बुज़ुर्ग हमेशा नई पीढ़ी को डांटते ही क्यों हैं?

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    • Author, अमांडा रुगरी
    • पदनाम, बीबीसी कैपिटल

'आज कल के लड़कों को ज़रा भी तमीज़ नहीं, सलीक़ा नहीं.' 'नई पीढ़ी तो न जाने किस गुमान में रहती है, न तजुर्बा है, न सीखना चाहते हैं.'

'बड़े लापरवाह हैं आज के दौर के बच्चे. किसी की इज़्ज़त नहीं, किसी की परवाह नहीं.' ये जुमले आप सभी ने सुने होंगे. घर के लोगों से, पड़ोस के चाचा-ताऊ या चाची-मौसी से.

बुज़ुर्गों को युवा पीढ़ी में ज़माने भर की बुराइयां नज़र आती हैं. पर ये सिलसिला कोई नया नहीं.

जो बुज़ुर्ग आज के नौजवानों को कोस रहे हैं, वो ख़ुद भी ऐसी जुमलेबाज़ी के शिकार हुए थे. और उन्हें सीख देने वाली उनके पहले की पीढ़ी भी.

युवाओं को लेकर ऐसी सोच सदियों से नहीं, हज़ारों सालों से चली आ रही है. नौजवानों की बेपरवाही पर नाक-भौं सिकोड़ने का चलन बहुत पुराना हो गया है.

हम आप को कुछ मिसालें देकर बताते हैं कि युवाओं को लेकर बुज़ुर्गों के ख़यालात हर दौर में ऐसे ही रहे हैं.

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युवा पीढ़ी

डेली मेल अख़बार ने हाल ही में 21वीं सदी की युवा पीढ़ी के बारे में लिखा कि, "मिलेनियल यानी 21वीं सदी के युवा आलसी हैं और बुनियादी बातों से भी अनजान हैं."

मगर, ये कोई नई बात नहीं. 1951 में स्कॉटलैंड के अख़बार फालकिर्क हेराल्ड ने लिखा था, "बहुत से युवाओं को इतना लाड़-प्यार मिला है, इतना दुलार मिला है कि वो आज ये भूल गए हैं कि टहलना भी कोई चीज़ होती है. वो सीधे बसों में सवार हो जाते हैं. अगर आज के युवा इस बारे में कुछ नहीं करेंगे, तो आगे चलकर लोग पैदल चलना ही भूल जाएंगे."

ज़रा सोचिए, क़रीब 70 साल पहले युवा पीढ़ी के बारे में एक अख़बार ने जो लिखा, कमोबेश वही बात आज के दौर के अख़बार में भी लिखी गई. आज की पीढ़ी पर सबसे बड़ा आरोप यही लगता है कि वो अपने आप में मगन रहते हैं.

परवरिश को लेकर काम करने वाली अमरीकी वेबसाइट मॉमज़ेट लिखती है, "आज के बच्चे हक़ीक़त से कोसों दूर हैं. उनका ज़्यादा वक़्त तो कॉफ़ी शॉप में बीतता है. वो इतने बेपरवाह हैं कि अपने चेहरे तक का ख़याल नहीं रखते. बहुत से युवा बिगड़े हुए हैं. वो ख़ुद को तमाम अधिकारों से लैस समझते हैं."

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ख़ुद पर फ़िदा

कुछ यही बात 1771 में पेरिस की एक पत्रिका टाउन ऐंड कंट्री मैग़ज़ीन में लिखी गई थी, "वो मर्दों वाली बात आज के युवाओं में कहां है? क्या वो अपने से पहले के शानदार वीरों के असली वारिस कहे जा सकते हैं? बिल्कुल नहीं. आज के युवा एक कमज़ोर नस्ल हैं. ख़ुद की तारीफ़ में मुब्तिला. आज के कामचोर और कमज़ोर युवाओं को अपने से पहले की शानदार पीढ़ी का वारिस कहलाने का बिल्कुल भी हक़ नहीं."

