ईमेल या मैसेज, आपकी पसंद क्या है

कैपिटल

इमेज स्रोत, Getty Images

    • Author, ब्रायन लफ़किन
    • पदनाम, संवाददाता, बीबीसी कैपिटल

क़रीब 15 साल पहले मैं इलेक्ट्रॉनिक्स की एक दुकान पर पार्ट-टाइम नौकरी करता था. वहां मेरी एक सहयोगी ने मुझसे पूछा कि क्या मैं टेक्स्ट मैसेज करता हूँ.

उसने कहा था, "मुझे इसकी लत गई है. इसमें बहुत मज़ा है."

उन दिनों ज्यादातर लोग पुराने फ़ीचर वाले फ़ोन चलाते थे. टेक्स्ट मैसेज में कैरेक्टर की सीमा ट्विटर से भी कम होती थी.

वह धीमे थे और महंगे भी. प्लास्टिक के पुराने कीपैड पर टेक्स्ट लिखना भी मुश्किल था.

मुझे लगता था कि ये कुछ दिनों का बुलबुला है, फूट जाएगा. लेकिन मैं गलत था.

पहला टेक्स्ट मैसेज 1992 में ब्रिटेन में भेजा गया था. उसमें कहा गया था- मेरी क्रिसमस.

जापान जैसे देशों में मोबाइल फ़ोन लोकप्रिय हुआ तो एसएमएस तेज़ी से बढ़ा. अमरीका में ये थोड़ी देर से पहुंचा. फिर भी सन् 2000 तक ये दुनिया भर में पहुंच चुका था.

एक अनुमान के मुताबिक़ 2012 में मोबाइल फ़ोन से दुनिया भर में 14,700 अरब मैसेज भेजे गए. 2017 में ये संख्या 28,200 अरब तक पहुंच गई.

शॉर्ट मैसेज सर्विस (एसएमएस) और टेक्स्ट मैसेज के दूसरे तरीके इतने पॉपुलर हो रहे हैं कि इसने ई-मेल को बढ़ने ही नहीं दिया.

ज्यादा दिन नहीं हुए जब ई-मेल एक-दूसरे के संपर्क में रहने का प्रभावी और फैशनेबल साधन था. लेकिन ई-मेल से जल्द ही लोगों का जी उचट गया. लोग ई-मेल को नापसंद करने लगे. मगर टेक्स्ट मैसेज के साथ उनका याराना बना रहा. कई लोग तब तक टेक्स्ट करने में लगे रहते हैं, जब तक कि टाइप करते-करते उनके अंगूठे दर्द ना करने लग जाए.

ई-मेल से इस नफ़रत और टेक्स्ट मैसेज से मुहब्बत का कारण क्या है?

कैपिटल

इमेज स्रोत, Getty Images

औपचारिक और अवांछित

द अटलांटिक मैगज़ीन लिखता है कि क़रीब दो दशक पहले तक ई-मेल आने पर लोग खुश होते थे.

90 के दशक में अमरीका और कनाडा में लोकप्रिय इंटरनेट पोर्टल AOL अपने यूजर्स को साइन-इन करने पर ये नोटिफ़िकेशन देता था कि आपको कोई ई-मेल आया है. लेकिन ये सब ज्यादा दिनों तक नहीं चला.

अब अगर एक दिन के लिए भी ऑफ़िस से दूर रहें तो अगले दिन इनबॉक्स भरा हुआ मिलता है. इनमें से ढेरों गैर जरूरी ई-मेल होते हैं. कुछ भी ई-मेल ऐसे होते हैं जिनमें कुछ सोच-विचार करके जवाब देने की जरूरत होती है.

न्यूयॉर्क की बफ़ैलो यूनिवर्सिटी में कम्युनिकेशन के प्रोफ़ेसर माइकल स्टेफनन कहते हैं, "बहुत सारे लोग ई-मेल से इसीलिए बिदकते हैं क्योंकि ये अवांछित विज्ञापन और स्पैम का जरिया बन गई हैं."

वाटरलू यूनिवर्सिटी में बिज़नेस राइटिंग पढ़ाने वाली ऐमी मॉरिसन कहती हैं कि ई-मेल ऑफ़िस फॉर्मेट से बंधे हैं. कौन भेज रहा है, किसे भेज रहा है, ई-मेल की बॉडी क्या है, ये सब ध्यान रखना पड़ता है. इसलिए लोग ई-मेल से घबराते हैं.

मॉरिसन कहती हैं, "जिन दिनों ऑनलाइन कम्युनिकेशन के दूसरे साधन उपलब्ध नहीं थे और सबके पास इंटरनेट भी नहीं था, उन दिनों लोग इसका इस्तेमाल मौज-मस्ती के साथ करते थे."

