फ़ेसबुक की 'मौत' की भविष्यवाणियों में कितना दम?

मार्क ज़करबर्ग

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पिछले कुछ सालों में सोशल नेटवर्किंग साइट फ़ेसबुक कई बार विवादों में घिरी है. कभी विज्ञापनों को लेकर, तो कभी न्यूज़ फ़ीड में हेर-फेर को लेकर.

हाल ही में इस पर आरोप लगा कि इसने अपने यूज़र्स की निजी जानकारी का बिना उनकी इजाज़त के कारोबारी इस्तेमाल किया. उसे थर्ड पार्टी को इस्तेमाल करने दिया.

हर ऐसे विवाद के बाद भविष्यवाणी की गई कि फ़ेसबुक की मौत क़रीब है.

अगर ऐसा होता है, तो ये कोई अजूबा नहीं होगा. बहुत सी कंपनियां विवादों में पड़ने की वजह से तबाह हो गईं. सोशल नेटवर्किंग से जुड़ी तमाम कंपनियां भी मौत के सफ़र पर जा चुकी हैं.

ऐसे में अगर फ़ेसबुक की मौत की भविष्यवाणी हो रही है, तो ग़लत क्या है? लेकिन, ऐसा होना मुमकिन नहीं दिखता.

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मैंने फ़ेसबुक के बारे में तब सुना था, जब मैं अमरीका की इंडियाना यूनिवर्सिटी में ताज़ा-ताज़ा दाखिला लेकर पहुंचा था. मेरी उम्र के तमाम लोगों के बीच इसका शोर था.

हालांकि उस वक़्त मैं एओएल यानी अमेरिकन ऑनलाइन पर चैटिंग किया करता था. पर, मेरे दोस्तों ने मुझे फ़ेसबुक पर एकाउंट बनाने की सलाह दी. आज उस घटना को 14 बरस बीत चुके हैं.

सख़्त सवालों का सामना

पिछले महीने की बात करें, तो फ़ेसबुक के सीईओ मार्क ज़करबर्ग अमरीकी संसद की कमेटी से मुख़ातिब थे और सख़्त सवालों का सामना कर रहे थे.

ज़करबर्ग अपनी बातों से अमरीकी सांसदों को ये यक़ीन दिलाने की कोशिश कर रहे थे, कि उनकी सोशल नेटवर्किंग कंपनी पश्चिमी देशों के लोकतंत्र के लिए ख़तरा नहीं है. न ही वो अपने यूज़र्स की निजी जानकारियों को लेकर कोई बेपरवाही बरतते हैं.

इस सुनवाई के दौरान ज़करबर्ग ने माना कि उनकी कंपनी ने अपनी सेवाओं का इस्तेमाल फ़ेक न्यूज़ के तौर पर होने से रोकने के लिए ज़रूरी क़दम नहीं उठाए हैं. न ही उनकी वेबसाइट ने दूसरे देशों के चुनाव में दख़लंदाज़ी रोकने और डेटा लीक रोकने के लिए पूरी तरह से कारगर क़दम उठाया है.

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इस साल मार्च महीने में पता चला था कि ब्रिटेन की सियासी सलाहकार कंपनी कैम्ब्रिज एनालिटिका ने फ़ेसबुक के यूज़र्स की निजी जानकारियां उनकी इजाज़त के बग़ैर इस्तेमाल की थीं.

इस स्कैंडल को लेकर अमरीका ही नहीं भारत में भी बहुत बवाल हुआ था. इसके बाद कंपनी ने अपनी ग़लती मानी थी और अपने काम-काज के तरीक़े को सुधारने का वादा किया था.

निजी जानकारियों की सुरक्षा

अमरीकी संसद के बाद मार्क ज़करबर्ग को यूरोपीय यूनियन की संसद का सामना भी करना पड़ा था. जहां उन्हें अमरीका से भी मुश्किल सवाल झेलने पड़े थे. यूरोप ने तो अपने नागरिकों की निजी जानकारियां सुरक्षित करने के लिए जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन भी शुक्रवार से लागू कर दिया.

