फ़ेसबुक, ट्विटर पर लोग क्यों करते हैं गाली-गलौज?

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- Author, गाई विंस
- पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
सोशल मीडिया के इस ज़माने में ट्रोलिंग का दौर चल रहा है. ऑनलाइन दुनिया में लोग ट्रोलिंग यानी गाली-गलौज, बदसलूकी और धमकियों के शिकार हो रहे हैं.
उन्हें किसी तरह की बात कहने पर बदनाम किया जा रहा है. किसी मसले का विरोध करने पर धमकाया जा रहा है.
आम तौर पर ट्रोलिंग के शिकार लोगों में महिलाएं और दबे-कुचले वर्ग से आने वाले लोग ज़्यादा हो रहे हैं. ख़ास तौर से महिलाओं को यौन हिंसा की धमकियां जैसे बलात्कार, गाली-गलौज या तेज़ाब फेंकने जैसी धमकियां दी जा रही हैं.
वो लोग, जो एक-दूसरे को जानते तक नहीं, वो एक-दूसरे से ऑनलाइन बदसलूकी करते हैं, बुरा बर्ताव करते हैं. गालियां और धमकियां देते हैं. कई बार ये धमकियां जान से मार देने तक पहुंच जाती हैं.
आख़िर माजरा क्या है?
क्यों लोग ऑनलाइन ट्रोलिंग कर रहे हैं? अच्छे-ख़ासे इंसान ट्रोल क्यों बन जाते हैं?
यूं तो हम किसी अजनबी से मिलते हैं, तो अक्सर मुस्कुरा कर ही मिलते हैं. कम बात करते हैं. बातचीत में बेतकल्लुफ़ी से ज़्यादा औपचारिकता होती है.
फिर ऑनलाइन दुनिया में एक-दूसरे से अजनबी लोग बुरा बर्ताव क्यों करते हैं?

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पश्चिमी देशों में मनोवैज्ञानिक इस सवाल का जवाब तलाशने में जुट गए हैं. बड़े पैमाने पर रिसर्च की जा रही है. इंसान के मनोविज्ञान में नए सिरे से झांका जा रहा है.
वैसे, इंसान आज जिस मुकाम पर है उसमें विरोध से ज़्यादा सहयोग का रोल रहा है.
आदिमानव, जब शिकारी बना, तो उसे आपसी सहयोग की ज़रूरत पड़ी. लोग एक-दूसरे के सहयोग से शिकार करने में सहूलियत के फ़ायदे देखने लगे.
आपसी सहयोग बढ़ा तो शिकार के इनाम को बांटकर खाने का सहयोग बढ़ा, छोटे-छोटे क़बीले बने.
इंसान का समाज ऐसे ही विकसित हुआ. जंगलों में छोटे-छोटे समूहों से पहले क़बीले बने. फिर बस्तियां बसीं. ये सिलसिला गांव, शहर, देश और दुनिया के तौर पर फैलता गया.

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ट्रोलिंग के निशाने पर महिलाएं
आज हम दुनिया में तरक़्क़ी के उरूज़ पर हैं. तमाम संसाधनों जैसे जंगल, ज़मीन, समंदर और पहाड़ पर इंसान का क़ब्ज़ा है.
जब हमने आपसी सहयोग से इतना कुछ हासिल कर लिया, तो ऑनलाइन दुनिया में ऐसा बर्ताव क्यों है?
रिसर्च बताते हैं कि क़रीब 40 फ़ीसद अमेरिकी वयस्क नागरिक ऑनलाइन ट्रोलिंग के शिकार हुए हैं. उनसे गाली-गलौज, बदसलूकी वाला बर्ताव किया गया. इसमें महिलाओं की तादाद बहुत ज़्यादा है.
ब्रिटेन में महिला सांसदों को अक्सर ऑनलाइन ट्रोलिंग झेलनी पड़ती है. एक रिसर्च से पता चला कि ब्रिटेन कुल महिला सांसद जितनी ट्रोलिंग की शिकार हुई, उनमें से आधे के निशाने पर तो अकेले अश्वेत महिला सांसद डाएन एबॉट थीं.

