कहाँ और क्यों चोरी हो रहे हैं उल्लू और बाज़

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- Author, रिचर्ड ग्रे
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
स्कॉटलैंड के ल्यूइस द्वीप पर वो एक आम तूफ़ानी रात थी.
सुबह हुई, तो तेज़ हवाओं के बीच वहां के रहने वाले डोनल्ड मैक्लियोड अपने पालतू परिंदों का हाल जानने के लिए निकले. ये डोनल्ड का रोज़ का काम था. लेकिन जैसे ही वो अपने परिंदों के दड़बे पर पहुंचे, तो देखा कि उसकी छत उखड़ी हुई थी.
डोनल्ड ने देखा कि परिंदों के दड़बे की छत को किसी ने ऊपर से काट दिया था. उनका पालतू उल्लू स्क्रैम्प भी ग़ायब था. किसी ने चिड़ियाघर की छत काटकर उसे चुरा लिया था. हो सकता है कि इस दौरान वो बचकर निकल भागा हो.
डोनल्ड मैक्लियोड ने बाज और दूसरे परिंदों को पालने की ट्रेनिंग ली हुई है. वो पांच बरस के पालतू उल्लू स्क्रैम्प की मदद से उन बच्चों का दिल बहलाते थे, जो उनके यहां ठहरने आते थे. डोनल्ड, आइल ऑफ़ ल्यूइस में एक 'बेड ऐंड ब्रेकफ़ास्ट' चलाते हैं. यहां आकर लोग नाश्ता-खाना खा सकते हैं, और अपने बच्चों को कुछ देर ठहरा भी सकते हैं.
अपने पालतू उल्लू स्क्रैम्प की चोरी से डोनल्ड बहुत दुखी हैं. वो कहते हैं कि स्क्रैम्प परिवार के सदस्य जैसा था. उसके जाने से परिवार को गहरा सदमा लगा है.
डोनल्ड के चिड़ियाघर में ऐसी चोरी कोई सामान्य घटना नहीं. ल्यूइस द्वीप के किनारे डोनल्ड का रेस्टोरेंट रिहाइशी बस्ती से अलग है. यहां अपराध बहुत कम होते हैं. किसी तरह की चोरी, उसमे भी परिंदे की चोरी बहुत असामान्य घटना थी.
लेकिन, ये ऐसा जुर्म है, जो बार-बार हो रहा है. ख़ास तौर से उन लोगों के लिए अब ये आम हो चला है, जो पक्षी पालते है. लोगों को शक है कि अपराधी नकदी के लिए इन पक्षियों को चुरा रहे हैं.

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नकदी का संकट
आज दुनिया के तमाम देश कैशलेस ट्रांजेक्शन को बढ़ावा दे रहे हैं. इस दशक के आख़िर तक दुनिया में कैशलेस लेन-देन की तादाद 726 अरब तक पहुंचने की उम्मीद है. ये 2015 से सालाना 10.9 फ़ीसद की दर से बढ़ रहा है.
भारत जैसे नक़दी आधारित अर्थव्यवस्था वाले देशों में भी कैशलेस लेन-देन बढ़ रहा है. सरकार इसे बढ़ावा देने में पूरी ताक़त लगा रही है.
ब्रिटेन में 2016 के मुक़ाबले 2017 में नक़द लेन-देन 15 प्रतिशत घटकर 13.1 अरब ट्रांजेक्शन ही रह गया. वहीं कार्ड से पेमेंट बढ़ गया.
जापान में नक़द लेन-देन 2017 में 8.5 फ़ीसद घट गया. वहीं चीन में मोबाइल पेमेंट 2016 की एक तिमाही में ही 20 फ़ीसद बढ़ गया.
लेकिन, जैसे-जैसे कार्ड, मोबाइल और ऑनलाइन पेमेंट बढ़ रहा है, वैसे-वैसे दुकानों और दूसरे कारोबारियों के यहां नक़दी रखने का चलन कम हो रहा है.
नक़द या कैश की ये कमी, अपराधियों के लिए बहुत बड़ा संकट बन गई है. कैश किसी भी चोर का सबसे अच्छा दोस्त होता है. इसे आसानी से ले जा सकते है. किसी को पता भी नहीं चल सकता. ख़र्च करने में भी सहूलत होती है.
लेकिन, अब जब दुनिया के तमाम देश कैशलेस हो रहे हैं, तो अपराधी अपनी फौरी अवैध कमाई के लिए नए तरीक़े तलाश रहे हैं.


