अकेलेपन और सोशल लाइफ़ में कितना संतुलन ज़रूरी?

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पार्टियां, महफ़िलें, मौज-मस्ती, पिकनिक, कहीं सैर पर निकलना...सोशल लाइफ़ के यही मायने हैं. लोग दोस्तों, रिश्तेदारों, साथी कामकाजी लोगों के साथ मिलते-जुलते हैं. अच्छा वक़्त बिताते हैं. आज के दौर में ऐसी सोशल लाइफ़ बेहद ज़रूरी मान ली गई है.
लेकिन इसके लिए हमें अपना काफ़ी वक़्त देना पड़ता है. बहुत से लोगों को तो ऐसी ज़िंदगी और अपने निजी पलों के बीच तालमेल बिठाने में काफ़ी दिक़्क़त होती है.
सवाल ये है कि अगर कोई पार्टी-महफ़िलों से दूर रहे. ख़ुद के साथ वक़्त बिताए, तो इसके क्या नफ़ा-नुक़सान हैं?
बीबीसी संवाददाता मैडलीन डोर ने यही किया. वो एक महीने तक सबसे कटकर, अलग-अकेले रहीं. उन्होंने अपना ये तजुर्बा चौंकाने वाला बताया.

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क्या है कामयाबी के राज़?
मैडलीन कहती हैं कि ख़ुद के साथ वक़्त बिताने के बहुत सारे फ़ायदे हैं. दिमाग़ को ख़ाली रहने देने से बहुत सुकून मिलता है. आपकी क्रिएटिविटी बढ़ जाती है.
तो आख़िर मैडलीन को इसका आइडिया आया कैसे?
मैडलीन ने बहुत से कामयाब कलाकारों, लेखकों और कारोबारियों से पूछा कि उनकी कामयाबी का राज़ क्या है? कमोबेश सब ने कहा कि उनकी कोई सोशल लाइफ़ नहीं है. यानी वो महफ़िलों-पार्टियों में जाना या पब-बार में वक़्त गुज़ारना बेहतर नहीं समझते.
जबकि मैडलीन की ज़िंदगी इसके उलट थी. वो फ्रीलांस काम करती हैं. सो जब उनके सब दोस्त-साथी काम पर निकल जाते, तो वो निकल जाती थीं अपनी मौज-मस्ती भरी ज़िंदगी जीने के लिए. वो इसे बुनियादी इंसानी ज़रूरत मानती थीं.
लेकिन, उन्हें अचानक ये ख़याल आया कि सोशल लाइफ़ के चक्कर में वो ज़िंदगी का अच्छा ख़ासा वक़्त यूं ही गंवा रही हैं. वो हर हफ़्ते क़रीब 22 घंटे दोस्तों, जानने वालों के साथ बिता रही थीं.

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फियर ऑफ़ मिसिंग आउट
मैडलीन कहती हैं कि मुझे इस बात का डर था कि मैं बहुत सी चीज़ों से महरूम हो जाऊंगी. मनोवैज्ञानिक इसे FOMO यानी Fear of Missing Out कहते हैं.
लेकिन दिल पर पत्थर रखकर मैडलीन ने अपनी सोशल लाइफ़ से ख़ुद को अलग करने का फ़ैसला किया. उन्होंने अगले एक महीने के लिए दोस्तों के साथ के सभी कार्यक्रम रद्द कर दिए. ड्रिंक या कॉफ़ी पीने जाना, डिनर, पार्टी, पिकनिक सब कुछ बंद. काम के सिवा बाक़ी सारा वक़्त मैडलीन घर पर रहने लगीं.
पहले कुछ दिनों तक मैडलीन काफ़ी नर्वस रहीं. शनिवार को मौज-मस्ती के तमाम विकल्प होने के बावजूद घर पर रहने से उन पर FOMO यानी कुछ खोने का ख़ौफ़ बना रहा. मगर कुछ दिनों बाद वो इस डर से उबर गईं.
उन्हें हर शनिवार एक ही विकल्प याद रहने लगा, कि उन्हें घर पर रहना है.

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डर पूरी तरह निकल गया
मैडलीन अपना काम करती थीं. इसके बाद बचे हुए वक़्त में वो क़िताबें पढ़ती थीं या फ़िल्में देखती थीं. या कुछ और काम कर लेती थीं. ख़ाली वक़्त में वो कुछ लिखने का काम भी कभी कभी कर लेतीं. या बहुत दिन से टाले जा रहे काम निपटातीं.
जब उनके पास काम निपटाने के लिए ज़्यादा वक़्त रहने लगा, तो इसका असर उनकी सेहत और मूड पर भी पड़ा. वो घर पर रहने की वजह से अक्सर अपना खाना पकाने लगीं. रोज़ाना वर्ज़िश करने लगीं. वो वक़्त पर सोने भी लगीं. सोने से पहले उन्हें पढ़ने का वक़्त भी मिल जाता था.
कई बार वो ख़ाली वक़्त यूं ही बैठे-बैठे भी बिताती थीं. मैडलीन का कहना है कि उनके ज़हन से अकेले होने का डर पूरी तरह से निकल गया.
कभी-कभी वो यूं ही टहलने निकल जातीं. या जाकर अकेले कैफ़े में बैठतीं. उस वक़्त वो मोबाइल या लैपटॉप से भी दूरी बनाए रखती थीं. कई बार वो दिन में बैठे-बैठे ख़्वाब देखा करती थीं. क्योंकि अब उनके पास हर ख़ाली लम्हे के लिए काम तलाशने की ज़रूरत नहीं थी.

