जानवर जिसकी सबसे ज़्यादा स्मगलिंग होती है

    • Author, डेविड रॉबिसन
    • पदनाम, बीबीसी फ्यूचर

क्या आपको मालूम है दुनिया में सबसे ज़्यादा किस जानवर की तस्करी होती है?

इस जानवर का नाम है पैगोंलिन. पश्चिमी देशों में बहुत से लोग इसके बारे में नहीं जानते थे. लेकिन अब वहां ज़्यादातर लोग इसके बारे में जानते हैं. क्योंकि ये जानवरों की तस्करी के लाखों डॉलर के अवैध धंधे में शामिल हो गया है. पैंगोलिन की बड़े पैमाने पर तस्करी की जा रही है. लेकिन कुछ इसके चाहने वाले हैं जो इसे बचाना चाहते हैं.

पैंगोलिन एक चींटीखोर जानवर है, जो इस धरती पर स्तनधारी और रेप्टाइल यानी सांप-छिपकली जैसे जानवरों के बीच की कड़ी है.

पैंगोलिन एशिया और अफ्रीका के कई देशों में पाए जाते हैं. इसके ऊपर ब्लेडनुमा प्लेट्स की परत होती है. इसकी चमड़ी पर लगी ये प्लेट्स बेहद मज़बूत होती हैं. ये इतनी मज़बूत होती है कि अगर शेर चीता भी इस पर अपने दांत गड़ा दे तो भी इस पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

इससे किसी को नुक़सान नहीं पहुंच सकता. क्योंकि ये खुद बहुत शर्मीले मिज़ाज का होता है. ये ज़्यादातर अपने बिल में रहते हैं या फिर खोखले हो चुके पेड़ों को अपनी पनाहगाह बनाते हैं. और रात के वक़्त ही खाने की तलाश में बिल से बाहर निकलते हैं.

यही वजह है कि इनके बचाने की मुहिम में जुटे लोग भी पैंगोलिन को कम ही देख पाते हैं. लेकिन शिकारियों की नज़र से ये खुद को नहीं बचा पाते. वो इसके पैरों के निशान का पीछा करते हुए इसके बिल तक पहुंच जाते हैं.

आज सारी दुनिया में पैंगोलिन की तस्करी की जा रही है. ख़ास तौर से चीन और वियतनाम में दवाएं बनाने और मांस के लिए इनकी बहुत मांग है.

चीन और वियतनाम के कई रेस्टोरेंट में पहले ज़िंदा पैंगोलिन की मेहमानों की टेबल पर नुमाइश की जाती है. फिर उन्हीं के सामने इसे काटा जाता है, ताकि इसके गोश्त के ताज़ा होने का यक़ीन दिलाया जा सके.

जानकारों का कहना है कि पिछले दस सालों में क़रीब दस लाख पैंगोलिन की तस्करी पूरी दुनिया में हो चुकी है.

ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक ये दुनिया का सबसे ज़्यादा तस्करी किया जाना वाला जानवर बन चुका है.

वैसे भी इस प्रजाति की संख्या काफ़ी कम हो चुकी है और मांग में लगातार इज़ाफ़ा हो रहा है. अगर इसी तरह तस्करी होती रही तो वो दिन दूर नहीं जब ये जानवर धरती से लुप्त हो जाएगा. पर्यावरण पर इसका क्या असर होगा कहना मुश्किल है.

पैंगोलिन चींटिया खाते हैं. एक अंदाज़े के मुताबिक एक पैंगोलिन साल में करीब सात करोड़ चींटियां खा लेता है. वो चींटियां जो फसलों के लिए नुक़सानदेह हो सकती हैं. साथ ही हाथी, दरयाई घोड़े, और शेरों के लिए भी बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती हैं.

लेकिन तस्करों को ये बात समझ नहीं आती. वो तो सिर्फ पैसा कमाने से मतलब रखते हैं.

हांगकांग में तरह-तरह के जानवरों का मीट सबसे ज़्यादा खाया जाता है. यहां दुनिया भर में ख़त्म हो रहे जानवरों को तस्करी के ज़रिए लाया जाता है. कुछ खास जानवरों का गोश्त खाना तो यहां अमीर होने की निशानी माना जाता है. जैसे यहां शार्क का गोश्त बहुत महंगे दाम पर बिकता है.

माना जाता है कि राजा-महाराजाओं के यहां शार्क का गोश्त खास पकवानों में गिना जाता था और अब लोग अपना जलवा दिखाने के लिए इसका गोश्त खाते हैं.

इसके अलावा इन जानवरों के शरीर के बहुत से हिस्सों का दवाओं में भी इस्तेमाल होता है. जैसे शार्क के पर और पेट का इस्तेमाल जोड़ों के दर्द की दवा बनाने में किया जाता है.

