चीन: सरकार के ख़िलाफ़ लिखने के लिए युवाओं ने निकाले ये तरीक़े

    • Author, केरी एलन और स्टुअर्ट लाउ
    • पदनाम, बीबीसी कैपिटल

चीन की मंदारिन दुनिया की सबसे कठिन भाषाओं में से एक है.

इसके शब्दकोश में 3 लाख 70 हज़ार शब्द हैं, जो अंग्रेजी की ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी के कुल शब्दों के दोगुने हैं.

फ्रेंच और रशियन डिक्शनरी के मुक़ाबले मंदारिन में तीन गुना ज़्यादा शब्द हैं.

मंदारिन के शब्दकोश में सबसे नए शब्द वे हैं, जिन्हें चीन के युवा इंटरनेट पर इस्तेमाल करते हैं.

समसामयिक मुद्दों पर वे क्या सोचते हैं, यह ज़ाहिर करने के लिए वे कुछ अशिष्ट शब्दों का सहारा लेते हैं.

इन शब्दों को वे ख़ुद ही बनाते हैं. ये अशिष्ट शब्द रेकि कहलाते हैं. रेकि यानी आक्रामक शब्द.

शब्दों की खिचड़ी

चीन की 140 करोड़ आबादी में से 75 करोड़ से ज़्यादा लोग इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं.

इनमें से बड़ी संख्या में लोग नए कैरेक्टर्स गढ़ रहे हैं. मिसाल के लिए 'डुआंग' जैकी चान की फ़िल्मों में उनके कैरेक्टर्स के नाम से मिलाकर बना है.

ऐसे शब्द बनाने वालों को चीनी सोशल मीडिया पर शाबाशी मिलती है. सोशल मीडिया यूजर्स ने उनके लिए 'निउबी' का तमगा गढ़ा है.

'निउबी' होना चीनी नौजवानों के बीच लोकप्रिय होने की कुंजी है.

रॉबर्ट एक ऐसे ही नौजवान हैं. वे अपना पूरा नाम नहीं बताते. बीबीसी कैपिटल ने रॉबर्ट से पूछा कि चीन का युवा संचार के इस नए तरीके को क्यों विकसित कर रहा है.

रॉबर्ट के मुताबिक़, चीन के नौजवान सामाजिक हक़ीकत देखकर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं. दो या दो से ज़्यादा शब्दों को मिलाने के पीछे उनकी बेबसी और लाचारी है.

मंदारिन का ऐसा ही एक नया शब्द है 'एंटिजेन'.

इसे एंट (चींटी) और सिटीज़न को मिलाकर बनाया गया है. 'एंटिजेन' आम चीनी नागरिकों की लाचारी को दिखाता है.

'इनरनेट' शब्द को इंटरनेट पर नियंत्रण रखने और उसे चीन की सीमा में रखने की कोशिशों की प्रतिक्रिया में बनाया गया है.

सरकार के फ़िल्टर तोड़ने में जुटी जनता

शंघाई में एक मल्टीनेशनल कंपनी के लिए काम करने वाली फ़्लोरा शेन कहती हैं कि बहुतेरे रेकि शब्द मुख्यधारा की मीडिया पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नियंत्रण की चिढ़ में बनाए गए हैं.

"अख़बार और टीवी की ख़बरें पार्टी लाइन पर होती हैं. इसलिए आम लोग सोशल मीडिया का सहारा ले रहे हैं. यहाँ भी वे वहीं तक आगे बढ़ते हैं जिससे कोई नुकसान ना हो."

फ़िलिप भी अपना पूरा नाम नहीं बताते. वे कहते हैं, "लोग पहचान लिए जाने और सेंसर कर दिए जाने के बाद भी कुछ कहना चाहते हैं, लेकिन कह नहीं सकते. इसलिए वे परोक्ष रूप से अपनी बात रखते हैं."

चीन में इंटरनेट की पहुँच बढ़ने से देश के दूसरे हिस्से के लोगों से जुड़ना आसान हो गया है.

लेकिन स्वतंत्र और विदेशी स्रोतों से आने वाली ख़बरों तक उनकी पहुँच सीमित है.

'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' संस्था ने साल 2018 के प्रेस फ़्रीडम इंडेक्स में शामिल 180 देशों की सूची में चीन को 176वें स्थान पर रखा है.

चीन की साइबर पुलिस लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे वीबो और वीचैट पर नज़र रखती है और राजनीतिक रूप से संवेदनशील और व्यवस्था-विरोधी टिप्पणियों को मिटाती रहती है.

कुछ संवेदनशील की-वर्ड वाले पोस्ट ख़ुद डिलीट हो जाते हैं. ऑन-लाइन पुलिस एडमिनिस्ट्रेटर्स ने वीबो जैसे प्लेटफॉर्म पर कई शब्द और वाक्यांशों को चिह्नित कर रखा है जो संवेदनशील हैं.

इन संवेदनशील शब्दों के साथ सोशल मीडिया पर कोई पोस्ट किया जाए तो सिस्टम किसी के देखने से पहले ही उस पोस्ट को फ़िल्टर कर देता है.

संवेदनशील तारीख़ों या घटनाओं के समय भी पाबंदियाँ लगाई जाती हैं.

हर साल 4 जून को जब 1989 के तियानान्मेन चौक घटना की बरसी आती है तब '46' (4 जून), '64' (जून 4), '8964' और इसी तरह के मिलते-जुलते अंकों और शब्दों को प्रतिबंधित कर दिया जाता है.

टेलर स्विफ़्ट ने '1989' टाइटल से एलबम बनाया तो उस पर भी चीन का सरकारी तंत्र चौकन्ना हो गया.