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रिसर्च ने इस नतीजे पर पहुंचे कि डाएन एक तो महिला हैं और दूसरे अश्वेत. इसलिए वो सबसे ज़्यादा ट्रोलिंग की शिकार हुईं.
क्योंकि वो समाज के ऐसे वर्ग से आती हैं, जिसे आज भी ब्रिटिश सोसाइटी में बराबरी का दर्जा नहीं है.
ऑनलाइन दुनिया की कड़वी हक़ीक़त यही है. महिलाओं और दबे-कुचले वर्ग से आने वाले सबसे ज़्यादा इसके शिकार होते हैं.
अमरीका की मशहूर येल यूनिवर्सिटी इस बारे में काफ़ी रिसर्च कर रही है. इस रिसर्च को करने वाली ह्यूमन को-ऑपरेशन लैब में लोगों को एक खेल खिलाया जाता है. इसमें आपस में सहयोग करने के फ़ायदे ज़्यादा हैं. जबकि अकेले खेलने में उतना फ़ायदा नहीं होता.

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रिसर्च में पाया गया कि सहयोग के फ़ायदे देखकर आम तौर पर ये खेल खेलने वाले आपस में तालमेल बनाकर खेल रहे थे. ये इंसान के सदियों के विकास का निचोड़ है. सहयोग की भावना ने हमें दुनिया पर राज करने का मौक़ा दिया है.
मज़ेदार बात ये है कि इस खेल में जब जीतने पर पैसे का बंटवारा होता है, तो सबको अकेले की जीत से कम ही पैसे मिलते हैं.
मगर लैब के निदेशक डेविड रैंड कहते हैं कि चूंकि कुल रक़म बड़ी दिखती है. इसलिए ज़्यादा फ़ायदे को देखते हुए खेल खेलने वाले इंसान आपस में सहयोग करते हैं.
डेविड रैंड मानते हैं कि इंसान के विकास की प्रक्रिया में सहयोग के जज़्बे का बहुत बड़ा रोल रहा है.
डेविड रैंड ने ये खेल हज़ारों लोगों को खिलाया है. इनमें अमरीका से लेकर अफ्रीका तक के लोग शामिल रहे हैं. इसी खेल के एक हिस्से में लोगों के दान देने की भावना को भी परखा जाता है.
रैंड बताते हैं कि जिन देशों में भ्रष्टाचार ज़्यादा है. सरकार पर लोगों का भरोसा कम है, वहां के लोग आम तौर पर दान देने में हिचकते हैं. वहीं अमरीका जैसे मुल्क़ों में लोग खुले दिल से दान करते हैं.
इसकी वजह शायद ये है कि लोगों को यक़ीन नहीं होता कि उनके दान के पैसे ज़रूरतमंद तक पहुंचेंगे.

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इंटरनेट पर कैसे गुस्सा निकालते हैं लोग?
ऑनलाइन दुनिया में लोग एक-दूसरे से अनजान हैं. एक दूसरे द्वारा पहचाने नहीं जाते.
इसलिए अगर किसी बर्ताव की वजह से उन्हें शर्मिंदगी उठानी भी पड़े, तो वो असल ज़िंदगी की शर्मिंदगी जैसी नहीं होती. नतीजा ये कि लोग आक्रामक हो उठते हैं. ज़्यादा बुरा बर्ताव करते हैं.
अमरीका की येल यूनिवर्सिटी में ही एक और लैब में ऑनलाइन बर्ताव पर रिसर्च चल रही है.
क्रॉकेट लैब में ये परखा जा रहा है कि आख़िर ऑनलाइन दुनिया में कैसे लोग अपना ग़ुस्सा निकालते हैं.
ऑनलाइन दुनिया में देखा गया है कि जो लोग ट्रोलिंग करते हैं, उनका विरोध कम होता है.
वहीं असल ज़िंदगी में अगर कोई आपके घर के आस-पास गंदगी फैलाता है, तो ख़तरा जानकर भी लोग जोखिम लेते हुए उसका विरोध करते हैं. इससे समाज में उनकी इमेज बेहतर होती है.

