आने वाली सदी में आबादी बढ़ेगी या घटेगी?

    • Author, मरियम क्विक
    • पदनाम, बीबीसी फ्यूचर

आपने अपने बुज़ुर्गों से सुना होगा कि उनके बहुत से बच्चे हुए थे लेकिन एक या दो ही ज़िंदा रहे या कभी एक भी नहीं बचा. सभी मर गए. ऐसा इसलिए था कि उस दौर में बीमारियों पर काबू पाने वाली दवाएं नहीं थीं. जैसे जैसे साइंस ने तरक़्क़ी की, बीमारियों पर क़ाबू पाने वाली दवाएं बनने लगीं. और ज़्यादा से ज़्यादा लोग जीने लगे.

दुनिया की आबादी बड़ी तेज़ रफ़्तार से बढ़ रही है. संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक़ 22वीं सदी की शुरुआत पर धरती पर इंसानों की आबादी 11 अरब से ज़्यादा होगी.

हालांकि रिपोर्ट ये भी कहती है कि हो सकता है कि आबादी आज के मुक़ाबले घट भी जाए. या इससे भी ज़्यादा हो जाए. कुछ कहा नहीं जा सकता.

आज दुनिया में इंसानो की आबादी क़रीब साढ़े सात अरब है. हो सकता है कि 22वीं सदी तक ये तादाद सिर्फ़ 7.3 अरब ही रह जाए.

बहरहाल, संयुक्त राष्ट्र की ये रिपोर्ट एक बात तो पक्के तौर पर कहती है. वो ये कि साल 2050 तक दुनिया की आबादी बढ़ती ही रहेगी.

हम धरती पर इंसान की आबादी को कुछ आंकड़ों की नज़र से देखें तो बात और दिलचस्प हो जाती है.

मसलन, पिछले साल के मुक़ाबले इस साल धरती पर दुनिया में अब तक आठ करोड़ तीस लाख लोग ज़्यादा हैं.

आप जानकर हैरान हो जाएंगे कि ये ये तादाद जर्मनी जैसे देश की कुल आबादी के बराबर है. यानी साल भर में धरती की जनसंख्या में जर्मनी की कुल आबादी के बराबर इज़ाफ़ा हुआ.

विज्ञान की तरक़्क़ी ने इंसानों की आबादी की रफ़्तार को तेज़ी से बढ़ाने का काम किया है. आज बच्चे पैदा करना या नहीं करना इंसान की पसंद पर निर्भर करता है.

आज सभी कम से कम बच्चे पैदा करना चाहते हैं. क्योंकि सेहत की बेहतर सुविधाओं की वजह से बच्चों के जीने की उम्मीद बढ़ गई है.

आज इंसान की औसत उम्र 72 साल होती है, जो कि साल 2100 तक बढ़कर 83 साल हो जाएगी.

1950 तक धरती पर मौजूद सभी इंसानों की औसत उम्र 24 बरस हुआ करती थी. आज धरती पर मौजूद सभी इंसानों की औसत उम्र निकाली जाए तो ये 42 साल बैठती है.

अगर लोग ज़्यादा वक़्त तक ज़िंदा रहेंगे तो इसका सीधा सा मतलब है कि बुज़ुर्गों की तादाद बढ़ जाएगी. चूंकि नौजवान पीढ़ी कम बच्चे पैदा करना चाहती है. ऐसे में युवाओं और बुज़ुर्गों के दरमियान फ़ासला बहुत बढ़ जाएगा.

आबादी बढ़ेगी तो ज़ाहिर सी बात है उसके रहने का इंतज़ाम भी करना होगा. इसके लिए नए शहर बसाए जाएंगे. पहले से बसे शहरों का दायरा बढ़ेगा.

एक मोटे अनुमान के मुताबिक़ साल 2030 तक एक करोड़ या इससे ज़्यादा आबादी वाले करीब 41 महानगर दुनिया में होंगे.

2050 तक दुनिया की दो तिहाई आबादी शहरों में रहने लगेगी. यानी आज से 33 साल बाद दुनिया भर में सवा छह अरब से ज़्यादा लोग शहरों में रहने लगेंगे.

अब चूंकि शहरों की आबादी बढ़ेगी तो बुलंद इमारतों में छोटे-छोटे घर ही नसीब हो पाएंगे. इतनी बड़ी आबादी को खपाने के लिए यही एक विकल्प बचता है. इसकी वजह ये है कि शहरों का दायरा बढ़ाने के लिए ज़रूरी ज़मीन की किल्लत होगी.

उपनगरीय इलाक़ों को बसने से रोकने के लिए बहुमंज़िला इमारतों में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की रिहाइश का इंतज़ाम करना होगा.

बढ़ती आबादी के साथ एक और चीज़ की मांग बहुत ज़्यादा बढ़ जाएगी. वो है ऊर्जा और ईंधन.

दुनिया की कुल आबादी आज जिस ईंधन का इस्तेमाल करती है, उसका 86 फ़ीसद हिस्सा जीवाश्म ईंधन यानी तेल, गैस और कोयले से आता है. जबकि दस फ़ीसद हिस्सा नवीकरणीय ऊर्जा मसलन पवन ऊर्जा या सोलर एनर्जी से आता है.

जीवाश्म ईंधन की उपलब्धता सीमित है. ऐसे में इंसान की बढ़ती ऊर्जा और ईंधन की ज़रूरतों के लिए सोलर एनर्जी या विंड एनर्जी और परमाणु ऊर्जा पर ज़ोर दिया जा रहा है.

दुनियाभर में सोलर एनर्जी के इस्तेमाल पर भी ज़ोर दिया जा रहा है. साल 2010 से 2015 तक सारी दुनिया नें सोलर एनर्जी की खपत में 664 फ़ीसद का इज़ाफ़ा हुआ.

जिन देशों के पास खुली ज़मीन और खुला आसमान होगा, वो आगे चलकर सोलर एनर्जी और विंड एनर्जी के प्लांट लगा सकेंगे. जिनके पास ज़मीन की कमी होगी, उन देशों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. क्योंकि इंसान सभ्यता की रफ़्तार को बनाए रखने के लिए ईंधन की बहुत ज़रूरत है.

विकसित देशों में ज़िंदगी की रफ़्तार बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रही है. वहां की ज़िंदगी पूरी तरह से मशीनी होती जा रही है. यहां तक कि घर के छोटे-मोटे काम करने के लिए भी वहां रोबोटिक मशीनें मौजूद हैं.

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी कि रिसर्च के मुताबिक़ आने वाले दौर में अमरीका में आधे से ज़्यादा काम सिर्फ़ कंप्यूटर और रोबोट के ज़रिए किए जाएंगे. वहां अकाउंट्स, टेलीमार्किटिंग और टैक्सी ड्राइवरों की जगह कंप्यूटर ले लेंगे.

राहत की बात ये है कि मशीनें, क्रिएटिव काम करने वालों की जगह इतनी आसानी से नहीं ले पाएंगी अलबत्ता लेबर मार्केट से मज़दूरों की नौकरियां इन मशीनों की वजह से ज़रूर गायब हो सकती हैं.

यानी हमारी आबादी बढ़ने के साथ साथ हमारे सामने नई नई चुनौतियां भी खड़ी हो रही हैं. इनसे निपटने के लिए इंसान को अपनी अक़्ल का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करना होगा. सिर्फ़ संसाधनों का गुणा-भाग इन चुनौतियों से निपटने में कामयाब नहीं होगा.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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