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पेप्सी, कोक हो या जिलेट, ये विज्ञापनों की नई हवा है
- Author, मेरेडिथ टूरिट्स और ब्रायन लुफ़किन
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
रेज़र ब्रांड जिलेट ने अपना नया विज्ञापन सिर्फ़ अमरीका में जारी किया. लेकिन 90 सेकेंड के वीडियो की दुनिया भर में चर्चा हुई.
हो सकता है कि आपने भी उसे देखा हो. संभव है कि आपने किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उसे शेयर भी किया हो. जिलेट का विज्ञापन #MeToo आंदोलन से प्रेरित था.
'मर्दानगी से जुड़ी पारंपरिक अवधारणा' को चुनौती देने वाले इस विज्ञापन को नाम दिया गया था 'वी बीलीव.'
इस विज्ञापन ने न सिर्फ़ जिलेट के नये स्लोगन 'दि बेस्ट अ मैन कैन गेट' को दूर-दूर तक पहुंचाया, बल्कि इसने जिलेट के कुछ उपभोक्ताओं को भी निशाने पर लिया.
इसे बनाने से पहले कंपनी ने बहुत सोच-विचार किया था.
जिलेट के प्रवक्ता ने 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' से कहा, "ये सकारात्मक बदलाव के लिए हमारी प्रतिबद्धता है. एक ब्रांड, कंपनी और विज्ञापनदाता के रूप में हम योगदान दे रहे हैं."
ब्रांडिंग रणनीति
सामाजिक ज़िम्मेदारी उठाने के लिए 'वी बीलीव' की तारीफ़ भी हुई और इल्ज़ाम लगाने वाले संदेश के लिए इसकी आलोचना भी हुई.
पहले के विज्ञापन अभियानों के उलट अमरीका के बड़े विज्ञापनदाता अब ब्रांडिंग रणनीति के तौर पर विवादित मुद्दों को चुन रहे हैं.
जिलेट से पहले सितंबर 2018 में नाइके ने 'ब्लैक लाइव्स मैटर' आंदोलन को याद करते हुए सैन फ्रांसिस्को फोर्टी नाइनर्स के पूर्व क्वार्टरबैक कॉलिन कैपरनिक के साथ एड कैंपेन किया था.
पेप्सी ने भी 2017 में ब्लैक लाइव्स मैटर की याद दिलाते हुए एक विज्ञापन किया था. उस विज्ञापन में मॉडल केंडल जेनर को लिया गया था.
आंदोलन को हल्का करके दिखाने को लेकर पेप्सी की भारी आलोचना हुई थी, जिसके बाद कंपनी ने अपने विज्ञापन अभियान को 24 घंटे में ही वापस ले लिया था.
कोका कोला ने 2014 में 'इट्स ब्यूटीफुल' विज्ञापन अभियान चलाकर आप्रवासियों का समर्थन किया था.
ये तो बस शुरुआत है!
यूनिवर्सिटी ऑफ़ नॉर्थ कैरोलिना-चैपर हिल में मार्केटिंग की क्लिनिकल एसोसिएट प्रोफ़ेसर क्लॉडिया कुबोविच मल्होत्रा का कहना है कि कंपनियां ब्रांडिंग के नाम पर विभाजनकारी सामाजिक मुद्दों को उठा रही हैं और ये सिलसिला रुकने वाला नहीं है.
"इस तरह के विज्ञापनों की शुरुआत भर हुई है. शायद एक समय वह भी आएगा जब ऐसे विज्ञापन बहुतायत में दिखेंगे, लेकिन निकट भविष्य में ऐसा होने वाला नहीं है."
मल्होत्रा कहती हैं, "लोग अब उतने विज्ञापन नहीं देखते जितना पहले देखा करते थे. इसलिए आपको कुछ ऐसा कहने या करने की ज़रूरत होती है जो लोगों का ध्यान खींचे."
विज्ञापनों को बढ़ाने में सोशल मीडिया का भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण हो गई है.
मल्होत्रा का कहना है कि जिलेट ने #MeToo हैशटैग का इस्तेमाल करके संकेत दिया कि वह इस मुद्दे पर ऑनलाइन बहस जारी रखना चाहती है.
