नाइट शिफ़्ट आपके शरीर के लिए कितनी ख़तरनाक?

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, सारा कीटिंग
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
दुनिया भर में बहुत से लोग रात में काम करते हैं. कई लोगों के लिए ये मजबूरी है. वहीं कुछ लोग इसे अपनी ख़ुशी से करते हैं.
अमरीका में अलास्का की रहने वाली ट्रेसी लोस्कर एक अस्पताल में काम करती हैं. वो 24 घंटे में से सोलह घंटे काम करती हैं. हफ्ते में चार दिन वो ऐसी शिफ़्ट करती हैं.
ट्रेसी पिछले 17 सालों से नाइट शिफ़्ट वाली नौकरी कर रही हैं. वो कहती हैं कि उन्हें रात में काम करना पसंद है. कॉल कम आते हैं. सड़कों और रेस्टोरेंट में भीड़ कम रहती है. हां एक दिक़्क़त होती है. अगर आप किसी चीज़ पर धीमी प्रतिक्रिया देते हैं तो आप के लिए नाइट शिफ़्ट में काम करना और मुश्किल हो सकता है.
मगर ट्रेसी के लिए ये शिफ़्ट फ़ायदेमंद है. उन्हें लंबी नाइट शिफ़्ट करने के एवज़ में महीने में दो हफ़्ते छुट्टी मिलती है. इसे वो नाइट शिफ़्ट की नौकरी का बोनस मानती हैं. ये वक़्त वो परिवार के साथ बिताती हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
नाइट शिफ़्ट से बढ़ता है कैंसर का ख़तरा
दुनिया भर में लाखों लोग रात में काम करते हैं. अमरीका की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च के मुताबिक़ विकसित देशों में 7 से 15 फ़ीसद लोग रात में काम करते हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दे रखी है कि रात में काम करने से कैंसर का ख़तरा बढ़ जाता है
आख़िर दुनिया में रात में काम करने का चलन कब शुरू हुआ था?
ब्रिटेन की ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर रसेल फ़ोस्टर कहते हैं कि इसकी बुनियाद अमरीकी अविष्कारक थॉमस अल्वा एडिसन ने रखी थी. एडिसन ने लाइट बल्ब का आविष्कार किया था. इसके साथ ही इंसान ने रात में होने वाले अंधेरे पर जीत हासिल कर ली.
प्रोफ़ेसर फ़ोस्टर कहते हैं कि हम सबका शरीर, क़ुदरती तौर पर दिन और रात की रोशनी के हिसाब से चलता है. इसे बायोलॉजिकल क्लॉक या सर्केडियन रिदम कहते हैं. यानी दिन की रोशनी में हमारा शरीर ज़्यादा सक्रिय हो जाता है. वहीं रात के अंधेरे में हमारा दिल सोने का करता है.
दिक़्क़त तब होती है, जब रात में काम करने वाले, दिन की रोशनी का सामना करते हैं. तब उनका शरीर, रोशनी के हिसाब से सक्रिय हो जाता है. उनकी नींद उड़ जाती है. वो सो नहीं पाते, तो रात में काम करने की उनकी रफ़्तार भी धीमी हो जाती है.

इमेज स्रोत, Getty Images
रात में काम करने के नुक़सान क्या हैं?
प्रोफ़ेसर फ़ोस्टर बताते हैं कि नाइट शिफ़्ट में हमारा ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है. शरीर में ग्लूकोज़ की आमदो-रफ़्त भी बढ़ जाती है. इससे हमारी ख़ून की नली में दबाव बढ़ जाता है. इससे डायबिटीज़ होने का ख़तरा बढ़ जाता है.
नाइट शिफ़्ट की वजह से बीमारियों से लड़ने की हमारी ताक़त भी कमज़ोर हो जाती है. इससे आंत का और ब्रेस्ट कैंसर होने की आशंका बढ़ जाती है.
नाइट शिफ़्ट करने वाले अक्सर नींद न आने की बीमारी के शिकार हो जाते हैं. लोग अक्सर थकान महसूस करते रहते हैं. उन्हें जानकारी और बात को समझने में दिक़्क़त होने लगती है. उनके अंदर हमदर्दी का एहसास कम होने लगता है.
प्रोफ़ेसर रसेल फ़ोस्टर कहते हैं कि तमाम नुक़सानों के बावजूद नाइट शिफ़्ट अब ख़त्म नहीं होने जा रही. हां, ये ज़रूर हो सकता है कि हम एहतियाती क़दम उठाकर इसके नुक़सान को कम कर सकें.
प्रोफ़ेसर फ़ोस्टर सलाह देते हैं कि कंपनियों को नाइट शिफ़्ट करने वाले कर्मचारियों की सेहत की जांच नियमित रूप से करानी चाहिए. चूंकि रात में काम करने वालों को दिल की बीमारियां होने का ख़तरा बढ़ जाता है. इसलिए इनके खान-पान पर भी कंपनियों को ध्यान देना चाहिए.

इमेज स्रोत, Getty Images
नाइट शिफ़्ट वालों को नहीं मिलता सेहतमंद खाना
रात की शिफ़्ट में अक्सर लोगों को सेहतमंद और अच्छा खाने को नहीं मिलता. कंपनियां नाइट शिफ़्ट के कर्मचारियों के लिए अच्छे और सेहतयाब खाने का इंतज़ाम कर सकती हैं.
असल में रात में काम करने वाले कार्बोहाइड्रेट से भरपूर चीज़ें ज़्यादा खाने लगते हैं. इससे उनका वज़न बढ़ने का अंदेशा रहता है.
चार-पांच दिन अच्छी नींद नहीं आती तो हमारे शरीर से घ्रेलिन नाम के हारमोन का रिसाव बढ़ जाता है. ये हमें भूख का एहसास कराता है. हम ग्लूकोज़ और कार्बोहाइड्रेट वाली चीज़ें खाने लगते हैं. इससे टाइप-2 डायबिटीज़ होने का डर बढ़ जाता है.
नींद न आने के आर्थिक नुक़सान भी हैं. रैंड यूरोप नाम के रिसर्च संस्थान के मुताबिक़ ब्रिटेन को हर साल 40 अरब पाउंड का नुक़सान होता है. ये ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था का क़रीब दो फ़ीसदी है. इसकी वजह ये है कि नाइट शिफ़्ट में काम कम होता है. साथ ही बीमारियों को भी आदमी ज़्यादा झेलता है.
रैंड यूरोप के मार्को हैफ़नर कहते हैं कि सरकारें इस चुनौती को गंभीरता से ले रही हैं. ब्रिटिश और अमरीकी सरकारों ने नींद न आने की दिक़्क़त को बड़ी बीमारी घोषित कर रखा है. इसे सेहत के लिए बड़ा ख़तरा बताया जा रहा है. लोगों को इसके प्रति जागरूक किया जा रहा है.
जब नुक़सान इतने हैं तो नाइट शिफ़्ट ख़त्म क्यों नहीं कर दी जाती?
असल में ग्लोबलाइज़ेशन के इस दौर में 24/7 काम करना ज़रूरी भी है और मजबूरी भी. और ट्रेसी जैसे बहुत से लोग हैं जिन्हें रात में काम करना पसंद भी है. तो नाइट शिफ़्ट का चलन तो अब ख़त्म नहीं होने वाला. हां, रात में काम करने वालों को कुछ और सुविधाएं देकर इसके बुरे असर को कम ज़रूर किया जा सकता है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