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ज़हन को छुट्टा घूमने छोड़ने के फ़ायदे
मैडलीन कहती हैं कि ऐसे ख़ाली दौर की ज़रूरत हर क्रिएटिव काम के लिए होती है. दिमाग़ पर बोझ नहीं होता तो वो ज़्यादा बेहतर तरीक़े से सोच पाता है.
जब आप अपने ज़हन को छुट्टा घूमने के लिए छोड़ देते हैं, तो वो पुरानी यादों की अल्मारियों को झाड़ता है. वो पुराने जज़्बात को टटोलता है. आपके दिमाग़ के तहख़ानों में क़ैद बहुत सी ज्ञान की बातों के पन्ने पलट डालता है.
मैडलीन कहती हैं कि अपने एक महीने के एंटी-सोशल लाइफ़ तजुर्बे में उन्होंने बहुत से नए आइडिया पर विचार किया. मौजूदा प्रोजेक्ट को नए सिरे से देखने की कोशिश की.
कुछ न करना भी आप में नया जोश भरता है. ठीक उसी तरह जैसे आप किसी के साथ वक़्त बिताकर बेहतर महसूस करते हैं.
कई बार तो ख़ाली बैठना आपको तरो-ताज़ा करने के लिए बहुत ज़रूरी होता है. जो लोग बहुत सारा वक़्त बाहर, दोस्तों और जानने वालों के साथ बिताते हैं. वो दफ़्तर में ज़्यादा थकन महसूस करते हैं. उनके मुक़ाबले जो लोग ख़ाली वक़्त बैठकर बिताते हैं, वो ताज़ादम रहते हैं.
जानकार कहते हैं कि हम ख़ाली बैठना, ख़ुद के साथ वक़्त बिताना, अपने आप से बातें करना ग़ैरज़रूरी समझते हैं. मगर ये हमारे ज़हन की बेहतरी के लिए बहुत ज़रूरी है. ये हमारे नर्वस सिस्टम को बेहतर बनाता है.
आज के समाज में व्यस्त रहना बहुत अच्छी बात माना जाता है. लोग ख़ुद को मसरूफ़ बताकर अपनी अहमियत का इज़हार करते हैं. जब आप दूसरों को अपनी व्यस्तता का हवाला देते हैं, तो उसका मक़सद ख़ुद को बहुत अहम इंसान साबित करना होता है.

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तरक्की के लिए संतुलन ज़रूरी
अकेले रहने से से आपका कनफ्यूज़न दूर होता है. नज़रिया साफ़ होता है. आप तरो-ताज़ा महसूस करते हैं.
बहुत से कामकाजी लोगों के लिए सबसे मिलना-जुलना ज़रूरी होता है. सबसे अच्छे दोस्त से लोग हफ़्ते में कई बार मिलते हैं. अपने साथ काम करने वालों के साथ मिलने-जुलने से संबंध बेहतर होता है. इससे तरक़्क़ी में भी मदद मिलती है.
अकेले रहने या सोशल लाइफ़ से कटने का ये बड़ा नुक़सान होता है. ख़ुद मैडलीन को भी ये एहसास हुआ.
आख़िर में मैडलीन अपने तजुर्बे से कहती हैं कि तरक़्क़ी के लिए अकेलेपन और सोशल लाइफ़ के बीच अच्छा संतुलन बनाना बेहतर रहेगा. पूरी तरह से सब से कटकर रहना भी ठीक नहीं. और हर वक़्त लोगों के बीच उठना-बैठना भी ठीक नहीं. बीच का रास्ता ज़्यादा सही है.
आप लोगों से मिलते-जुलते रहिए. पार्टी, मौज-मस्ती भी करें. पर थोड़ा वक़्त ख़ुद के लिए भी निकालें. खेलने-कूदने में टाइम ख़र्च करें. नहीं कुछ तो टहलने ही निकल जाएं. हर हफ़्ते पार्टी करने के बजाय उसे दो हफ़्ते में करें.
ख़ुद के लिए वक़्त निकालें. कभी-कभी तन्हा रहकर ख़ुद से बातें करें. अच्छा लगेगा.
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