वहीं अभी पिछले ही साल एक अमरीकी अख़बार डेली मेल ने नौजवान पीढ़ी के बारे में कुछ इस तरह लिखा था, "अफ़सोस की बात है कि आज की पीढ़ी के युवा फ़ोन की लत के शिकार हैं. ख़ुद में मशगूल रहते हैं. हैशटैग करने, स्नैपचैट करने, ट्वर्किंग करने में व्यस्त रहते हैं. वो हमेशा ही शिकायत करते रहते हैं. उन्हें न चीज़ों की समझ है न जानकारी. राजनीति मे भी वो कोई फ़ैसला नहीं ले पाते. हर बात उन्हें बुरी लगती है. सेक्स बारे मे भी उनके ख़यालात एकदम अजीब से हैं."

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चार सदी पहले

वहीं हल डेली मेल नाम के अख़बार ने 1925 में कुछ इसी तरह की बात उस दौर के युवाओं के बारे में लिखी थी, "आज की पीढ़ी विचारहीन है. आज के युवा निरे जाहिल और बेहद ख़ुदग़र्ज़ हैं."

मशहूर पत्रिकार वैनिटी फ़ेयर ने 2014 में नई नस्ल के बारे में लिखा कि, "आज की युवा पीढ़ी हमेशा यही सोचती है कि वही सही है, जबकि ज़्यादातर मौक़ों पर वो ग़लत होते हैं."

वहीं, मशहूर यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने ईसा से भी चार सदी पहले युवा पीढ़ी के बारे में कहा था, "वो समझते हैं कि वो सब कुछ जानते हैं. उन्हें अपनी नासमझी पर भी बड़ा यक़ीन होता है."

सोचिए क़रीब ढाई हज़ार सालों से नौजवानों के बारे में उनसे पहले की पीढ़ी यही तल्ख़ सोच रखती आई है.

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तो आज नया क्या है?

युवा कुछ ज़्यादा ही एहतियात बरतते हैं. वॉशिंगटन पोस्ट ने 2016 में लिखा था कि, "21वीं सदी के युवा कुछ ज़्यादा ही सावधानी बरतते हैं. वो कार की सीट बेल्ट लगाकर बड़े हुए हैं. वो बिना हेलमेट के साइकिल भी नहीं चलाते. वो ऐसी पीढ़ी से ताल्लुक़ रखते हैं, जिन्हें अकेले स्कूल जाने का मौक़ा नहीं मिला. जो कभी अकेले खेलने नहीं गए."

वहीं मशहूर पत्रिकार लाइफ़ ने सन् 1950 में कमोबेश यही बात उस दौर के युवाओं के बारे में कही थी, "ये विडम्बना है मगर आज के बहुत से लोग बड़े चौकस रहते हैं. नर्वस रहते हैं. जबकि पांच साल पहले भी लोग ऐसे नहीं थे. आज के दौर के लोगों को डर लगता है कि कहीं वो इंक़िलाबी ख़याल के शिकार न हो जाएं. युवा पीढ़ी कोई जोखिम भरा दांव खेलने को तैयार नहीं दिखती."

एक तरफ़ तो नौजवानों को डरा हुआ बताया जाता है, फिर ये भी कहते हैं कि साहब ख़ुद पर इन्हें कुछ ज़्यादा ही ऐतबार है. कुछ मिसालें मुलाहिज़ा फ़रमाएं...

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सातवें आसमान पर...

आयरलैंड के अख़बार इंडिपेंडेंट ने इसी साल लिखा कि, "युवा पीढ़ी आत्मविश्वास से कुछ ज़्यादा ही लबरेज़ नज़र आती है. उन्हें क़ाबिलियत से ज़्यादा ख़ुद ऐत्मादी है."

वहीं आज से कमोबेश ढाई हज़ार साल पहले अरस्तू ने कहा था, "नौजवानों का दिमाग़ सातवें आसमान पर रहता है क्योंकि अभी उनका साबक़ा ज़िंदगी के कड़वे तजुर्बों से नहीं पड़ा. न ही वो मुश्किलों के शिकार हुए हैं."

