विदेश में नौकरी के लिए भाषा से ज़्यादा क्या ज़रूरी?

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- Author, मैडी सावेज
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
अंग्रेज़ी अंतरराष्ट्रीय भाषा है. ये ज़बान सारी दुनिया को एक साथ जोड़ने का काम करती है. जो लोग विदेशों में नौकरी करना चाहते हैं, उनके लिए तो अंग्रेजी सीखना यूं भी बहुत ज़रूरी है.
मल्टीनेशनल कंपनियों ने अंग्रेज़ी को बढ़ावा देने में सबसे अहम रोल अदा किया है. यहां तक कि जिन देशों में अंग्रेज़ी नहीं बोली जाती, वहां के लोग भी इसे सीख रहे हैं. ख़ास तौर से नौजवान पीढ़ी में तो अंग्रेज़ी बोलने का शौक़ दीवानगी की हद तक है.
भारत जैसा देश जहां कमोबेश हर राज्य की अपनी भाषा है, वहां भी लोग अंग्रेज़ी ख़ूब बोलने लगे हैं. बल्कि जो लोग अंग्रेज़ी नहीं बोल पाते उन्हें कमतर समझा जाता है.
जब विदेश में नौकरी मानी जाती थी खराब
इक्कीसवीं सदी की पीढ़ी अंग्रेज़ी बोलने की वजह से ही पिछली पीढ़ियों के मुक़ाबले किसी भी देश के लोगों के साथ ज़्यादा आसानी से घुल-मिल जुल जाते हैं.
ब्रिटिश काउंसिल के मुताबिक़ 2020 तक दुनिया की एक चौथाई आबादी अंग्रेज़ी का भरपूर इस्तेमाल करने लगेगी.
एक दौर था जब लोग विदेश जाकर काम करना बुरा मानते थे. लोगों की सोच थी कि अपने ही देश में परिवार के पास रोज़गार मिलना खुशक़िस्मती है.

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लेकिन आज की पीढ़ी की सोच अलग है. वो दुनियाभर में जाकर काम करने के लिए तैयार है. ऐसा सिर्फ़ पैसा कमाने के लिहाज़ से नहीं है.
बल्कि, आज की पीढ़ी ज़्यादा से ज़्यादा लोगों से घुलना मिलना चाहती है. दुनिया को समझना चाहती है.
2017 में कराए गए ग्लोबल शेपर्स एनुअल सर्वे के मुताबिक़ 18 से 35 साल की उम्र वाले तक़रीबन 81 फ़ीसद लोग दूसरे देश जाकर काम करना चाहते हैं.
ये सर्वे वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम ने कराया था और इसे 180 देशों में किया गया था.
सांस्कृतिक ज्ञान है ज़्यादा अहम
आईटी कंसल्टेंट श्री केसनकुर्थी इस वक़्त दुबई में नौकरी कर रहे हैं. वो सिंगापुर, स्टॉकहोम और ब्रसेल्स में काम कर चुके हैं.
इनके मुताबिक़ अगर कोई लंबे वक़्त के लिए विदेश में रहना चाहता है, तो उसके लिए ज़रूरी है कि वो वहां के इलाक़ों में घूमे, स्थानीय लोगों से मेल-जोल बढ़ाए. वहां के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लें.
इस काम में उस देश में पहले से रह रहे विदेशी भी मदद कर सकते हैं.
'लीडिंग विद कल्चरल इंटेलिजेंस द न्यू सीक्रेट टू सक्सेस' के लेखक डेविड लिवरमोर ने क़रीब दस साल तक 30 देशों में कल्चरल इंटेलिजेंस पर रिसर्च की. जिसे उन्होंने (CQ) का नाम दिया.
इनके मुताबिक़ स्थानीय भाषा सीखने की अपनी अहमियत है. लेकिन उससे ज़्यादा ज़रूरी है, वहां के माहौल के साथ तालमेल बनाना.
लिवरमोर कहते हैं कि कुछ देशों की स्थानीय भाषा सीखे बग़ैर काम चल सकता है.

