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रविवार, 14 जून, 2009 को 23:04 GMT तक के समाचार
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रणनीति के मोर्चे पर नाकाम रही टीम

यूसुफ़ पठान

ट्वेन्टी-20 फ़ॉर्मेट में मैदान पर कोई निर्णय तुरंत लेने होते हैं. लेकिन रवींद्र जडेजा को पहले भेजने का निर्णय सही साबित नहीं हुआ. एक कम अनुभवी खिलाड़ी को पहले भेजने से बल्लेबाज़ी धीमी हो गई.

हालाँकि भारतीय टीम के पास यूसुफ़ पठान, युवराज सिंह और ख़ुद धोनी जैसा बल्लेबाज़ था. भारत को इस फ़ैसले की बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ी.

दूसरी ओर इंग्लैंड की टीम ने भारत की उसी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाया, जिसका फ़ायदा सुपर-8 के पहले मैच में वेस्टइंडीज़ ने उठाया था.

वेस्टइंडीज़ ने भी शॉर्ट पिच पर भारतीय टॉप ऑर्डर को पवेलियन भेजा था. इंग्लैंड ने भी वही रणनीति बनाई. वहीं आप मारे गए.

कमज़ोरी

ट्वेन्टी-20 के मैच में भी शॉर्ट बॉलिंग पर भारतीय बल्लेबाज़ी की कमज़ोरी उभर कर सामने आ गई. इसी वजह से भारत ने सुपर-8 के दोनों मैच गँवा दिए.

साइडबॉटम ने अपनी शॉर्ट पिच गेंदों से भारत को परेशान किया

दरअसल भारतीय टीम की मज़बूती उसकी बल्लेबाज़ी है और जब वही बिखर गई को हार का सामना तो करना ही था.

भारतीय टीम में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ मैच में जो बदलाव किए गए थे, उसका कोई ज़्यादा नकारात्मक असर नहीं पड़ा. गेंदबाज़ी में रवींद्र जडेजा ने दो विकेट लिए.

मेरा मानना है कि भारतीय टीम हारी दो वजहों से- पहली वजह शॉर्ट पिच गेंदों को न खेल पाना और दूसरी वजह रवींद्र जडेजा जैसे कम अनुभवी बल्लेबाज़ को पहले भेजना.

जडेजा दबाव नहीं झेल पाए और आवश्यक रन गति काफ़ी बढ़ गई.

मैच के बाद कप्तान धोनी ने भी इसे माना और कहा कि जब आपको शुरू में ही झटके लग जाते हैं तो मुश्किल तो होती ही है.

बाद में आवश्यक रन गति काफ़ी बढ़ गई. कप्तान धोनी और यूसुफ़ पठान जब बल्लेबाज़ी कर रहे थे, तो रन गति काफ़ी बढ़ गई थी.

जब रन गति बढ़ जाती है तो आप कुछ भी करके रन बनाना चाहते हैं और फिर ऐसी बल्लेबाज़ी लॉटरी बन जाती है. धोनी और पठान जब तक कोशिश करते, काफ़ी देर हो चुकी थी.

आईपीएल

इंडियन प्रीमियर लीग के कारण भारतीय खिलाड़ी काफ़ी थक गए थे. चालीस दिन की प्रतियोगिता के बाद भारतीय टीम सीधे इंग्लैंड चली गई.

सहवाग आईपीएल के दौरान ही घायल हुए थे

कई लोगों को ये लग रहा था कि मानसिक और शारीरिक रूप से खिलाड़ी थक गए थे और इसका उल्टा असर टीम के प्रदर्शन पर न पड़े और इसका असर पड़ा है.

भारतीय टीम की फ़ील्डिंग पर इसका असर साफ़ देखने को मिला है. युवा खिलाड़ियों से भरी भारतीय टीम की फ़ील्डिंग अच्छी रही है लेकिन इस प्रतियोगिता में वो तेज़ी नहीं देखने को मिली.

बल्लेबाज़ी में जो पराक्रम दिखना चाहिए था, वो नहीं दिखा और गेंदबाज़ी भी बेहतरीन नहीं रही. मैं ये नहीं कह रहा कि आईपीएल के कारण ऐसा हो रहा है.