हमें एक-दूसरे के ई-मेल एड्रेस याद करने पड़ते हैं. जब आपकी जानकारी के 5 लोग ही ई-मेल यूज़ कर रहे थे तो उनको याद करना आसान था.

90 के दशक के बाद मौज-मस्ती के लिए ई-मेल भेजने वाले और काम के लिए इसका प्रयोग करने वाले का अनुपात बदलने लगा.

अब गैरजरूरी ई-मेल से हमारे इन-बॉक्स भर जाते हैं. बॉस हमें ई-मेल भेजते हैं, क्लाएंट ई-मेल भेजते हैं और जिन्हें हम नहीं जानते वे भी ई-मेल भेजते हैं.

मॉरिसन कहती हैं, "गैप के टी-शर्ट पर 3 डॉलर की छूट पाने के लिए आप उन्हें अपना ई-मेल एड्रेस देते हैं और फिर पूरी ज़िंदगी हर रोज उनके ई-मेल रिसीव करते रहते हैं."

रोजाना जितने ई-मेल हमें मिलते हैं, उन सबको देखना भी मुमकिन नहीं.

Presentational grey line
कैपिटल

इमेज स्रोत, Getty Images

टेक्स्ट अपना सा लगता है

इस सदी में पैदा हुए युवा जानते ही नहीं कि स्मार्टफ़ोन के बिना ज़िंदगी क्या होती है.

सभी स्मार्टफ़ोन तुरंत मैसेज भेजने वाले कई ऐप से लैस हैं. इन ऐप्स ने टेक्स्ट मैसेज को नई ज़िंदगी दी है.

जेनरेशन ज़ेड (Z) के इस युवा वर्ग के लिए ई-मेल सिर्फ़ ऑफ़िस या बिजनेस के काम से जुड़ी चीज़ है.

साल 2000 के बाद पैदा हुआ जेनरेशन ज़ेड ने ई-मेल को रुख़सत भी नहीं किया है. इस पीढ़ी के क़रीब 85 फ़ीसदी युवा मानते हैं कि ई-मेल संचार का एक ज़रूरी साधन है.

1980 से 2000 के बीच पैदा हुए जेनरेशन वाई (Y) के 89 फ़ीसदी लोग और 1965 से 1980 के बीच पैदा हुए जेनरेशन एक्स (X) के 92 फ़ीसदी लोग ई-मेल को ज़रूरी समझते हैं.

ऑन्टेरियो यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में सोशल साइंस की प्रोफ़ेसर शैरॉन लॉरिशेला पिछले 10 साल से छात्रों को अपना फ़ोन नंबर दे रही हैं. वे उन्हें कहती हैं कि कुछ भी सवाल हो तो मुझे टेक्स्ट मैसेज करो.

शेरॉन शैक्षिक संस्थानों में 18 से 24 साल के युवाओं पर एक रिसर्च कर रही हैं. वे ये पता लगा रही हैं कि नौजवान छात्र अपने फैकल्टी के साथ ई-मेल, टेक्स्ट और स्काइप जैसे साधनों का कैसे इस्तेमाल करते हैं.

शेरॉन ने पाया कि छात्र ई-मेल को औपचारिक समझते हैं और इसे स्टेटस और वरिष्ठता से जोड़कर देखते हैं.

"सीनियर-जूनियर जैसे कि फैकल्टी और स्टूडेंट्स के बीच ई-मेल पसंद किया जाता है, लेकिन बराबरी और अंतरंगता के रिश्ते में टेक्स्ट या सोशल मीडिया ही पहली पसंद है."

टेक्स्ट मैसेज में एक अपनापन है. बातचीत शुरू करने के लिए आपको बस दूसरे का मोबाइल नंबर, वॉट्सऐप नंबर या फ़ेसबुक मैसेंजर आईडी की ज़रूरत होती है. एक टेक्स्ट मैसेज के बाद सिलसिला चल पड़ता है.

ई-मेल में मेहनत करनी पड़ती है. आपको जवाब देना पड़ता है, कुछ करने का वादा करना पड़ता है.

ई-मेल के साथ समय का बंधन नहीं है. ई-मेल का जवाब कभी भी दिया जा सकता है. इसलिए इनबॉक्स में उनका ढेर लगता रहता है. ई-मेल का जवाब देना बोझिल लगता है. इसके मुकाबले टेक्स्ट मैसेज चुटकियों में हो जाता है.

लॉरिशेला कहती हैं कि पिछले 10 साल में टेक्स्ट मैसेज से उन्हें कभी कोई परेशानी नहीं हुई. उनके छात्र उन्हें टेक्स्ट मैसेज भेजते हैं. असाइमेंट के बारे में पूछते हैं. क्लास में देर से आने के बारे में बता देते हैं. वे मैसेज में क्या लिख रहे हैं, उन शब्दों के बारे में ज़्यादा माथापच्ची नहीं करते.