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लेकिन, कुछ जगहें ऐसी हैं जहां की भाषा और संस्कृति जाने बग़ैर काम नहीं चल सकता. हो सकता है कि कई जगह आपको अपने देश की संस्कृति से मिलते जुलते रीति-रिवाज मिल जाएं.
दुनिया में बहुत से देश ऐसे भी हैं जहां का खान-पान, रहना-सहना, बोल-चाल बिल्कुल अलग है. वहां अंग्रेज़ी भी बड़े पैमाने पर नहीं बोली जाती.
मिसाल के लिए अगर भारत का कोई नागरिक बांग्लादेश या पाकिस्तान जाकर रहता है, तो उसे उतनी दिक़्क़त नहीं होगी.
क्योंकि इन देशों का कल्चर और ज़बान भारत से बहुत जुदा नहीं है. लेकिन अगर रूस या किसी अफ़्रीक़ी देश में जाकर रहना पड़ जाए तो मुश्किल हो सकती है.
जापान में भाषा से अहम है सांस्कृतिक ज्ञान
इसी तरह जापान ऐसा देश है जिसे अप्रवासियों का गढ़ कहा जाता है. लेकिन यहां आने वाले अप्रवासियों को बड़ा सांस्कृतिक झटका लगता है. यहां के लोग शांत मिज़ाज, वक़्त के पाबंद, मेहनती और शिष्टाचारी होते हैं. यहां काम के घंटे भी ज़्यादा होते हैं. यहां के माहौल में ख़ुद को ढालना सभी के बस की बात नहीं.
जापान में काम करने के लिए जापानी भाषा सीखने से ज़्यादा ज़रूरी है यहां के तौर-तरीक़े सीखना. अगर ऐसा नहीं किया तो यहां के लोग कभी भी विदेशी नागरिकों को अपने साथ जगह नहीं देंगे.
काफ़ी दिनों से जापान में रह रहे अमरीकी रियू मियामोतो अपना नाम भी जापानी रख लिया है. उनके मुताबिक़ जो लोग जापान के लोगों के रहन-सहन से मेल नहीं खाते उन्हें वो 'गएजिन' यानी 'बाहर के निवासी' की संज्ञा देते हैं. लेकिन रियू ने जापान के रहन-सहन को इस हद तक अपना लिया है कि कोई उन्हें गएजिन नहीं कहता.

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जापानी नाम रख लेने से उन्हें कारोबारी रिश्ते बनाने में काफ़ी मदद मिली. जापानी भाषा सीखने के साथ उन्होंने यहां के रीति-रिवाज और पकवान बनाने सीखे. मियामोतो ने ख़ुद को जापानी तहज़ीब में इस हद तक समा लिया है कि उनकी अमरीकी पहचान धूमिल हो गई है.
स्वीडन में किन मुद्दों पर बात नहीं करते लोग
पश्चिम यूरोप में ऐसे बहुत से देश हैं जहां अंग्रेज़ी ख़ूब बोली जाती है.
यहां अंग्रेज़ी बोलने वाले अप्रवासियों को स्थानीय भाषा सीखने की बहुत ज़्यादा ज़रूरत नहीं होती. लेकिन स्वीडन में कल्चरल और स्थानीय भाषाओं का कोर्स कराने वाली कैरोलिन वर्नर का कहना है कि स्थानीय तौर-तरीक़े नहीं सीखने की गल़ती करके लोग बड़ी भूल करते हैं.
वो अपने कोर्स में लोगों को खाने-पीने से लेकर बात-चीत का तरीक़ा सिखाती हैं.
मिसाल के लिए स्वीडन में मज़हब, सियासत और कमाई के बारे में बात करना अच्छा नहीं समझा जाता.

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जो लोग इन बातों से वाक़िफ़ नहीं होते वो ग़लती कर बैठते हैं. कैरोलिन सुझाव देती हैं कि आप जहां भी जाएं कम से कम एक स्थानीय भाषा ज़रूर सीखें.
विदेशों में काम करना, वहां की भाषा और संस्कृति से ताल-मेल बिठाना आसान काम नहीं. कुछ लोगों के लिए अपना देश छोड़ कर विदेश को ही अपना वतन बनाने की नौबत आन पड़ती है.
हम जहां भी रहने लगते हैं वहां की ज़बान और कल्चर सीखने के बावजूद हम उस देश के निवासी नहीं बन पाते. हम जिस जगह पैदा होते हैं वहां की बहुत से बातें हमारे बर्ताव में पैदाइशी तौर पर शामिल हो जाती है.
लिहाज़ा हम कहीं भी रहें, वहां की ज़िंदगी का पूरा तरीक़ा भले ही सीख लें. फिर भी कहीं ना कहीं कोई कमी ज़रूर रह जाती है जो हमें अपने मूल देश का नागरिक बने रहने देती है.
फिर भी जिस जगह लोग रहने लगते हैं, वहां के तौर-तरीक़े सीखना उतना ही ज़रूरी हो जाता है, जितना कि वहां कि भाषा सीखना.
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