उसे लगा कि '1989' को तियानान्मेन के रूपक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.

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सरकारी तंत्र चौकन्ना है तो चीन के युवा भी कम होशियार नहीं हैं.

वे क्रिएटिव हो रहे हैं और सेंसर को चकमा दे रहे हैं.

वे सामान्य चलन के शब्दों का इस्तेमाल करके भी सेंसर से बच निकलते हैं.

उदाहरण के लिए, पिछले कुछ वर्षों में साइबर पुलिस को उन टिप्पणियों को हटाने में काफ़ी मुश्किल हुई, जिनमें 'टोड' (मेढक) का जिक्र था.

'टोड' शब्द पूर्व राष्ट्रपति जियांग जेमिन के लिए बनाया गया था.

'झाओ' एक कॉमन सरनेम है, जिसकी निगरानी मुश्किल है. 'झाओ' के कई अर्थ हैं, लेकिन यह उनके लिए लिखा जाता है जो सत्ता में होते हैं.

चीन के एक दक्षिणी शहर में यूनिवर्सिटी की अंडर ग्रेजुएट छात्र मा जिन कहती हैं, "धीरे-धीरे चीन के युवा, कम से कम वो जो बड़े शहरों में रहते हैं, वे एक सामाजिक बहस शुरू कर रहे हैं. हम इसमें अपनी भागीदारी बढ़ाना चाहते हैं."

मा जिन अपने टेक्स्ट मैसेज वीचैट पर भेजती हैं. इस मैसेजिंग ऐप पर बहुत पहरा है. इसलिए मा जिन को अपने शब्द सावधानी से चुनने पड़ते हैं.

वो कहती हैं, "नए शब्द और नए फ्रेज बनाने के लिए क्रिएटिविटी की जरूरत पड़ती है."

कूट शब्दों के साथ लिखे गए संदेशों की एक सीमा है. जो इनके बारे में जानते हैं, सिर्फ वे ही इनको समझ सकते हैं. इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे आम लोग इन कूट संदेशों से अनजान रह जाते हैं.

कम्युनिस्ट पार्टी के लिए ख़तरे की घंटी

चीन में अंग्रेज़ी समझने-बोलने वाले लोगों के पास थोड़ी ज़्यादा आज़ादी है.

साइबर पुलिस ने जो सेंसर बनाए हैं, वे भाषाई तौर पर इतने सक्षम नहीं हैं कि अंग्रेजी के शब्दों को समझकर उन्हें रोक पाएं.

सेंसर के बाद भी चीनी सोशल मीडिया पर 'फ्रीडैम' (freedamn) के बारे में चर्चा करते हुए पोस्ट मिल जाते हैं, जबकि असल में यह चीन के फ्रीडम (freedom) के दावे का माख़ौल उड़ाता है.

'हारमेनी' (harmany) शब्द 'हार्म' और 'मेनी' को मिलाकर बनाया गया है.

इसके ज़रिए कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से थोपी गई नीतियों की आलोचना की जाती है.

डिपार्टमेंट को 'डिपार्टीमेंट' (departyment) लिखकर सरकार की उन नीतियों का मज़ाक बनाते हैं, जिसके तहत नौजवानों को काबू में रखने के लिए चीन की सरकार देश के संसाधन और समय ख़र्च करती है.

पिछले एक दशक में चीनी समाज में बड़े बदलाव हुए हैं. राष्ट्रपति शी जिनपिंग के कार्यकाल में हुए आर्थिक विकास सरकार की बड़ी जीत के तौर पर पेश की जाती है.

साल 2012 में जब से शी जिनपिंग सत्ता में आए हैं, उन्होंने नई पीढ़ी को खुशहाल जीवन का विजन दिया है.

साथ ही ये सपना भी दिखाया है वे अपने जीते-जी चीन को ग्लोबल पावर बनते हुए देखेंगे. युवाओं को आर्थिक तरक्की के कुछ फ़ायदे भी हुए हैं.

वे पिछली पीढ़ी से ज़्यादा संपन्न हैं और खुलकर विदेश यात्राएं कर रहे हैं.

चीन के उपभोक्ता समाज का बढ़ना कम्युनिस्ट पार्टी के लिए ख़तरे की घंटी भी है.

चीन की नई पीढ़ी जो पैसे ख़र्च करने में सक्षम है, वह लग्ज़री आइटम की माँग करने लगी है.

समृद्धि बढ़ने और विदेश यात्राओं पर लगी रोक हटने के बाद भी बड़ी आबादी उन्हीं की है, जिनको रोज़ की ज़रूरतें पूरी करने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है.

सोशल मीडिया पर होने वाली चर्चाओं के केंद्र में वही वर्ग है. युवाओं को शिकायत है कि जैसे-जैसे नई टेक्नोलॉजी आ रही उनके काम के घंटे भी बढ़ते जा रहे हैं. वे इस चूहा दौड़ से दूर निकलना चाहते हैं.

कई लोग आर्थिक रूप से बीच में अटके हुए हैं. वे ना तो तंगहाली में डूब रहे हैं, ना ही उनके अच्छे दिन आए हैं.

वे 'स्माइलेंस' (smilence) में अपने गम को छुपाए हुए हैं. उनके चेहरे पर स्माइल है, लेकिन अंदर खीझ भरी हुई है.

(ये स्टोरी बीबीसी कैपिटल के नए कॉलम 'लैंग्वेज मैटर्स' से ली गई है. इसमें हमारे जीने और काम करने के ढंग पर नई भाषा के असर की चर्चा होती है.)

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