सामाजिक उद्देश्य
सैद बिज़नेस स्कूल के ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी सेंटर फ़ॉर कॉरपोरेट रीप्यूटेशन के डायरेक्टर रूपर्ट यंगर को लगता है कि आने वाले दिनों में इस तरह के विज्ञापन आम हो जाएंगे.
"नई नौकरियों में आ रहे युवा नियोक्ता चुनते समय सामाजिक उद्देश्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता देखते हैं."
यंगर का कहना है कि पेटागोनिया जैसी कंपनियां जो अपने सामाजिक उद्देश्यों को लेकर स्पष्ट हैं, बहुत कुछ हासिल कर सकती हैं.
प्रचार कंपनी इडेलमैन के 2018 के एक अध्ययन से पता चला कि दुनिया भर में दो-तिहाई उपभोक्ता अपने सामाजिक मूल्यों को ध्यान में रखकर ख़रीदारी करते हैं.
पिछले साल के मुक़ाबले यह आंकड़ा औसत रूप से 13 फीसदी बढ़ा. ब्रिटेन में इसमें 20 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की गई.
सामाजिक संदेशों वाले विज्ञापन
यंगर कहते हैं कि जैसे-जैसे सामाजिक मुद्दों वाले संदेश आम हो रहे हैं, ब्रांड उपभोक्ताओं तक पहुंचने के लिए अलग-अलग तरकीबें अपनाएंगे.
"कुछ ब्रांड सोशल मीडिया पर भरोसा करेंगे तो कुछ की रणनीति दूसरी तरह से पहुंच बढ़ाने की होगी. कुछ ब्रांड आंतरिक संचार और समूह-स्तर के बयानों और प्रतिबद्धताओं पर ध्यान देंगे."
"सवाल है कि यदि सामाजिक संदेशों वाले विज्ञापन आम हो जाएंगे तो क्या वे प्रभावी रहेंगे? ये तो संभव नहीं है कि हम हर संदेश पर उछल पड़ें. ये बेहद उबाऊ और थकाऊ होगा."
"ये संवेदनाओं को कम कर देगा. ठीक उसी तरह जैसे अब लोग बैनर पर ध्यान नहीं देते. इसीलिए वेबसाइटों पर बैनर वाले विज्ञापन ग़ायब हो रहे हैं."
लोग ऊबने लगेंगे...
मैकगिल यूनिवर्सिटी में मार्केटिंग के एसोसिएट प्रोफ़ोसर आशीष मुखर्जी कहते हैं, "जिस चीज की अधिकता हो जाएगी, उससे लोग ऊबने लगेंगे."
"सेक्स हो या सेलिब्रिटी- आप विज्ञापन की किसी भी तरकीब को देख लीजिए, जिनका इस्तेमाल लंबे समय तक किया गया, लोगों ने उसे बाहर कर दिया."
लेकिन ज्वलंत सामाजिक मुद्दों को उठाने वाले विज्ञापन अभी इतने आम नहीं हुए हैं कि लोग ऊब गए हों.
मल्होत्रा इससे सहमति जताती हैं, "देखिए जिलेट ने क्या किया है. नाइके ने क्या किया है. उन पर प्रतिक्रियाओं को देखिए."
"सभी ब्रांड इन मुद्दों के हर पक्ष पर बात करें. वहां तक पहुंचने के लिए हमें एक लंबा सफ़र तय करना है."
क्या ये सच में काम करता है?
जिस दिन 'वी बीलीव' विज्ञापन को जारी किया गया, न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में जिलेट की पैरेंट कंपनी प्रॉक्टर एंड गैंबल के शेयर थोड़े चढ़ गए.
लेकिन कुछ दिनों के कारोबार के बाद वह नीचे आ गए.
लेकिन नाइके के कैपरनिक कैंपेन ने इसके शेयर की कीमतों को रिकॉर्ड ऊंचाई तक पहुंचा दिया (शुरुआत में उसमें गिरावट रही थी).
लगातार कई दिनों तक नाइके के शेयर चढ़ते रहे. कैपरनिक के साथ विज्ञापन करार के बाद नाइके की बिक्री में 31 फीसदी का इजाफा हुआ.