फ़ेसबुक आज उस शुरुआती कंपनी से बिल्कुल अलग है, जिस पर मेरे जैसे कॉलेज के छात्रों ने आज से 14 साल पहले अपना अकाउंट बनाया था. दोस्तों को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजा करते थे और अपनी हालिया पार्टियों और घूमने-फ़िरने की तस्वीरें अपलोड किया करते थे.

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पिछले 14 सालों में समाज भी बहुत बदला है और सोशल नेटवर्किंग भी. और फ़ेसबुक को तो जिसने शुरुआत में देखा था, वो आज उसे पहचान भी नहीं सकते.

कभी यूनिवर्सिटी के छात्रों के जुड़ने का ज़रिया रहा फ़ेसबुक आज तमाम देशों के चुनावों में दखलंदाज़ी से लेकर डेटा चोरी जैसे संगीन आरोप झेल रहा है.

कैसे बचा हुआ है फ़ेसबुक?

सवाल ये है कि जब इसी के जैसी माइस्पेस कंपनी बंद हो गई, तो फ़ेसबुक तमाम विवादों के बीच कैसे बचा हुआ है? क्या ऐसा होगा कि आगे चलकर फ़ेसबुक का हाल भी माइस्पेस जैसा होगा?

इस सवाल का जवाब है, नहीं.

ऐसे में माइस्पेस और फ्रैंडस्टर की चर्चा ज़रूरी है. फ़ेसबुक की कामयाबी की सबसे बड़ी वजह ये रही कि इसने सही वक़्त और सही जगह पर इंटरनेट की दुनिया में अपना कारोबार शुरू किया.

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ऑक्सफ़ोर्ड इंटरनेट इंस्टीट्यूट के बर्नी होगन कहते हैं कि, 'फ्रैंडस्टर की नाकामी की वजह बहुत साधारण थी. तब उसका वक़्त नहीं आया था. किसी भी बिज़नेस की कामयाबी के लिए ज़रूरी है कि उसके उत्पाद की उस वक़्त मांग हो.

सोशल नेटवर्किंग साइट उस वक़्त डिमांड में नहीं थी. न ही उस वक़्त फ़ेसबुक की कामयाबी के लिए ज़रूरी तकनीक विकसित हुई थी'.

आज फ़ेसबुक जिस इंजीनियरिंग से चलता है, फ्रैंडस्टर के ज़माने में वो तकनीक नहीं थीं. लेकिन 2004 के आते-आते इंटरनेट की रफ़्तार तेज़ हो गई थी. वेबसाइट की कोडिंग बेहतर हो गई थी.

फ्रैंडस्टर और फ्रेंड्स रियूनाइटेड जैसी कंपनियों को जिन तकनीकी चुनौतियों का सामना करना पड़ा, फ़ेसबुक को उससे फ़ायदा हुआ.

इंटरनेट को लेकर शंका

जब फ़ेसबुक की पूर्ववर्ती सोशल नेटवर्किंग कंपनियां बाज़ार में आईं, तो लोग अपनी निजी जानकारियां सार्वजनिक मंचों पर रखने से कतराते थे. उन्हें इंटरनेट को लेकर भी शंका रहा करती थी.

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1990 के दशक में तो लोगों को इंटरनेट पर अपना पहला नाम तक बताने से बचने की सलाह दी जाती थी. पर आज ज़माना सेल्फ़ी और 'ओवरशेयरिंग' का आ गया है.

फ़ेसबुक से पहले आई कंपनियों ने लोगों को सोशल नेटवर्किंग की आदत डाली. 'फ्रैंडस्टर और माइस्पेस ने फ़ेसबुक की कामयाबी की बुनियाद रखी'.

ब्रिटेन में फ्यूचर सोसाइटीज़ आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के निदेशक टिम ह्वांग कहते हैं कि कई बार कोशिश के बाद ही लोग समझ पाते हैं कि कोई उत्पाद क्या है और उनके लिए क्या फ़ायदे लेकर आया है.

नई सदी का कारवां आगे बढ़ा तो फ़ेसबुक सिलीकॉन वैली से अच्छे और काबिल आईटी इंजीनियरों को नौकरी पर रखने में कामयाब हुआ.

इसकी वजह से फ़ेसबुक एक ऐसा ढांचा खड़ा कर सका, जो तूफ़ानी रफ़्तार से बढ़ रहे अपने ग्राहकों यानी यूज़र बेस की मांग और ज़रूरतों को पूरा कर सके.

