दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

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- Author, जॉन वाल्श
- पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
ग़ालिब के मुताबिक़ दर्द अगर हद से गुज़रने लगे तो समझिए अब कोई और दवा काम नहीं करेगी. बल्कि, वो दर्द ख़ुद अपना इलाज करेगा. यानि अपने मर्ज़ की दवा वो ख़ुद बन जाएगा. लेकिन ये पता कैसे लगाया जाए कि दर्द कितना ज़्यादा है. और कब ये हद से गुज़र कर अपना इलाज ख़ुद शुरू करेगा.
इसके लिए फ़िलहाल तो ऐसा कोई पैमाना बना नहीं है. मरीज़ ये शिकायत तो करता है कि उसे बहुत तेज़ दर्द है. लेकिन उस दर्द की शिद्दत क्या है, उसका पता नहीं चल पाता.
हो सकता है किसी को सुई चुभने पर भी तेज़ दर्द होता हो. उसके लिए दर्द की शिद्दत वही हो. और ये भी हो सकता है कि किसी का हाथ तेज़ चाक़ू से कट जाए, फिर भी वो उसके लिए बर्दाश्त करने लायक़ हो.

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मरीज़ भी जब डॉक्टर को बताता है कि उसे दर्द हो रहा है, तो तरह-तरह की कैफ़ियत ही बताता है. ये नहीं बता पाता कि उसे किस स्तर का दर्द है. खैर अब इस दिशा में काम शुरू हो चुका है. उम्मीद है कि जल्द ही कोई ऐसी मशीन बन जाएगी, जिसके ज़रिए ये पता लगा जाएगा कि मरीज़ को कितना दर्द है.
1970 में कनाडा की मैक्गिल यूनिवर्सिटी के डॉक्टर रोनाल्ड मेलज़ाक और डॉक्टर वॉरेन टोर्गर्सन ने दर्द की शिद्दत मापने के लिए एक तरीक़ा खोजा था.
इसे McGill Pain Questionnaire के नाम से जाना जाता है.
मेडिकल साइंस में दर्द मापने के लिए इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्तेमाल किया जाता है. इस सवालनामे में कुछ शब्द हैं जिनके ज़रिए दर्द को कम, ज़्यादा, बहुत ज़्यादा के दर्जों में बांटा जाता है.

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मरीज़ से कुछ सवाल पूछे जाते हैं और उनके जवाब के मुताबिक़ ही किसी नतीजे पर पहुंचा जाता है. दर्द को मापने का ये एक रिवायती तरीक़ा है.
हाल ही में एक और नया तरीक़ा खोजा गया है. इसका नाम है Pain Quality Assessment Scale (PQAS).
इस स्केल पर 1 से 10 तक कुछ शब्द लिखे गए हैं. जैसे हल्का, बहुत हल्का, तेज़, बहुत तेज़, बर्दाश्त करने लायक़, बर्दाश्त के बाहर वग़ैरह. अब इस स्केल के इस्तेमाल के साथ भी एक दिक़्क़त है. जो मरीज़ जितना ज़्यादा दर्द को झेल चुका है वो उसके मुताबिक़ ही स्केल के नंबर पर अंगुली रखेगा.
मिसाल के लिए अगर कोई औरत लेबर पेन बर्दाश्त कर चुकी है तो वो किसी और तरह के दर्द को तीन से चार नंबर ही देगी. जबकि उसी दर्द को कोई और आठ या नौ नंबर भी दे सकता है.

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दर्द को नंबरों की बुनियाद पर मापने के इस तरीक़े को लंदन पेन कंसर्शियम के डॉक्टर स्टीफन मैक्मोहन सही नहीं मानते हैं.
दर्द नापने की दिशा में रिसर्च के मक़सद से ये संस्था साल 2002 में बनाई गई थी. डॉक्टर स्टीफन का कहना है कि दर्द को सिर्फ़ उसकी शिद्दत की बुनियाद पर नहीं आंका जा सकता. दर्द के साथ और भी बहुत सी चीज़ें जुड़ी होती हैं. जैसे उस दर्द की वजह से मरीज़ जज़्बाती तौर पर कितना परेशान है. या उसे दर्द की वजह से ध्यान केंद्रित करने में कितनी मुश्किल आ रही है.
डॉक्टर स्टीफन के मुताबिक़ दर्द सिर्फ़ दो तरह के होते हैं. तेज़ और लंबे वक्त तक होने वाला दर्द. तेज़ दर्द को कोई भी दवा खाकर फ़ौरन शांत किया जा सकता है. और बहुत बार आराम करने से भी वो दर्द दूर हो जाता है. लेकिन कुछ दर्द ऐसे होते हैं जो लगातार होते रहते हैं. जैसे गठिया का दर्द. ये दर्द शरीर में अपना घर बना लेता है. ऐसे दर्द से उबरना मुश्किल होता है.

