क़र्ज़ के भंवर में क्यों फंसती जा रही है युवा पीढ़ी

    • Author, मेरेडिथ टूरिट्स
    • पदनाम, बीबीसी कैपिटल

21वीं सदी में जवान हुई पीढ़ी के बारे में हम जो सुनते आए हैं वो कहानी कुछ ऐसी है- यह पीढ़ी कर्ज़ का बोझ उठाकर चल रही है.

अकेले ब्रिटेन में पढ़ाई के लिए लिए गए कर्ज़ अगले 25 साल में एक खरब पाउंड (एक हजार अरब पाउंड) को पार कर सकती है. डॉलर में यह रक़म 1270 अरब डॉलर के क़रीब है.

ज़िंदगी गुजारने का खर्च बढ़ने और तनख़्वाह कम होने से उन्हें किराया चुकाने में भी मुश्किलें होती हैं. आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं.

पीढ़ी दर पीढ़ी दौलत घटती जा रही है. पैसों के मामले में आज के युवा पिछली पीढ़ी से बदतर हालत में हैं.

इस कहानी में कुछ भी हैरान करने वाला नहीं है. 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी ने युवा पीढ़ी को तगड़ी चोट पहुंचाई है.

इस पीढ़ी के कई नौजवानों की शुरुआत ही संकटों में घिरी उस अर्थव्यवस्था में हुई, जिससे पूरी तरह निकलने के लिए कई देश अब भी छटपटा रहे हैं.

तनख़्वाह सुस्त रफ़्तार से बढ़ी. ज़िंदगी गुजारने का ख़र्च बढ़ गया और रिटायरमेंट के लिए कोई बचत नहीं हो पाई. मतलब यह कि इस पीढ़ी को बुढ़ापे का इंतज़ाम अभी करना है.

वे कभी काम छोड़ने का जोखिम उठा सकते हैं, यह भी बड़ा सवाल है.

विश्व आर्थिक मंच (WEF) का अनुमान है कि 2050 तक, जब युवा रिटायर होना शुरू होंगे, तब रिटायरमेंट के लिए ज़रूरी बचत और असल की बचत में 427 हज़ार अरब डॉलर का अंतर होगा.

2015 में यह अंतर 67 हजार अरब डॉलर का था. यानी 35 साल में यह अंतर छह गुणा से भी ज़्यादा बढ़ने वाला है.

लंबी जीवन प्रत्याशा, विकास और बचत दर में कमी के साथ-साथ वित्तीय साक्षरता का निम्न स्तर इस अंतर को बढ़ा रहे हैं.

इन सबसे भविष्य की कोई आशावादी तस्वीर नहीं बनती. लेकिन शायद एक स्थिति ऐसी भी है जिसमें हालात इतनी नाउम्मीदी से भरे नहीं हैं.

क्या सबसे अमीर पीढ़ी "बेबी बूमर्स" से विरासत में मिलने वाला धन इस पीढ़ी की किस्मत को पलट देगा?

तूफ़ान में शरण

मिलेनियल्स के उलट बेबी बूमर्स (1946 से 1964 के बीच पैदा हुई पीढ़ी) इतिहास की सबसे अमीर पीढ़ी है और 2030 तक वही सबसे अमीर रहेगी.

रॉयल बैंक ऑफ़ कनाडा की वेल्थ ट्रांसफर रिपोर्ट के मुताबिक जब यह पीढ़ी परिवार के युवा सदस्यों को अपनी दौलत देगी तब सिर्फ़ ब्रिटेन और उत्तरी अमरीका में ही मिलेनियल्स को 4000 अरब डॉलर की जायदाद मिलेगी.

जिन मिलेनियल्स के परिवार में बुज़ुर्ग पीढ़ी है, उनको विरासत में मिलने वाली यह जायदाद उनके हालात बदल देगी.

अगर मिलेनियल्स की आर्थिक तंगी दूर करने का यही उपाय है तो क्या उनको विरासत की दौलत पाने के लिए बेबी बूमर्स पीढ़ी के मरने का इंतज़ार करना होगा?

यूबीएस (UBS) वेल्थ मैनेजमेंट के चीफ़ ग्लोबल इकोनॉमिस्ट पॉल डोनोवन ने यह दलील रखी है.

डोनोवन ने ही इस साल की शुरुआत में अनुमान लगाया था कि मिलेनियल्स की पीढ़ी एक दिन इतिहास की सबसे अमीर पीढ़ी बनेगी.

बिज़नेस इनसाइडर से बात करते हुए उन्होंने दलील दी थी कि अर्थव्यवस्था से संपत्ति भाप की तरह उड़कर ग़ायब नहीं होती.

चूंकि बेबी बूमर्स पीढ़ी मिलेनियल्स से बड़ी है, इसलिए जब उनकी दौलत इस पीढ़ी तक पहुंचेगी तो वह इस पीढ़ी को पिछली पीढ़ी से ज़्यादा मालामाल कर देगी. वजह यह है कि उतनी ही दौलत पहले से कम लोगों में बंटेगी.