जैसे कि फ़ेसबुक की 'आपकी न्यूज़ फीड' सुविधा. ये अपने आप काम नहीं करती.

इसके लिए फ़ेसबुक के इंजीनियरों ने तमाम आंकड़ों से वो सिस्टम तैयार किया, जो आप के दोस्तों के सबसे अच्छे और आप को पसंद आने वाले अपडेट आपकी नज़र कर सके.

टिम ह्वांग कहते हैं कि फ़ेसबुक की कामयाबी में मोबाइल फ़ोन ने भी अहम रोल निभाया है. सस्ते स्मार्टफ़ोन की वजह से आज हर शख़्स के हाथ में इंटरनेट है.

भारत जैसे देशों में तो बहुत से लोग फ़ेसबुक को ही इंटरनेट मानते हैं. मोबाइल के बढ़ते बाज़ार ने फ़ेसबुक को भी कामयाबी के सुपर हाइवे पर दौड़ा दिया.

फ़ेसबुक की तबाही की भविष्यवाणियां

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जैसे-जैसे फ़ेसबुक की लोकप्रियता बढ़ी, वैसे-वैसे इसके ख़ात्मे की भविष्यवाणियां भी.

साल 2014 में अमरीका की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी ने भविष्यवाणी की कि 2015 से 2017 के बीच फ़ेसबुक अपने 80 फ़ीसद यूज़र्स गंवा देगा.

ये अनुमान कैम्ब्रिज एनालिटिका स्कैंडल के सामने आने से काफ़ी पहले लगाया गया था. लेकिन, ऐसा सोचना भी बेकार है.

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के बर्नी होगन कहते हैं कि आज फ़ेसबुक पूरे डिजिटल इकोसिस्टम से इस कदर जुड़ गया है कि इसे अलग करना कमोबेश नामुमकिन है. आप को तमाम वेबसाइट से जुड़ने के लिए फ़ेसबुक लॉगिन करना पड़ता है. सिनेमा के टिकट ख़रीदने से लेकर ऑनलाइन शॉपिंग तक, कुछ भी करने के लिए फ़ेसबुक का लॉगिन मांगा जाता है.

इसे कैसे फ़ेसबुक से अलग किया जा सकता है!

चले कई आंदोलन

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि फ़ेसबुक इंसान की एक बुनियादी ज़रूरत को भी पूरा करता है. इसलिए भी इसकी मौत की भविष्यवाणी करना फ़़िलहाल ग़लत होगा.

हर इंसान दूसरे से जुड़ना चाहता है. अपनी ख़ुशियां और ग़म, कामयाबियां, शोहरत, और उपलब्धियां दूसरों से बांटना चाहता है. फ़ेसबुक इस ज़रूरत को पूरा करता है.

फ़ेसबुक से हटने के लिए #DeleteFacebook जैसे कई आंदोलन चले. मगर अक्सर यूज़र्स फ़ेसबुक पर वापस आए.

अमरीका की विस्कॉन्सिन यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर कैटालानिया टोमा कहती हैं कि फ़ेसबुक छोड़कर जाने वाला कमोबेश हर शख़्स उस पर लौट आता है.

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वजह साफ़ है. सोशल नेटवर्किंग साइट्स एक इंसान के दूसरे से जुड़ने की बुनियादी ख़्वाहिश को पूरा करती हैं.

फिर, फ़ेसबुक पर एक-दूसरे से जुड़ने के और भी फ़ायदे हैं.

यूज़र बेस में गिरावट नहीं

कैटालानिया टोमा गिनाती हैं, 'आप को जज़्बाती हमदर्दी मिलती है. सलाह मिलती है. सुझाव मिलते हैं. नौकरी तलाशने में मदद मिलती है. पुराने दोस्त तलाशने में सहूलत होती है. कारोबार बढ़ाने में मदद मिलती है. दूसरों की ज़िंदगी में झांकने का मौक़ा मिलता है'.

यही वजह है कि लोग फ़ेसबुक से जुड़ते चले जाते हैं. छोड़ कर जाते हैं, तो वापस आ जाते हैं.

यही वजह है कि बार-बार विवादों में पड़ने के बावजूद फ़ेसबुक के यूज़र बेस में बहुत ज़्यादा गिरावट नहीं आई है.