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ऑनलाइन दुनिया में ऐसा नहीं होता. इससे आपकी शोहरत पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आपने किसी ट्रोल की बदतमीज़ी का विरोध किया.
नतीजा ये कि किसी और से गाली-गलौज होने पर लोग ख़ामोश रहते हैं. उसकी अनदेखी कर देते हैं. या ख़ुद को उस चर्चा से अलग कर लेते हैं.
रिसर्च से एक बात और पता चली. आम ज़िंदगी में जहां हम ज़्यादा सुकून से होते हैं. वहीं फ़ेसबुक या ट्विटर खोलें, तो यूं लगता है कि जंग छिड़ी हुई है. किसी न किसी मसले पर हंगामा बरपा हुआ है.
किसी मुद्दे को लेकर गर्मा-गर्म बहस देखकर बहुत से लोग उसमें कूद पड़ते हैं. ख़ुद को विरोध जताने या समर्थन करने से रोक नहीं पाते.
आम तौर पर जज़्बाती लफ़्ज़ों वाले संदेश ख़ूब शेयर किए जाते हैं. ऐसे नैतिकता भरे ट्वीट के रिट्वीट होने की संभावना 20 फ़ीसद तक बढ़ जाती है.

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क्रॉकेट लैब की रिसर्चर मॉली क्रॉकेट कहती हैं कि ऐसे विरोध जताने वाले या नैतिकता भरे सोशल मीडिया मैसेज बहुत ज़्यादा शेयर किए जाते हैं.
सोशल मीडिया पर ऐसा इकोसिस्टम विकसित हो जाता है, जो किसी ख़ास पक्ष को बढ़ाने या विरोध करने का काम मिल-जुलकर करने लगता है.
ऐसा इसलिए होता है कि इसमें ज़रा भी जोखिम नहीं होता. अगर आप किसी गाली देने वाले या बुरी बात कहने वाले का विरोध करते हैं, तो बहुत से लोग आपको शाबाशी देने आगे आते हैं.
आप और भी जोखिम लेना शुरू कर देते हैं. विरोधी समूह इसका बहुत बुरा मानता है. फिर वो आपकी ट्रोलिंग शुरू कर देता है.

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वैसे ऑनलाइन दुनिया में नैतिकता दिखाना, किसी अच्छे मक़सद या मुद्दे का समर्थन करना काफ़ी बदलाव ला रहा है. #MeToo की मुहिम इसकी अच्छी मिसाल है.
वैसे ऑनलाइन गाली-गलौज करने वालों को बदला भी जा सकता है. याल यूनिवर्सिटी की ह्यमून नेचर लैब में एक और रिसर्च से ये बात सामने आई है.
ये रिसर्च निकोलस क्रिस्टाकिस कर रहे हैं.
निकोलस कहते हैं कि ऑनलाइन दुनिया में अगर कुछ लोगों को लीडर के तौर पर चिह्नित कर लिया जाए, तो उनकी मदद से बदलाव लाया जा सकता है.
बड़ी कंपनियां तो ऐसे लोगों की मदद से अपना प्रचार पहले से ही कर रही हैं. जैसे ट्विटर, फ़ेसबुक या इंस्टाग्राम पर बेहद लोकप्रिय लोगों को ब्रांड आइकन बनाया जा रहा है.

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वहीं, निकोलस क्रिस्टाकिस तो ऑनलाइन फ़र्ज़ी अकाउंट बनाकर लोगों को प्रेरित कर रहे हैं.
इन आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस अकाउंट्स को बोट कहते हैं. जो असल लोगों से ऑनलाइन दुनिया में संवाद करते हैं.
फिर उन्हें किसी ख़ास मक़सद में शामिल होने के लिए प्रेरित करते हैं. निकोलस ने ऐसी ही कोशिश से लैटिन अमरीकी देश होंडुरास में टीकाकरण अभियान के प्रचार में काफ़ी मदद जुटा ली थी.
ऐसे ही एक प्रयोग में निकोलस ने ऑनलाइन बोट्स की मदद से लोगों को समझाया कि आपस में सहयोग करने के फ़ायदे ही फ़ायदे हैं.
धीरे-धीरे ऐसे लोगों का समूह बनता गया, जो एक-दूसरे से अनजान होने पर भी आपस में सहयोग कर रहा था, ताकि ज़्यादा फ़ायदा उठाया जा सके.
लेकिन आगे जाकर ये देखा गया कि कुछ लोग इस सहयोग का नाजायज़ फ़ायदा उठा रहे थे.
इनकी देखा-देखी ग्रुप के दूसरे सदस्य भी ख़ुदग़र्ज़ी पर उतर आए. बात गाली-गलौज और धमकी तक जा पहुंची.

