काम वही लेकिन कंपनी ने नाम बदल कर किया 'इनर गेस्ट'

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कश्मीर के लोग बरसों से भारत से ज़्यादा अधिकारों की मांग कर रहे हैं. वो संविधान के तहत अपना स्पेशल स्टेटस बनाए रखना चाहते हैं. कुछ चीज़ें जो ख़त्म कर दी गईं, वो फिर से वापस चाहते हैं. जैसे 'सदर-ए-रियासत' का ओहदा. जम्मू-कश्मीर में पहले राज्यपाल की जगह यही ओहदा था. जिसे केंद्र सरकार ने बदल दिया.
इसी तरह, आज़ादी से पहले गवर्नर जनरल देश की सरकार के सर्वे-सर्वा हुआ करते थे. आज़ादी के बाद जब संविधान लागू हुआ, तो राष्ट्रपति का पद हो गया.
वक़्त-वक़्त की बात है. बहुत से नाम बदले, ओहदे बदले. ऐसा सिर्फ़ सरकारी पदों पर हुआ हो, ऐसा नहीं है. निजी कंपनियों ने भी वक़्त-वक़्त पर बदलाव की बयार देखी है.
पहले नौकरी करने वाला हर शख़्स कंपनी का मुलाज़िम कहा जाता था. मगर आज बहुत सी कंपनियां ऐसी हैं, जो अपने मुलाज़िमों को कर्मचारी नहीं कहतीं.

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कर्मचारी को मानते हैं गेस्ट
मसलन, अमरीका में इटैलियन रेस्तरां की एक चेन डाविओ'ज़ अपने कर्मचारियों को कर्मचारी के बजाय 'इनर गेस्ट' या घर का मेहमान कहती है. कंपनी के सीईओ स्टीव डिफिलिपो ने कर्मचारी या इम्प्लॉइ शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगाई हुई है.
स्टीव कहते हैं कि कर्मचारी शब्द बहुत ख़राब है. आख़िर कौन इम्प्लॉइ कहलाना चाहता है? स्टीव के मुताबिक़ उनके यहां काम करने वाले लोगों ने दूसरी कंपनियों में काम करने के बाद यहां आने पर एकदम बदला हुआ माहौल पाया. हम उन्हें बराबर सम्मान देते हैं. स्टीव के मुताबिक़ वो 'इम्प्लॉइ' शब्द पर पाबंदी लगाकर अपने 'घरेलू मेहमानों' को उनकी अहमियत का एहसास कराते हैं.
इसी तरह कनाडा के मॉन्ट्रियल शहर की सॉफ्टवेयर कंपनी जीसॉफ्ट ने हाल ही में 'ह्यूमन रिसोर्सेज़़' यानी एचआर विभाग को नया नाम दिया है. ये नाम है डिपार्टमेंट ऑफ़ कल्चर, जिसे कंपनी का काम बेहतर करने की ज़िम्मेदारी दी गई है.
वहीं, ब्रिटिश रियल्टी कंपनी एलाइड लंदन ने नेटवर्किंग शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है. अब कंपनी के कर्मचारी टॉकिंग शॉप कार्यक्रम आयोजित करते हैं.

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क्या है मक़सद?
सवाल ये है कि ऐसे ओहदे या बात बदलने से बदलता क्या है? कहीं काम का माहौल और पेचीदा तो नहीं हो जाता?
असल में इक्कीसवीं सदी में बहुत से नए काम शुरू हुए हैं. उनके लिए अजब-ग़ज़ब नाम दिए जाते हैं. जैसे लंच तैयार करने वाले को कई कंपनियां 'सैंडविच आर्टिस्ट' कहती हैं. इसी तरह एप्पल स्टोर पर आपके आई-फ़ोन की सेटिंग करने वाले को 'जीनियस' कहा जाता है. माइक्रोसॉफ्ट में 'इनोवेशन शेरपा' होते हैं. टंबलर में 'फैशन इवांजेलिस्ट' और एओएल कंपनी में 'डिजिटल प्रोफ़ेट'.
यानी आईटी कंपनियों ने नए सॉफ्टवेयर डेवेलप करने के साथ-साथ बहुत सारे नए ओहदे भी विकसित कर डाले हैं. ये नाम हिप लगते हैं.
लंदन बिज़नेस स्कूल के प्रोफ़ेसर डैन केबल कहते हैं कि इंजीनियर को 'इमैजिनियर' कह देने से उसका काम अचानक तो बेहतर नहीं हो जाएगा. मगर, बहुत से लोग इससे प्रेरित ज़रूर होते हैं.
डैन केबल के मुताबिक़ अगर एक-दो लफ़्ज़ बदल देने से कर्मचारी ज़्यादा उत्साहित महसूस करते हैं. ज़्यादा मोटिवेटेड होते हैं, तो इसमें कोई हर्ज़ नहीं.