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यूरोप के सबसे बड़े पेन सेंटर, लंदन के सेंट थॉमस हॉस्पिटल के डॉक्टर अदनान अल-केसी के मुताबिक़ आज 55 से 60 फीसद लोगों को कमर दर्द की शिकायत है. वजह एकदम साफ़ है. हम घंटों कमर झुकाए एक ही अवस्था में बैठे काम करते रहते हैं. इससे रीढ़ की हड्डी के छोटे-छोटे जोडों पर गहरा असर पड़ता है. इसके अलावा उठते-बैठते, चलते वक़्त हम ये भूल जाते हैं कि हमें अपनी कमर का ख़्याल रखना है.
अल-केसी के मुताबिक़ पिछले 15 से 20 सालों में ब्रिटेन के लोगों में लगातार रहने वाले कमर दर्द की शिकायत काफ़ी बढ़ी है. इसका असर काम के घंटों पर पड़ता है और इसकी वजह से 6-7 अरब पाउंड का नुक़सान कारोबार को होता है.
अल-केसी दर्द की शिद्दत मापने के लिए मरीज़ के रहन-सहन को खंगालते हैं. जैसे उसकी सोने की, खड़े होने, चलने फिरने की और खाने की आदत का पता लगाते हैं. वो मरीज़ से पूछते हैं कि वो क्या चीज़ खाते हैं, क्या नहीं. लेकिन डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है, इस जानकारी को साइंटिफिक डेटा में बदलना.
बहरहाल ऐसे तरीक़े तलाश किए जा रहे हैं जिससे ये पता लगाया जा सके कि दर्द कि वजह से मरीज़ कितनी तकलीफ़ झेल रहा है.

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साल 2010 से लंदन का सेंट थॉमस हॉस्पिटल बेहद तेज़ दर्द से पीड़ित लोगों के लिए ऐसा प्रोग्राम लॉन्च कर चुका है, जिसके तहत मरीज़ को उसके रोज़मर्रा के माहौल से दूर रखकर सिर्फ चार हफ़्तों में इलाज किया जाता है. इस काम में बहुत से डॉक्टर, मनोवैज्ञानिक और दूसरे स्पेशलिस्ट मरीज़ की मदद करते हैं.
अल-केसी कहते हैं, उनका अस्पताल दुनिया का पहला ऐसा सेंटर है जहां रीढ़ की हड्डी के दर्द का इलाज एकदम नई तकनीक से किया गया. इसके लिए उन्होंने वायर के ज़रिए बहुत छोटे छोटे, एक दो वोल्ट वाले करंट के ज़रिए मरीज़ की स्पाइनल कॉर्ड में पहुंचाए हैं. जिससे उसके दर्द में कमी आई. इस थेरेपी के लिए मरीज़ को लंबे वक़्त तक अस्पताल में नहीं रहना पड़ता है.
दर्द की शिद्दत को मापने और उसका सही इलाज करने की दिशा में दुनिया भर के रिसर्च सेंटरों में काम किया जा रहा है.
अमरीका के कैलिफोर्निया की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की ह्यूमन पेन रिसर्च लेबोरेट्री इस दिशा में ख़ास तौर पर काम कर रही है कि मरीज़ किस दर्द को कैसे महसूस करता है. माइग्रेन, फाइब्रोमालगिया और फेशियल पेन कुछ इसी तरह के दर्द हैं, जिन्हें बयान करना आसान नहीं होता.
ये लेबोरेट्री इसी दिशा में खास तौर पर काम कर रही है. उम्मीद ही जल्द ही कोई ऐसा तरीक़ा ज़रूर खोज लिया जाएगा, जिससे दर्द को नापकर उसे दूर किया जाएगा.
तब तक तो यही कहना होगा कि...
दर्द कितने हैं बता नहीं सकता, ज़ख़्म कितने हैं दिखा नहीं सकता
मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.
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