बर्नी होगन कहते हैं कि जब तक हमारे हाथ में मोबाइल और इंटरनेट हैं, तब तक फ़ेसबुक का हमारी ज़िंदगी पर कंट्रोल बना रहेगा. क्योंकि हम जिस भी चीज़ में दिलचस्पी दिखाते हैं, सोशल मीडिया कंपनियां उसी को हमारे सामने रखकर मुनाफ़ा कमाती हैं.

ख़ुद ज़करबर्ग ने अमरीकी संसद में सुनवाई के दौरान क़बूला था कि उनकी आमदनी का ज़रिया विज्ञापन हैं.

अलविदा फ़ेसबुक?

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कैम्ब्रिज एनालिटिका स्कैंडल के बाद फ़ेसबुक के सीईओ मार्क ज़करबर्ग ने 8.7 करोड़ फ़ेसबुक यूज़र्स से उनकी निजी जानकारियां चुराने के लिए माफ़ी मांगी.

फिर भी अगर आप ये सोचें कि फ़ेसबुक का कारोबार घट रहा है, तो आप मुग़ालते में हैं. न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में मार्केटिंग के प्रोफ़ेसर स्कॉट गैलोवे कहते हैं कि फ़ेसबुक का कारोबार तेज़ी से बढ़ रहा है. इसमें और भी तेज़ी आएगी.

प्रोफ़ेसर स्कॉट कहते हैं कि लोग सोशल मीडिया के खेल से नाराज़ हैं. मगर सोचिए, वो अपना ग़ुस्सा कहां ज़ाहिर करते हैं? उसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर!

प्रोफ़ेसर स्कॉट कहते हैं कि फ़ेसबुक के औसतन 2.2 अरब मासिक यूज़र होते हैं. ऐसे में बड़ी विज्ञापन कंपनियों के लिए भी फ़ेसबुक पर विज्ञापन देने के सिवा रास्ता क्या है?

हालांकि कुछ हालिया रिसर्च बताती हैं कि नई पीढ़ी के लोगों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से उकताहट होने लगी है. वो अब फ़ेसबुक जैसी साइट्स पर कम वक़्त गुज़ारते हैं.

इन युवाओं के मुक़ाबले उनसे पहले की पीढ़ी ज़्यादा वक़्त फ़ेसबुक जैसी वेबसाइट पर गुज़ार रही है. ये उनके एकाकीपन को दूर करने का सबसे बड़ा ज़रिया है.

फ़ेसबुक की मनमानी पर रोक

अमरीका के मशहूर एमआईटी की प्रोफ़ेसर शेरी टर्कल कहती हैं कि आज सवाल ये नहीं है कि फ़ेसबुक का ख़ात्मा कब होगा? सवाल ये है कि हम इसे और बेहतर बनाने के लिए कैसे मजबूर कर सकते हैं.

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प्रोफ़ेसर टर्कल कहती हैं कि लोगों की बढ़ती जागरूकता से फ़ेसबुक डेटा लीक रोकने को मजबूर होगा. वो अपनी सेवाओं को ज़्यादा यूज़र फ्रैंडली बनाएगा.

लेकिन, एक सच ये भी है कि फ़ेसबुक बहुत बड़ी कंपनी है. इसके मुक़ाबले में कोई नहीं है. छोटी-मोटी कंपनियों को तो फ़ेसबुक चुटकी में निगल जाएगा. व्हाट्सऐप और इंस्टाग्राम इसकी मिसाल हैं.

फ़िलहाल तो फ़ेसबुक हमारी ज़िंदगी में इस कदर समा गया है, कि, निकट भविष्य में इससे निजात मिलती नहीं दिखती.

हां, ये हो सकता है कि सरकारें फ़ेसबुक की बढ़ती ताक़त से चेतें. इसे छोटी-छोटी कंपनियों में बांट दें.

फ़ेसबुक पर सख़्ती और निगरानी दोनों ही बढ़ती जा रही है. यूरोप ने जनरल डेटा प्राइवेसी रूल्स के ज़रिए फ़ेसबुक की मुश्कें कसी हैं.

आज ज़रूरत भी इसी की है, कि फ़ेसबुक को मनमानी करने से रोका जाए.

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