घर से काम करने से करियर को नुक़सान

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- Author, एरिक बैरटॉन
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
कई बार सुबह नींद खुलते ही आपका मन होता है कि आज दफ़्तर न जाएं. बहुत लोगों का होता है.
कई लोग ये भी सोचते हैं कि काश! घर से ही ऑफ़िस का काम निपटा दें. अगर आपके कुछ जानने वालों को घर से काम करने का मौक़ा मिलता है, तो आपको उनसे रश्क़ होता है. सोचते होंगे कि अगर आपको भी ऐसा मौक़ा मिलता तो कितना अच्छा होता. न सुबह उठने की हड़बड़ी. न नाइट शिफ्ट में काम करने का ख़ौफ़. न दफ़्तर तक पहुंचने और वापस आने का थकाऊ सफ़र.
ऑफ़िस में काम करने की बहुत सी शर्तें हैं, जो पूरी करनी पड़ती हैं. आपको अच्छे कपड़े पहनने होंगे. वक़्त पर पहुंचना होगा. बॉस का सामना करना होगा.
इन्हीं शर्तों को देखते हुए लोग सोचते हैं कि घर से काम करने का मौक़ा मिले तो क्या ही अच्छा हो!

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आज बहुत सी कंपनियां अपने मुलाज़िमों को घर से काम करने के मौक़े दे रही हैं. बहुत सी कंपनियों में हॉट डेस्किंग (Hot Desking) की रणनीति अपनाई जाती है. इसमें जितने कर्मचारी होते हैं, उससे कम ही दफ़्तर में बैठने की जगह मुहैया कराई जाती है. इससे कर्मचारी घर से काम करने के लिए राज़ी होते हैं. लोग घर से काम करते हैं तो कंपनी का भी काफ़ी ख़र्च बचता है.
पर क्या घर से काम करने का फॉर्मूला इतना अच्छा है क्या? चलिए आज इसी की पड़ताल करते हैं.
लंदन के रहने वाले इयन राइट ने जब अपनी कंपनी ब्रिटिश बिज़नेस एनर्जी खोली, तो पैसे बचाने के लिए अपने साझीदार के साथ तय किया कि घर से काम करेंगे. उन्होंने मज़े से काम शुरू किया. मगर वो एक बच्चे के पिता थे. अक्सर उसकी वजह से काम में खलल पड़ता था. फिर उन्होंने बच्चे को डे केयर में डाला.
इयन ने सोचा कि अब तो वो बेफिक्र होकर घर पर काम कर सकेंगे. फिर भी ऐसा नहीं हुआ. कभी कोई दरवाज़े पर दस्तक देता. मसलन डाकिया, प्लंबर, कूरियर वाला या इलेक्ट्रीशियन. तो, कभी खाना बनाने और दूसरे कामों के लिए उठना पड़ता. हर बार उनके काम में खलल पड़ता. सोचने की लय-ताल टूट जाती.
दो महीनों में ही उन्हें समझ में आ गया कि घर से काम करना बेहद मुश्किल है. फिर उन्होंने अपने साथी के साथ मिलकर एक दफ़्तर किराए पर लिया. तब जाकर उनका काम आगे बढ़ सका.

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दफ़्तर से काम करने के अपने फ़ायदे हैं. तो घर से काम करने का अपना लुत्फ़ है. रिसर्च से मालूम हुआ है कि घर से काम करने से लोगों का काम बेहतर होता है. वो ज़्यादा ख़ुश रहते हैं.
लेकिन कई नए तजुर्बे ये भी बताते हैं कि घर से काम करना इतना भी फ़ायदेमंद नहीं, जितना आप सोचते हैं. लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की एस्थर कैनोनिको ने इस बारे में 514 लोगों पर रिसर्च की थी.
एस्थर बताती हैं कि इनमें से ज़्यादातर लोगों को घर पर काम करने की ट्रेनिंग दी गई. आधे से ज़्यादा लोगों को तो लगता ही नहीं था कि इसके लिए किसी ट्रेनिंग की ज़रूरत है. कंपनी ने भी उन्हें ट्रेनिंग देने की ज़रूरत नहीं समझी. नतीजा ये कि इन लोगों के काम का स्तर घटा. इनकी प्रोडक्टिविटी घटी.
एस्थर कहती हैं कि घर पर काम करने की कुछ शर्तें हैं. इनका पालन ज़रूरी है. वरना न तो घर पर आप अच्छे से काम कर पाएंगे, और न ही आप ख़ुश रह पाएंगे. एस्थर के मुताबिक़ सबसे पहले तो आपको इसके लिए ट्रेनिंग लेनी होगी. फिर घर पर काम करने के लिए अपने घरवालों और रिश्तेदारों के लिए कुछ नियम बनाने होंगे. जब आप काम कर रहे हों, तो आपके काम में खलल न पड़े, इसके लिए ज़रूरी है कि आप कामवालों को, घरवालों को और रिश्तेदारों को बताएं कि वो किस वक़्त आएं और किस वक़्त आपके काम में दखल न दें.

