्रारेड कैमरों में इस्तेमाल होते थे. उनको माइनस 200 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा करना पड़ता था. इसके लिए लिक्विड नाइट्रोजन की ज़रूरत होती है. ये बड़े-बड़े कैमरे थे, जो इस्तेमाल करने में मुश्किलें पेश करते थे. साथ ही इनकी क़ीमत भी काफ़ी ज़्यादा होती थी.
1980 में सेना की नौकरी छोड़ने के बाद ब्रायन ने हाथ में थामे जा सकने वाला थर्मल इमेजिंग कैमरा ईजाद किया था. इसका नाम उन्होंने स्टारसाइट रखा. इससे तापमान नापा जा सकता था. इसकी मदद से बिजली के उपकरणों में गड़बड़ी का पता लगाया जा सकता था. सामान की गुणवत्ता परखी जा सकती थी.
चीज़ प्रोजेक्ट
बीमारियों का पता लगाने से लेकर ड्रग तस्करों को पकड़ने तक में इसका इस्तेमाल होने लगा था. नासा ने ब्रायन के इस कैमरे का 1988 में ऑर्डर दिया था. इससे जलती हुई हाइड्रोजन को देखा जा सकता था. 1990 के दशक के आते आते ब्रायन ने अपने काम का फ़ोकस ऐसे घर बनाने पर कर दिया, जहां बिजली की खपत कम हो.
वो ऐसे घर बनाने की वक़ालत करने लगे जो कुछ हद तक अंडरग्राउंड हों. इससे बिजली की काफ़ी बचत होती है. इस तजुर्बे की शुरुआत ब्रायन ने वोर्सेस्टरशायर में पहाड़ी पर बने अपने मकान से की थी. ब्रायन का घर, घर कम और एक लैब ज़्यादा लगता है. उनके मकान में तहखाने में बनी छह वर्कशॉप हैं. जिसमें तरह-तरह की मशीनें लगी हुई हैं.
अपना घर दुरुस्त करने के बाद ब्रायन ने ये तजुर्बा डेवॉन और मालवर्न नाम के क़स्बों में बने कुछ घरों में किया. ब्रायन और उनके साथी 'चीज़' (Cold Homes Energy Efficiency Survey Expedts) के नाम से एक प्रोजेक्ट चला रहे हैं. जिसमें लोगों के घरों में बिजली की खपत घटाने की कोशिश की जा रही है.
सॉफ्टवेयर इंजीनियर
ब्रायन के साथ इस प्रोजेक्ट में टीवी प्रोड्यूसर माइक एंड्र्यूज और सॉफ्टवेयर इंजीनियर जेरेमी बिर्च भी जुड़े हैं. ये लोग थर्मल इमेजिंग के ज़रिए पता लगाते हैं कि घर के किन हिस्सों से ऊर्जा बेवजह निकल जा रही है, जिससे बिजली की खपत बढ़ रही है. फिर वो उसे दुरुस्त करने के तरीक़े बताते हैं.
सबसे पहले इन लोगों ने ब्रिस्टॉल शहर में गूगल स्ट्रीट व्यू की तरह हीटव्यू नाम का एक नक़्शा बनाया. इसमें ब्रिस्टॉल के रहने वाले अपने घर और अपने पड़ोसियों के घर के सामने के तापमान का पता लगा सकते हैं. इन लोगों ने एक सॉफ्टवेयर बनाया, जिसे आई-फ़ोन में लगाया जा सकता है.
इससे थर्मल इमेजिंग का ख़र्च 5 हज़ार पाउंड से घटकर 350 पाउंड आ गया. प्रोजेक्ट से जुड़े टीवी प्रोड्यूसर माइक एंड्र्यूज़ बताते हैं कि जब तक लोग अपनी आंखों से नहीं देख लेते, वो बिजली की बर्बादी की बात पर यक़ीन नहीं करते. थर्मल इमेजिंग तकनीक सच को उनके सामने रख देती है.
ब्रिटिश सरकार
चीज़ प्रोजेक्ट के तहत ब्रिस्टॉल के लोगों को 2015-2016 की सर्दियों में अपने घर पूरी रात गर्म रखने को कहा गया. सर्वे के दौरान उनके बंद घरों के सामने के दरवाज़े खोल दिए गए. इस दौरान बाहर निकली एनर्जी को थर्मल इमेजिंग के ज़रिए कैमरे में क़ैद करके उन्हें दिखाया गया.
इस दौरान लोगों की खिड़कियों के सूराख और दरवाज़ों के बीच की दरारों के ज़रिए निकलती ऊर्जा को थर्मल इमेजिंग कैमरे की मदद से दिखाया गया. सर्वे के बाद पता चला कि 73 फ़ीसद लोगों ने अपने घरों में बताई गई दिक़्कतें ठीक कराईं. जबकि कुल 94 फ़ीसद लोगों ने कहा कि वो अपने घर की गड़बड़ियों को दुरुसत करा लेंगे.
चीज़ प्रोजेक्ट के अलावा भी कई सरकारी योजनाओं से बिजली बचाने की अलख जगाई जा रही है. 2013 में ब्रिटिश सरकार ने ग्रीन डील के नाम से योजना शुरू की थी. इसमें लोगों को अपने घरों में बदलाव कराने के लिए क़र्ज़ दिया जाता है, ताकि वो बिजली का नुक़सान रोक सकें. इस क़र्ज़ को बिजली बिल भरते हुए चुकाया जा सकता था.
पर्यावरण की फिक्र
पिछले दो सालों में ब्रायन के चीज़ प्रोजेक्ट ने 110 सर्वे किए हैं. वो अब कनाडा के वैंकूवर शहर में भी लोगों को बिजली बचाने के लिए जागरूक कर रहे हैं. हार्पर मानते हैं कि अगले पांच सालों में क़रीब 20 शहर ऐसे सर्वे कराकर बिजली बचाने की मुहिम का हिस्सा बनेंगे.
ब्रायन हार्पर कहते हैं कि लोगों को सिर्फ़ पर्यावरण की फिक्र करने का भाषण देने से बात नहीं बनेगी. उन्हें समझाना पड़ेगा. बदलाव करने में उनकी मदद करनी होगी. उन्हें ये बताना होगा कि बिजली बचाकर वो धरती का और अपना कितना भला कर सकते हैं.
इससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम होगा. धरती की बिगड़ती आबो-हवा को कुछ बेहतर किया जा सकेगा.
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