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परिंदों की चोरी
स्वीडन में पिछले साल कुल लेन-देन का केवल 2 फ़ीसद ही नक़द में हुआ. स्वीडन की 20 फ़ीसद आबादी ने तो एक बार भी कैश नहीं निकाला. ज़ाहिर है स्वीडन के अपराधियों के लिए तो चुनौती काफ़ी बढ़ गई है.
1990 के दशक में स्वीडन में जहां औसतन 100 बैंक डकैतियां होती थीं, वो चार साल पहले घटकर 30 तक रह गई हैं. 2017 में स्वीडन में केवल 11 बैंक डकैतियां हुईं. इसी तरह गाड़ियों से लूट की घटनाएं भी लगातार कम हो रही हैं.
लेकिन, संरक्षित जातियों से जुड़े अपराध स्वीडन में बढ़ रहे हैं. 2016 में ऐसे 156 जुर्म दर्ज किए गए. क़ानून-व्यवस्था से जुड़े स्वीडन के अधिकारी बताते हैं कि दुर्लभ प्रजाति के उल्लुओं के अंडे और ऑर्किड की चोरी तेज़ी से बढ़ रही है. ये दोनों ही स्वीडन में संरक्षित प्रजातियां हैं.
इन्हें चोरी करके ब्लैक मार्केट में बेचा जाता है. फिर वहां से इन्हें तस्करी के ज़रिए दुनिया के दूसरे देशों जैसे सऊदी अरब, क़तर या संयुक्त अरब अमीरात पहुंचाया जाता है. इन देशों में दुर्लभ प्रजाति के परिंदे पालना स्टेटस सिंबल है. स्वीडन के पुलिस अधिकारी फिलिपो बैसिनी कहते हैं कि ग्रे आउल ब्लैक मार्केट में 1 लाख 12 हज़ार डॉलर तक का बिक सकता है.
ये हाल स्वीडन का ही नहीं है. कई और देशों में भी संरक्षित जातियों के जीवों की चोरियां और तस्करी बढ़ रही है.
ब्रिटेन में आज की तारीख़ में केवल 40 फ़ीसद ट्रांजेक्शन कैश में होता है. यहां भी संरक्षित परिंदों से जुड़े जुर्म बढ़ रहे हैं.
स्क्रैम्प जैसे उल्लू के तो शायद 100 पाउंड ही मिलें. लेकिन घुमंतू मादा बाज़ की क़ीमत 4 हज़ार पाउंड तक मिल सकती है. साइबेरिया में पाये जाने वाले बाज़ के लिए ब्लैक मार्केट में 75 हज़ार डॉलर तक मिल सकते हैं.
अरब देशों में इन परिंदों की बहुत मांग है. इसकी वजह से ही इनके दाम तेज़ी से बढ़ रहे हैं और इनसे जुड़े अपराध भी.