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आज बहुत सी कंपनियां तय वर्किंग आवर्स के बजाए काम का वक़्त लचीला रखती हैं. कई कंपनियां हफ़्ते में कुछ दिन घर से काम करने का मौक़ा भी देती हैं. ब्रिटेन में तो कई क़ानून बनाए गए हैं, जिसमें कामकाजी लोग अपनी कंपनियों से काम के घंटों में रियायत और लचीलेपन की मांग कर सकते हैं. वो ऐसे वक़्त में दफ़्तर आने की मांग कर सकते हैं, जिससे उन्हें सहूलत हो.
मगर दिक़्क़त तब होती है, जब हम ये सोचने लगते हैं कि हम दफ़्तर का हर काम घर से कर सकते हैं. बस लैपटॉप या कंप्यूटर ऑन किया और काम शुरू. ऐसा होता नहीं.
घर पर काम करने के कई नुक़सान हैं. जैसे कि अगर आप दफ़्तर में नहीं हैं. बॉस से आपकी मुलाक़ात नहीं होती है. तो, बहुत मुमकिन है कि आप उनके ज़हन से उतर ही जाएं. आपका काम उनको नज़र ही ना आए. कई बार आप सामने होते हैं तो बॉस को लगता है कि फ़लां प्रोजेक्ट आपको दिया जाना चाहिए. मगर आप घर पर होंगे, तो वो प्रोजेक्ट जिसके आप हक़दार हैं, वो किसी और को मिल जाएगा.

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मशहूर शायर अहमद फ़राज़ ने कहा है- आंखों से दूर न हो, दिल से उतर जाएगा.
ये बात घर से काम करने वालों के लिए चेतावनी सरीखी है. अमरीका की एरिज़ोना यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च बताती है कि घर से काम करने वालों में से 40 फ़ीसद दफ़्तर से कटा हुआ महसूस करते हैं. उन्हें लगता है कि बॉस से उन्हें सहयोग नहीं मिलता. घर से काम करने वाले एक तिहाई लोगों को दफ़्तर के माहौल की कमी महसूस होती है. उन्हें लगता है कि वो तरक़्क़ी की राह से कट से गए हैं. दफ़्तर के साथियों से भी वो दूरी महसूस करते हैं.
पर, बहुत से लोगों का ख़्वाब होता है कि वो घर से काम करें. दफ़्तर आने जाने में वक़्त ज़ाया नहीं होगा. न ही रोज़ बॉस से सामना होगा. जब मन होगा तब काम करेंगे.
ब्रिटेन के टिम कैंपबेल ने घर और दफ़्तर से काम करने के बीच अच्छा तालमेल बैठाया है. वो 2005 में बीबीसी वन के शो द अप्रेंटिस के विजेता थे. बाद में कंपनी ने उन्हें कई और लोगों को ट्रेनिंग देने का मौक़ा भी दिया.

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कैंपबेल सलाह देते हैं कि आप घर से काम कर रहे हैं, तो भी तमाम तरीक़ों से दफ़्तर से जुड़े रहें. बीच-बीच में ऑफ़िस आते रहें. घर पर काम करने के नियम भी सख़्त बनाएं और उनका ईमानदारी से पालन करें. काम में खलल डालने वालों से दूर रहें. घर वालों के लिए भी कुछ नियम तय कर दें.
कैंपबेल कहते हैं कि घर से काम करने को ऐसा समझें कि आपको नया प्रोजेक्ट मिला है. शुरुआत में पूरे हफ़्ते घर से काम करने के बजाय, पहले दो या तीन दिन काम करने की आदत डालें. हर बार कांफ्रेंस कॉल के ज़रिए दफ़्तर की मीटिंग में शामिल होने के बजाय कभी-कभार दफ़्तर भी आएं. पूरी तरह से ऑफ़िस से दूर होना आपकी तरक़्क़ी के लिए घातक साबित हो सकता है.
दफ़्तर में काम करना और घर से काम करना, दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं. घर से काम करने के लिए ज़्यादा अनुशासन की ज़रूरत है. अगर आप सख़्ती से ये काम कर सकते हैं. बार-बार काम में खलल पड़ने से रोक सकते हैं, तो ही आपके लिए घर से काम करना ठीक होगा.
फिर ये भी देखना होगा कि आप दफ़्तर से पूरी तरह कट तो नहीं गए. वरना अगले सालाना अप्रेज़ल में आप फिसड्डी भी साबित हो सकते हैं.
तो आलस छोड़िए और दफ़्तर जाने की तैयारी कीजिए.
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर मौजूद है.)
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