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नए लफ़्ज़ों का चलन
तमाम रिसर्च बताते हैं कि इक्कीसवीं सदी के युवा इस बात को लेकर बहुत उत्साहित रहते हैं. वो पुराने ओहदों को नया नाम देने को बेहद दिलचस्प मानते हैं. यही वजह है कि बहुत से पुराने शब्द चलन से बाहर हो रहे हैं. और नए लफ़्ज़ चलन में आते जा रहे हैं.
कुछ शब्दों का हेर-फेर बहुत काम का होता है. जैसे कि 2014 में अमरीकी कार कंपनी जनरल मोटर्स को सरकार के साथ समझौता करना पड़ा था. इस दौरान बातचीत कर रहे कंपनी के कर्मचारियों को कहा गया था कि वो ग़लत संकेत देने वाले शब्दों से परहेज़ करें. जैसे डिफेक्ट और फ्लॉड यानी कमी. डेथ ट्रैप यानी मौत का जाल.
2011 की वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट बताती है कि एप्पल कंपनी ने अपने स्टोर में काम करने वालों को कहा था कि unfortunately जैसे शब्दों का इस्तेमाल न करें. इसकी जगह वो as it turns out कहें. इससे वो कम नेगेटिव लगेंगे. एप्पल कर्मचारियों के 'बग', 'क्रैश', 'not responding' और 'hot' जैसे शब्दों के इस्तेमाल से बचने को कहा गया था.
लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स के डैन केबल कहते हैं कि कुछ शब्दों पर पाबंदी लगाकर कंपनियां अपनी ब्रांडिंग करती हैं. वो ग्राहकों को भी संदेश देती हैं और अपने यहां काम करने वालों को भी.
जैसे कुछ कंपनियां अपने यहां की कस्टमर केयर सर्विस को 'हैप्पीनेस हीरोज़' कहती है.

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नए शब्द 'कूल' होने का संदेश
न्यूयॉर्क की ब्रांड कंसलटेंट लिज़ा मेरियम कहती हैं कि ऐसे नाम रखकर कंपनियां 'कूल' होने का संदेश देती है. जबकि असल में ये बहुत खिझाने वाला क़दम होता है.
मेरियम आगाह करती हैं कि ऐसे नाम रखकर कर्मचारी भले ही तुरंत 'कूल' महसूस करें, मगर आगे चलकर उन्हें नई नौकरी हासिल करने में दिक़्क़त होगी. क्योंकि बहुत सी कंपनियां अभी भी ओहदों को पुराने नज़रिए से देखती हैं. ऐसे में जब कोई ख़ुद को 'इनर गेस्ट बताएगा', तो नई कंपनी को समझ में ही नहीं आएगा कि वो काम क्या करता है.
हाल ही में ब्रिटेन में हुए सर्वे से लिज़ा की चेतावनी सही साबित हुई. क़रीब एक हज़ार कर्मचारियों को नई नौकरियों के नामों के बारे में पता ही नहीं था. पुराने ओहदे वाले नाम को लोगों ने ज़्यादा तरजीह दी.
मेरियम कहती हैं कि तमाम कंपनियों को कुछ ख़ास लफ़्ज़ों पर सोच-विचारकर पाबंदी लगानी चाहिए. यूं ही नए-नए नाम रख देने से किसी का भला नहीं होने वाला.
तो, आप बताइए, आप किस कंपनी के 'इनर गेस्ट' हैं?
(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)
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