सोचिए न जाने कितनी पीढ़ियां बीत गईं, अरस्तू से लेकर अब तक, मगर युवाओं को लेकर ख़याल जस के तस रहे हैं. कुछ ज़्यादा ही उम्मीदें पाल लेने का आरोप भी उन पर लगता रहा है.

जैसे कि, आयरिश अख़बार इंडिपेंडेंट ने इसी साल लिखा था, "आज के युवा बस नौकरी बदलते रहते हैं. वो अच्छे मुलाज़िम नहीं हैं."

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दुनिया का मसला

आज से 22 साल पहले 1995 में फाइनेंशियल टाइम्स ने उस दौर के युवाओं के बारे में लिखा था, "आज कल ऐसी कंपनियों की तलाश नहीं होती, जो ज़िंदगी भर के लिए रोज़गार दे. आज कल लोग ऐसी नौकरी तलाश रहे हैं जो आसान हो, जल्दी से बदली जा सके."

युवा बहुत शिकायत करते हैं. द टेलीग्राफ ने 2015 में लिखा कि, "नौकरी हो, संपत्ति हो या दुनिया का कोई भी मसला हो, युवा पीढ़ी को शिकायतें बहुत हैं."

वहीं 1993 में वॉशिंगटन पोस्ट ने लिखा था कि, "इस पीढ़ी और पिछली पीढ़ी में सब से बड़ा फ़र्क़ तो ये है कि आज के अमरीकी शिकायत बहुत करते हैं."

आज के युवा फिज़ूलख़र्ची बहुत करते हैं, ये शिकायत तो हर नौजवान ने अपने बारे में सुनी होगी. हर पीढ़ी पर फिज़ूलख़र्ची का आरोप लगता आया है.

ऑस्ट्रेलिया के मशहूर कारोबारी टिम गर्नर ने इसी साल कहा था कि, "जब मैंने अपना घर ख़रीदा तो मैं महंगी कॉफ़ी नहीं पीता था न ही क़ीमती अवाकाडो खाता था. लेकिन आज के नौजवान तो रोज़ बाहर खाना चाहते हैं. हर साल यूरोप की सैर पर जाना चाहते हैं."

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रोमन कवि

वहीं ईसा से एक सदी पहले के रोमन कवि होरेस ने अपने दौर के युवाओं के बारे में कहा था कि, "आज के दाढ़ीविहीन युवा...समझते ही नहीं कि क्या फ़ायदेमंद है. उन्हें तो बस पैसे की बर्बादी से मतलब है."

युवाओं से शिकायतों की फ़ेहरिस्त यहीं ख़त्म नहीं होती. हर दौर में युवाओं से जो आम शिकायतें रही हैं, वो कुछ इस तरह हैं-

-वो घर नहीं ख़रीद रहे, कितनी बुरी बात है.

-वो हमेशा बच्चे बने रहना चाहते हैं.

-तकनीक ने आज की पीढ़ी को बिगाड़ दिया है.

-आज के नौजवान तो अपने आप में ही इतने मगन रहते हैं कि आस-पास की परवाह नहीं करते.

-नौजवानों ने तो धर्म का सत्यानाश कर दिया!

-पता नहीं खेल से युवाओ को इतनी परेशानी क्यों है?

-आज के युवा तो पढ़ना-लिखना ही नहीं चाहते.

-मां-बाप ने बच्चों को बिगाड़ रखा है.

-इतने बिगड़े हुए युवा तो कभी नहीं देखे.

तो, देखा आप ने. दौर बदला, सदियां बदलीं, मगर नहीं बदली तो नौजवानों के बारे में युवाओं की शिकायतें.

यानी आप के मां-बाप अगर आप की बातों की शिकायत करते हैं. पास-पड़ोस के लोग आप के शौक़ पर फ़ब्तियां कसते हैं, ये कहकर कि आप बिगड़ी हुई पीढ़ी से ताल्लुक़ रखते हैं. तो, उनकी बातों को ये समझकर दरगुज़र कर दें कि वो ख़ुद भी अपने दौर में ऐसी बातें सुन चुके हैं.

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