लॉरिशेला टेक्स्ट की जगह ई-मेल का इस्तेमाल नहीं करना चाहतीं क्योंकि उसमें औपचारिकता है. उसमें लंबे और सुविचारित जवाब की जरूरत होती है.

ई-मेल उनके लिए है, जिनको हम अच्छे से नहीं जानते. छात्र भी ई-मेल का प्रयोग नहीं करना चाहते. वे कॉल तो बिल्कुल भी नहीं करते.

कैपिटल

इमेज स्रोत, Getty Images

टेक्स्ट की मौत!

मैसेज भेजने और पाने का अगर कोई नया तरीका आ जाए तो क्या टेक्स्ट मैसेज का भी वही हाल होने वाला है जो ई-मेल का हुआ?

जेम्स आइवरी वर्जीनिया पॉलिटेक्निक इंस्टीट्यूट एंड स्टेट यूनिवर्सिटी में कम्युनिकेशन के प्रोफ़ेसर हैं. वे कहते हैं, "एक टेक्नोलॉजी अपने साथ दूसरी टेक्नोलॉजी लेकर आती है. ये प्रक्रिया बहुत तेज़ हो गई है."

इंटरनेट और कंप्यूटर ई-मेल लेकर आए. इससे स्मार्टफ़ोन में टेक्स्ट मैसेजिंग को रास्ता मिला. स्मार्टफ़ोन हाई रिज्यॉलूशन कैमरा से लैस हैं. ये कैमरे मैसेजिंग के नये रास्ते बना रहे हैं.

बफ़ैलो यूनिवर्सिटी के स्टेफनन कहते हैं, "मुझे लगता है कि टेक्स्ट जा रहा है. स्नैपचैट तस्वीरों के जरिये भावनाएं ज़ाहिर करने की सुविधा देता है. ये पॉपुलर हो रहा है."

2014 से स्नैपचैट के यूजर्स लगातार बढ़ रहे हैं. आज दुनिया भर में इसके 20 करोड़ यूजर्स हैं.

इंस्टाग्राम, यू-ट्यूब और जीआईएफ़ ने एक विजुअल कम्युनिकेशन कल्चर तैयार किया है. इसमें सिर्फ़ टेक्स्ट नहीं है. इसमें सेल्फ़ी है, बूमरैंग है, यूनिकॉर्न स्टिकर्स हैं, बबल में लिखा टेक्स्ट है.

लॉरिशेला कहती हैं, "टेक्स्ट में सिर्फ़ शब्द हैं. जब मुझे अपनी बेटी का ध्यान खींचना होता है तो मैं स्नैपचैट भेजती हूँ."

"मैं अपनी ज़िंदगी में भी इसे महसूस करती हूँ. फ़ेसबुक मैसेंजर पर कई मैसेज पड़े रहते हैं. मैं समय से उनका जवाब नहीं दे पाती. शायद ये भी ई-मेल की राह पर बढ़ रहा है."

सारी ख़ामियों के बावजूद ई-मेल में अब भी एक ख़ासियत है जो इसे सबसे अलग करता है.

आइवरी बताते हैं, "ई-मेल की जगह लेने के लिए आपस में प्रतियोगिता कर रही सारी टेक्नोलॉजी या ऐप किसी न किसी व्यक्ति या कंपनी की जागीर हैं. जैसे स्नैपचैट के सीईओ या फिर फ़ेसबुक के सीईओ की. ई-मेल की वेब टेक्नोलॉजी किसी एक की नहीं है."

ये सच है कि हॉटमेल माइक्रोसॉफ्ट का है और जीमेल गूगल का है, लेकिन ई-मेल का कॉन्सेप्ट किसी एक कंपनी का नहीं है.

टेक्स्ट मैसेज भेजने के प्लेटफ़ॉर्म ऐप तक सीमित होते जा रहे हैं. मैसेज भेजने के हमारे तरीके निजी कंपनियों पर निर्भर करने लगे हैं. वे इसके नियम बनाने लगे हैं.

मॉरिसन कहते हैं, "जब आपके बॉस आपको टेक्स्ट मैसेज करने लगें तो समझिए ये ख़त्म हो गया. फिर इसमें कोई मज़ा नहीं रहेगा. ये कुछ ऐसा होगा जैसे ऑफ़िस में कोई कॉकटेल पार्टी रखें और सोचते रहें कि इसमें मज़ा क्यों नहीं आ रहा."

Presentational grey line
Presentational grey line

(बीबीसी कैपिटल पर इस स्टोरी को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. आप बीबीसी कैपिटल को फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)