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एप्पल और गूगल को स्वच्छ ईंधन की तलाश
- Author, क्रिस बैरेन्युक
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
अमरीकी कंपनी एपल को आप किस तौर पर जानते हैं? यही ना कि ये एक स्मार्ट फोन, स्मार्ट वॉच और कंप्यूटर-लैपटॉप बनाने वाली कंपनी है. लेकिन शायद आप ये नहीं जानते कि ये कंपनी बिजली भी बेचने लगी है.
पिछले साल एप्पल ने अमरीका के कैलिफोर्निया में एक सोलर फार्म ख़रीदा और इस साल अगस्त महीने में उसे बिजली बेचने की इजाज़त मिल गई है.
दरअसल कंपनी की मंशा है कि वो अपने यहां इस्तेमाल होने वाली बिजली को ऐसी जगह से ले जो कोयले, तेल, गैस या किसी ऐसी चीज़ से न बनती हो जिससे पर्यावरण का नुक़सान न हो. इसीलिए एप्पल ने एक मोटी रक़म का दांव इसके नाम पर खेला है.
एनर्जी सेक्टर में पैसा लगाने वाली एप्पल इकलौती कंपनी नहीं है. कई और अमरीकी कंपनियां साफ़-सुथरे तरीक़ों से बनने वाली बिजली तलाश रही हैं.
हाल ही में ऑनलाइन कंपनी अमेज़न ने अमरीका के टेक्सास में 253 मेगावॉट का एक विंड फार्म बनाने का एलान किया है. गूगल ने भी इसी दौरान घर-घर तक सोलर पैनल पहुंचाने के लिए सनपावर कंपनी के साथ हाथ मिलाया है.
इसके अलावा ईवानपा सोलर इलेक्ट्रिक जनरेटिंग सिस्टम में भी एक मोटी रक़म लगाई है. ज़्यादातर बड़ी कंपनियां नवीकरणीय ऊर्जा में अच्छा-ख़ासा निवेश कर रही हैं.
सवाल उठता है अचानक इन कंपनियों ने क्लीन एनर्जी में इतनी दिलचस्पी दिखानी क्यों शुरू की?
आईएचएस टेक्नोलॉजी में सोलर एनर्जी के जानकार ऐश शर्मा कहते हैं कि बड़ी कंपनियों को अपने काम के लिए बहुत बड़ी तादाद में बिजली चाहिए. इनकी मशीनें हर समय चलती रहती हैं.
इसके अलावा इन मशीनों को ठंडा रखने के लिए हर समय एयरकंडीशनर चलाने पड़ते हैं. इन सब के लिए ढेर सारी बिजली चाहिए. बिजली कंपनियों से कम क़ीमत पर बिजली ख़रीद पाना उनके लिए आसान नहीं है.
दूसरे तरीक़ों से पैदा हुई बिजली के मुक़ाबले सोलर एनर्जी काफ़ी सस्ती पड़ती है. इसीलिए कंपनियां भविष्य में ऊर्जा के अन्य विकल्पों को तलाशने में लगी हैं.
इन कंपनियों का ज़ोर सोलर एनर्जी पर ज़्यादा है. वजह साफ़ है. दूसरे तरीक़ों से पैदा होने वाली बिजली के मुक़ाबले, सोलर एनर्जी काफ़ी सस्ती पड़ रही है. पिछले कुछ दिनों में सोलर एनर्जी की क़ीमतों में भारी गिरावट देखी गई है.
पिछले महीने संयुक्त अरब अमीरात के अबूधाबी में एक सोलर एनर्जी प्लांट की बोली लगाई गई थी. इसमें चीन और जापान की कंपनी ने सोलर फार्म बनाने के लिए बोली लगाई. इनका दावा है कि वे 2.5 सेंट प्रति किलोवॉट घंटे से भी कम क़ीमत पर बिजली बना लेंगी.
ये यक़ीनन ऊर्जा के परंपरागत स्रोतों जैसे कोयला और गैस से बनने वाली बिजली से काफ़ी सस्ती पड़ेगी. ये किसी भी सोलर फ़ार्म के लिए लगाई गई अब तक की सबसे कम क़ीमत वाली बोली थी.
ऐश शर्मा कहते हैं आज सोलर एनर्जी बनाने के काम में काफ़ी तेज़ी आ गई है. उसकी बड़ी वजह है सोलर एनर्जी का सस्ता होना. चीन इन सोलर पैनल का उत्पादन करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा देश है.
पूरी दुनिया में सप्लाई किये जाने वाले सोलर पैनल का 80 फ़ीसद हिस्सा चीन में ही बनाया जाता है.
ऐश शर्मा कहते हैं, "जैसे ही कंपनियों को लगा कि सोलर फार्म बनाने में लागत कम है तो सारी दुनिया में बड़े पैमाने पर सोलर फार्म बनाए जाने लगे. कुछ साल पहले तक 50 मेगावाट का सोलर प्लांट लगाना भी बड़ी बात समझी जाती थी, लेकिन अब कई सौ मेगावाट के सोलर प्रोजेक्ट लगाए जा रहे हैं. सरकारें भी इन्हें बढ़ावा दे रही हैं."
इसमें भारत के मध्यप्रदेश में बनने वाला रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर प्लांट भी शामिल है. यहां पर सूरज की रौशनी से 750 मेगावाट बिजली बनाई जाएगी. उम्मीद की जा रही है कि ये सोलर प्लांट 2017 तक बनकर तैयार हो जाएगा.
इसके अलावा सोलर सेल के क्षेत्र में और क्या बेहतर विकल्प हो सकते हैं, इस पर रिसर्च जारी है. तजुर्बे के तौर पर सिंथेटिक मैटेरियल वाले पैनल भी बनाए जा रहे हैं.
हालांकि अभी दुनिया की बिजली की कुल खपत का महज़ एक फ़ीसद ही सोलर एनर्जी से आता है. लेकिन जिस तरह से इसकी मांग बढ़ रही है, उससे लगता है कि सोलर एनर्जी की हिस्सेदारी और बढ़ेगी. तब इसका असर क़ीमतों पर भी पड़ेगा. आईएचसी को उम्मीद है कि अगले साल तक सोलर एनर्जी के दामों में 30 फीसद तक का इज़ाफ़ा हो जाएगा.
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