कुछ जानवरों के शिकार की अधिकारिक तौर पर इजाज़त है. कुछ पर पाबंदी लगी है. लेकिन उनकी मांग ज़्यादा है, लिहाज़ा उनकी तस्करी की जाती है. मिसाल के लिए तोतोआबा नाम की मेक्सिकन मछली के आयात पर पाबंदी है. लेकिन इसकी तस्करी में उतना ही फायदा है जितना कि कोकीन की स्मगलिंग में.

चीन में मेडिकल साइंस की प्रैक्टिस करने वालों का कहना है कि पैंगोलिन की चमड़ी केरेटिन से बनी होती है. बहुत सी बीमारियों के इलाज में इसकी मदद ली जा सकती है.

साथ ही पैंगोलिन ज़मीन खोदते हैं तो शरीर में होने वाले ब्लॉकेज को खोलने में इनकी मदद ली जा सकती है. कुछ शोधकर्ताओं का तो ये भी कहना है कि पैंगोलिन के स्किन स्केल से कैंसर जैसी ख़तरनाक बीमारी में भी मदद मिल सकती है. इन जानवरों से होने वाले फायदों को लेकर समाज में सोच इतनी गहरी है कि इसी के चलते इनकी मांग में कमी नहीं आती.

हालांकि दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानून बने हैं. फिर भी तस्करों पर पूरी तरह से लगाम नहीं लग पाई है.

हांगकांग में इन जानवरों को चोरी छुपे लाया जाता है और चुपके-चुपके बेचा जाता है. बहुत से जानवर हांगकांग से चीन भेजे जाते हैं.

चीन का गुआंगडांग प्रांत तो जंगली जानवरों के गोश्त से बने पकवानों के लिए मशहूर है. हांगकांग से करीब होने और कस्टम का सिस्टम ढीला होने से यहां बहुत आसानी से जानवरों की तस्करी होती है.

इसके अलावा चीन की अर्थव्यवस्था में सुधार की वजह से लोगों के ख़र्च करने की क्षमता भी बढ़ गई है. जिसके चलते भी महंगे और दुर्लभ जानवरों की मांग में इज़ाफ़ा हो रहा है.

साथ ही चीन के दूसरे देशों के साथ आर्थिक संबंध काफ़ी बढ़ गए हैं. लिहाज़ा बड़े पैमाने पर आयात और निर्यात का काम होता है. ऐसे में अगर बड़े बड़े शिपमेंट के साथ अगर कुछ कंटेनर पैंगोलिन की खाल के रख भी दिए जाते हैं, कोई बड़ी बात नहीं होती.

अगर ये कंटेनर पकड़ में आ भी जाते हैं तो सज़ा बहुत कड़ी नहीं होती. और ना ही सभी पर केस चलता है.

मिसाल के लिए 2010 और 2015 में पैंगोलिन की तस्करी के क़रीब 89 मामले सामने में आए. लेकिन इनमें से सिर्फ 9 पर ही क़ानूनी कार्रवाई हुई. इसके अलावा जुर्माने की रक़म इतनी कम होती है कि उसे अदा करना तस्करों के लिए कोई बड़ी बात नहीं.

दुर्लभ होती प्रजातियों को बचाने लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है सरकारों का संजीदा होना. जब तक सरकारें इन जानवरों की तस्करी को एक सुनियोजित अपराध समझ कर कानून नहीं बनाएंगी, तब तक इन तस्करों पर अंकुश लगाना आसान नहीं होगा.

साथ ही लोगों को जागरूक करने की ज़रूरत है, ताकि इनकी मांग में कमी आए. मांग कम होगी तो तस्करी अपने आप ही कम होने लगेगी.

हालांकि चीन जैसे देश में ये काम इतना आसान नहीं. क्योंकि यहां इन दुर्लभ प्रजातियों का इस्तेमाल दवाओं में भी होता है.

लिहाज़ा लोगों को ये समझाने की ज़रूरत है कि पारंपरिक दवाओं के दूसरे विकल्प आज बाज़ार में मौजूद हैं. सिर्फ़ दवा बनाने के लिए हम किसी जानवर की नस्ल का ख़ात्मा नहीं कर सकते.

हालांकि जैसे जैसे पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ रही है वो पारंपरिक तरीकों का छोड़ रहे हैं. मिसाल के लिए हांगकांग की मशहूर अदाकारा शैरोन वॉक पैंगोलिन को बचाने के लिए लोगों को जागरूक कर रही हैं.

अगर नौजवान पीढ़ी की कोशिशें रंग लाईं, तो पैंगोलिन की प्रजाति को ख़त्म होने से बचाया आसान हो जाएगा.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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