परिवार में ही सब कुछ

जर्मनी की यूनिवर्सिटी ऑफ़ बॉन में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर मॉरिट्ज़ शुलेरिक कहते हैं कि यह इतना सीधा नहीं है.

शुलेरिक के मुताबिक एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को संपत्ति हस्तांतरण का मॉडल, जिसमें मिलेनियल्स सबसे अमीर पीढ़ी बनेंगे, सिर्फ़ एक फ़ीसदी लोगों पर लागू होता है.

"यह सिर्फ़ उन लोगों पर लागू होता है जिनके पास इतनी दौलत है कि वे कभी खर्च ही नहीं कर पाएंगे."

"साधारण लोग सोचते हैं कि वे अपने बुढ़ापे के लिए बचत करते हैं और जब उनके पास आमदनी का कोई ज़रिया नहीं होता तब वे अपनी ज़रूरतों के लिए अपनी बचत और दौलत से पैसे खर्च करते हैं. यही स्टैंडर्ड इकनॉमिक मॉडल है."

शुलेरिक कहते हैं, "उनकी ज़िंदगी के अंत में विरासत की कुछ दौलत बचती है, लेकिन वह बहुत ज्यादा नहीं होती."

फेडरल रिज़र्व बैंक के सेंट लुइस सेंटर फॉर हाउसहोल्ड फाइनेंशियल स्टैबिलिटी के मुख्य विश्लेषक लॉवेल आर. रिकेट्स इससे सहमति जताते हैं.

रिकेट्स के मुताबिक अगली पीढ़ी को "अच्छी ख़ासी दौलत" देने वाले बेबी बूमर्स बहुत कम होंगे.

यूएस फेडरल रिजर्व बैंक की जून 2018 की रिपोर्ट इस पर मुहर लगाती है. इसके मुताबिक 1995 से 2016 के बीच सिर्फ़ दो फीसदी वसीयत 10 लाख डॉलर या उससे ज़्यादा की थी. फिर भी यह कुल संपत्ति हस्तांतरण के 40 फ़ीसदी थी.

हालांकि कुछ संपत्तियों का मूल्य बचा रहता है और कुछ का बढ़ता भी है, फिर भी रिकेट्स कहते हैं कि वह यह मानकर नहीं चल सकते कि बेबी बूमर्स सारी दौलत आखिर तक बचाकर रखेंगे.

"जीवन-स्तर ऊंचा बनाए रखने के लिए बुढ़ापे में घर या दूसरी किसी संपत्ति को बेचना पड़ सकता है. ऐसे में वह संपत्ति अर्थव्यवस्था से गायब नहीं होती, फिर भी वह बची रहे और अगली पीढ़ी को ही मिले, यह जरूरी नहीं."

प्लान बी की नहीं प्लान ए की सोचो

रिकेट्स कहते हैं कि दौलत एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के हाथ जाती भी है तो यह देखना महत्वपूर्ण है कि ऐसा कब होता है.

फेडरल रिज़र्व बैंक की डेमोग्राफिक्स ऑफ़ वेल्थ रिपोर्ट में शोधकर्ताओं ने लिखा है कि अमरीका में 1980 के दशक में पैदा हुए लोग जिन घरों के प्रमुख हैं, उनकी संपत्ति उम्मीद से 34 फ़ीसदी कम है.

रिकेट्स कहते हैं, "ये परिवार घर ख़रीदने, बच्चों को पढ़ाने-लिखाने और रिटायरमेंट के लिए बचत करने जैसे अहम काम बहुत कम दौलत के साथ कर रहे हैं."

"भविष्य में अगर उन्हें अचानक दौलत मिलती भी है तो उससे इन परिवारों के मौजूदा वित्तीय दायित्व पूरा करने में मदद नहीं मिलती. दूसरे शब्दों में, भविष्य में दौलत मिलने का भरोसा उनके आज के कर्ज़ के लिए जरूरी अग्रिम भुगतान जुटाने में मदद नहीं करता."

यदि आप भी उन मिलेनियल्स में शामिल हैं, जिनको अचानक ढेर सारी दौलत मिलने का भरोसा है तो डोनोवन का मॉडल आप पर लागू नहीं होता.

विरासत में दौलत मिलने का इंतज़ार आपका प्लान ए नहीं हो सकता. अगर यह है भी तो आपको बहुत लंबा इंतज़ार करना पड़ सकता है.

पिछली पीढ़ियां अपनी रिटायरमेंट बचत के साथ संघर्ष कर रही हैं और कम खर्च में लंबा जीवन जी रही हैं. मिलेनियल्स अपने रिटायरमेंट के लिए बचत में लगे हैं. शायद वे सही विकल्प चुन रहे हैं और वहां पैसे लगा रहे हैं, जहां उतार-चढ़ाव कम हैं.

ब्याज दर बढ़ने से बनी उम्मीद उतनी रोमांचक नहीं है जितना कि अचानक मिला हुआ धन, लेकिन मिलेनियल्स वह हासिल कर रहे हैं जो वे कर सकते हैं.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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