नाइके के विज्ञापन अभियान के बारे में मल्होत्रा कहती हैं, "सभी कह रहे थे कि इसमें बहुत जोखिम है, लेकिन हम देख चुके हैं कि थोड़े ही समय में यह बहुत प्रभावी साबित हुआ."
"नाइके ने अपने विचार रखे और टारगेट मार्केट के साथ उनका सुर-ताल मिल गया."
उपभोक्ताओं के व्यवहार
लोग जिन कंपनियों पर भरोसा करते हैं उनका समर्थन भी करते हैं. इसलिए अगर ये विज्ञापन सही से बनाए जाएं तो बिक्री पर भी असर डालते हैं.
एडेलमैन के अध्ययन से पता चलता है कि ब्रांड संचार उपभोक्ताओं के व्यवहार को नियंत्रित करता है.
करीब एक तिहाई उत्तरदाताओं ने कहा कि सामाजिक मूल्यों के बारे में संदेश उत्पादों के बारे में बात करने से ज़्यादा असरदार होते हैं.
लेकिन मुखर्जी को लगता है कि ऐसा करने से पहले ब्रांड को अपने ग्राहकों से कट जाने के ख़तरे के बारे में सोचना होगा.
रेज़र बनाने वाली कंपनी पुरुषों के कई वर्ग के उत्पाद बनाती है. उनमें से कुछ लोग जिलेट के विज्ञापन से आहत भी हुए.
नुक़सान का ख़तरा
जिलेट का विज्ञापन उनको मुजरिम ठहराने वाला लगा. मुखर्जी कहते हैं, "मुझे यक़ीन नहीं है कि इससे जिलेट को कोई फ़ायदा हुआ."
"क्या यह उसके ब्रांड इमेज को क़मजोर करेगा, क्या वह ब्रांड को पूरी तरह बदलना चाहते हैं?"
"ब्रांड्स को होशियारी से चयन करना होगा. कंपनी जितनी बड़ी होगी और उसकी पहुंच जितनी ज़्यादा होगी, उसे नुक़सान का ख़तरा उतना ही अधिक होगा."
"उनको सोचने की ज़रूरत है कि वे मास मार्केट पर आधारित हैं या विशिष्ट बाज़ार पर. यदि वे मास मार्केट कंपनी हैं तो उनको दो बार सोचने की ज़रूरत है."
नैतिकता के साथ उपभोक्तावाद
भले ही सामाजिक संदेशों वाले विज्ञापन आपको उत्तेजित करते हैं, प्रेरित करते हैं या फिर उदासीन बना देते हैं, वे हैं तो विज्ञापन ही.
कंपनियां दान-पुण्य करने के लिए बाज़ार में नहीं उतरतीं.
वे ग्राहकों को जोड़ने, ब्रांड के बारे में जागरुकता बढ़ाने और अंत में उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए विज्ञापनों की योजना बनाती हैं.
जिलेट की तरह के जोखिम में गुणा-गणित भी होता है. मुखर्जी कहते हैं, "ये राजनीति की तरह है."
"यदि आपके साथ बड़ी संख्या में लोग जुड़े हैं और वे आपके ब्रांड के प्रति दृढ़ता से समर्पित हैं तो आप कुछ लोगों को दूर करने का ख़तरा उठा सकते हैं."
सोशल मीडिया
मल्होत्रा का कहना है, "इस बारे में एक सीईओ की तरह सोचें. विज्ञापन दिखाने में मुझे बहुत पैसे ख़र्च करने पड़ते हैं. मैं ख़र्च के कारण इसे बार-बार नहीं दिखाना चाहती."
"तो मैं इसे दो-चार बार ही दिखाऊंगी, इसमें एक संदेश जोड़ दूंगी और कोशिश करूंगी कि लोग सोशल मीडिया पर उन संदेशों को भेजना शुरू कर दें."
मल्होत्रा कहती हैं कि मैंने जिलेट का विज्ञापन टीवी पर कभी नहीं देखा. शायद आपने भी नहीं देखा हो.
हो सकता है कि विज्ञापनों के नये युग में यह उपभोक्ताओं को मोहरा बनाता हो.
लेकिन अगर ये संदेश आपकी ख़रीदारी के तरीक़े को बदल देते हैं और आपको नैतिकता के आधार पर फ़ैसला लेने देते हैं तो शायद इसमें सबकी जीत है.
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