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निकोलस क्रिस्टाकिस ने फिर बोट्स के ज़रिए लोगों को सहयोग के फ़ायदे समझाने की कोशिश की. ये नक़ली सोशल अकाउंट आपस में सहयोग करते थे.
फिर उसके फ़ायदे भी ऑनलाइन शेयर करते थे. इस तरह धीरे-धीरे ग्रुप में फिर से सहयोग का जज़्बा क़ायम हुआ. जो लोग फिर भी ख़ुदग़र्ज़ी पर आमादा थे, वो धीरे-धीरे ग्रुप से बाहर कर दिए गए.
इस तजुर्बे से साफ़ है कि अगर हम बोट्स की मदद लें, तो ऑनलाइन बदसलूकी और गाली-गलौज पर क़ाबू पा सकते हैं.
अमरीका में अश्वेत लोगों से गाली-गलौज करने वाले ट्विटर खातों को जब फ़र्ज़ी गोरे लोगों के चेहरे वाले खातों से चेतावनी मिली, तो अश्वेतों को मिलने वाली नस्लीय धमकियों में काफ़ी कमी आ गई.
ऑनलाइन डेटा से आज इस बात की भविष्यवाणी की जा सकती है कि कब किसी ग्रुप में कोई चर्चा गाली-गलौज की तरफ़ बढ़ रही है. समय रहते इसे रोका भी जा सकता है.
हम में से बहुत से लोग हो सकता है कि वक़्ती तौर पर ही ट्रोलिंग करने लगें. ऐसे हालात की पहचान होने पर ट्रोलिंग को रोका जा सकता है.

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वैसे तमाम डेटा ये बताते हैं कि ऑनलाइन ट्रोलिंग का जितना शोर हो रहा है, उससे ज़्यादा लोग अच्छे मक़सद के लिए आपस में जुड़ रहे हैं.
जानकार कहते हैं कि इंसान के मौजूदा मिज़ाज का विकास हज़ारों साल में हुआ है. जबकि ऑनलाइन दुनिया महज़ दो दशक पुरानी है.
अभी ऑनलाइन दुनिया में हमारे बर्ताव का विकास शुरू ही हुआ है. इसलिए इसकी कमियां सामने आ रही हैं और इन्हें दुरुस्त करने की कोशिश भी हो रही है.
जैसे हम रूबरू बात करते हुए एक दूसरे के चेहरे के भाव पढ़कर जान लेते हैं कि फलां शख़्स नाराज़ हो रहा है, और फिर अपनी बात बदल लेते हैं. शायद आगे चलकर ऑनलाइन दुनिया में भी हम सामने वाले की नाख़ुशी को समय रहते समझ पाएंगे.

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तब तक हमें ट्रोलिंग से परंपरागत तरीक़ों से निपटना होगा. ऐसी चर्चाओं से ख़ुद को अलग रखना होगा, जहां गाली-गलौज और धमकियां होती हैं.
ऐसा बर्ताव बार-बार करने वाले को ब्लॉक कर सकते हैं. यौन हिंसा की धमकियां देने वालों की ऑनलाइन कंपनी और पुलिस से फ़ौरन शिकायत करनी चाहिए.
ऑनलाइन बदसलूकी से ज़्यादा परेशान हों, तो कुछ दिनों के लिए सोशल मीडिया से दूरी बना लें. घर-परिवार के लोगों और दोस्तों से बात करें.
कुल मिलाकर सोशल मीडिया अभी भी विकास के दौर में है. इसलिए इसके नफ़े-नुक़सान को लेकर किसी भी नतीजे पर पहुंचना जल्दबाज़ी होगी.
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