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'ग्लास ईल' की मांग
बेहद दुर्लभ हो चली ईल की ग्लास प्रजाति की भी भारी डिमांड है. एक टन वज़नी ईल के एवज़ में 8 लाख पाउंड या क़रीब दस लाख यूरो मिल सकते हैं. चीन में मुलायम ईल को ग्रिल कर के खाने का चलन है.
इस साल ही क़रीब 100 टन ईल को यूरोपीय देशों से तस्करी कर के चीन ले जाया गया. आज इसका अवैध कारोबार कोकीन की तस्करी जैसा मुनाफ़े का सौदा माना जाता है. हाल ही में ब्रिटिश पुलिस ने ईल की तस्करी करने वाले सिर्फ़ एक संगठन की पड़ताल की, तो पता चला कि उसने पांच साल में 25 करोड़ पाउंड की कमाई ईल की तस्करी से की थी.
ब्रिटेन की नेशनल वाइल्डलाइफ़ क्राइम यूनिट के अधिकारी एलन रॉबर्ट्स कहते हैं कि जंगली जानवरों से जुर्म की दुनिया का चेहरा पूरी तरह से बदल चुका है. आज संगठित अपराध से जुड़े अपराधी ऐसी प्रजातियों की तस्करी कर रहे हैं, जिसमें मोटा मुनाफ़ा है.
वैसे इन सारे अपराधों को सीधे तौर पर नक़दी की कमी से जोड़ना ठीक नहीं है. स्वीडन के पूर्व पुलिस अधिकारी ब्योर्न एरिक्सन आज नक़दी को वापस चलन में लाने की मुहीम छेड़े हुए हैं. वो इंटरपोल में भी काम कर चुके हैं. ब्योर्न एरिक्सन मानते हैं कि वाइल्डलाइफ़ की बढ़ती तस्करी का सीधा ताल्लुक़ कैश की कमी से है.
वो कहते हैं कि, 'अगर नक़द पैसे नहीं हैं, तो अपराधी कुछ और चुराएंगे. बहुत से लोग कहते हैं कि नक़द न होने से डकैतियां बंद हो जाएंगी. हो सकता है कि बैंक डकैतियां न हों, लेकिन अपराधी दूसरे जुर्म की तरफ़ मुड़ रहे हैं. नक़दी के विकल्प के तौर पर दूसरे अपराध तलाशे जा रहे हैं'.


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कैसी-कैसी चीज़ें हो रही चोरी?
पक्षियों और मछलियों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना मुश्किल काम है. इसलिए अब बड़े स्टोर्स में डकैती के दौरान अपराधी महंगे सामान पर ज़्यादा ध्यान देते हैं,
जैसे महंगी जींस, डिज़ाइनर हैंडबैग, महंगे रेज़र और ब्लेड, बेबी फॉर्मूला मिल्क, दांत सफ़ेद करने वाले केमिकल और डिटर्जेंट पाउडर लूटे जा रहे हैं.
अब स्टोर्स में कैश में लेन-देन बहुत कम होता जा रहा है. तो, अपराधी अब महंगे सामान से नक़दी के संकट की भरपाई कर रहे हैं. फिर इन्हें ब्लैक मार्केट में बेचकर कमाई की जाती है.
इसीलिए अपराधियों के लिए आईफ़ोन एक्स जैसे महंगे फ़ोन भी अच्छे टारगेट हैं. इन्हें दूसरे देशों में ले जाकर बेचा जाता है. सामान लूटना आसान भी है. दवा की दुकान से दवाओं की चोरी करना भी नक़द लूटने से आसान है. इसी तरह महंगे हैंडबैग और दूसरे क़ीमती सामान चुराकर ब्लैक मार्केट में बेचकर अच्छी कमाई की जा सकती है. हैंडबैग तो छीनना भी आसान जुर्म है.

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कई बार तो अपराधी ऐसे महंगे सामान ले जाकर स्टोर में ये कहकर देते हैं कि उनकी पर्ची खो गई है और अब वो इसके बदले में पैसे चाहते हैं. कई बार वो गिफ़्ट वाउचर का हवाला देकर भी सामान के बदले पैसे ले जाते हैं.
अब चोर उल्लू चुराएं, मछली की तस्करी करें या रेज़र ब्लेड चुराएं, उनके शिकार लोगों का दर्द तो एक जैसा ही रहता है.
जैसे डोनल्ड मैक्लियोड के लिए स्क्रैम्प का जाना. वो कहते हैं कि, 'स्क्रैम्प हमारे लिए बेशक़ीमती था'.
पुलिस अभी भी उस गुमशुदा उल्लू को तलाश रही है.

( ये रिचर्ड ग्रे की मूल स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी के पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं.)
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