लेकिन आईपीएल के ठीक बाद विश्व कप हो रहा है, तो भारतीय टीम को अपनी प्राथमिकताएँ भी तय करनी पडेंगी. अगर भारतीय टीम प्रबंधन को लगता है कि आईपीएल विश्व कप से बड़ा है, तो ठीक है.

अन्यथा आपको अपने हिसाब से कार्यक्रम बनाने पड़ेंगे. मीडिया को भी ये समझना चाहिए कि वे सारी ज़िम्मेदारी खिलाड़ियों पर नहीं डाल सकते. क्रिकेट प्रशासक भी टीम की तैयारियों में बड़ी भूमिका अदा करते हैं.

धोनी की कप्तानी

धोनी ने इस प्रतियोगिता में बड़ी अजीबो-गरीब कप्तानी की है. उन्होंने बैटिंग क्रम में बार-बार बदलाव किए हैं. गेंदबाज़ी के साथ भी ऐसा ही हुआ है.

धोनी की कप्तानी पर सवाल उठेंगे

कई बार तो मुख्य गेंदबाज़ अपने चार ओवर भी नहीं पूरे कर पाए हैं. जब तक आप जीत रहे होते हैं तो सब ठीक रहता है.

आपकी कप्तानी, आपके हर फ़ैसले की तारीफ़ होती है.

जब आप हारने लगते हैं तो हर फ़ैसले की आलोचना होती है.

जैसे अगर रवींद्र जडेजा इस मैच में चल जाते तो सभी धोनी के इस फ़ैसले की तारीफ़ करते.

अब चूँकि भारतीय टीम हार गई है तो जो चीज़ें पहले धोनी की मज़बूती लगती थी अब वही उनकी कमज़ोरी कही जाने लगेगी.

अनुभवी खिलाड़ी

मेरे ख़्याल से सचिन तेंदुलकर को भी ट्वेन्टी-20 के अंतरराष्ट्रीय मैचों में खेलना चाहिए. कप्तान धोनी ने तो ख़ुद माना कि उन्हें वीरेंदर सहवाग जैसे अनुभवी खिलाड़ी की कमी खली है.

सचिन ने आईपीएल में कई अच्छी पारियाँ खेली थी

पिछला विश्व कप जब भारत जीता, तो लोग ये मानने लगे कि ट्वेन्टी-20 सिर्फ़ युवा खिलाड़ियों का ही खेल है.

लेकिन आईपीएल को ही देख लीजिए, जितने भी रिटायर्ड खिलाड़ी हैं, उन्होंने बेहतरीन प्रदर्शन किया. जैसे-मैथ्यू हेडन, एडम गिलक्रिस्ट, शेन वॉर्न और अनिल कुंबले जैसे खिलाड़ी.

ट्वेन्टी-20 विश्व कप में भी मुथैया मुरलीधरन खेल रहे हैं, सनत जयसूर्या खेल रहे हैं. इसलिए ट्वेन्टी-20 को युवा खिलाड़ियों का खेल मानना ग़लत होगा.

मेरे ख़्याल से भारतीय टीम को अनुभवी बल्लेबाज़ों की कमी ज़रूर खली है. विशेषकर उस स्थिति में जब वीरेंदर सहवाग भी टीम में नहीं थे.

किसका पलड़ा भारी

मेरे ख़्याल से दक्षिण अफ़्रीका और श्रीलंका का पलड़ा ज़्यादा भारी है. न्यूज़ीलैंड भी अच्छी टीम है लेकिन उन पर भी दबाव है.

दक्षिण अफ़्रीका की टीम अच्छे फ़ॉर्म में थी

भारत के बाद आईपीएल का सबसे ज़्यादा असर न्यूज़ीलैंड पर देखा जा रहा है.

रॉस टेलर और डेनियल वेटोरी पर इसका असर दिखा. अगर टीम सेमी फ़ाइनल में पहुँची तो अपना दम दिखा सकती है.

लेकिन फ़िलहाल तो दक्षिण अफ़्रीका और श्रीलंका विश्व कप की सबसे तगड़ी दावेदार हैं.

(बीबीसी संवाददाता पंकज प्रियदर्शी से बातचीत पर आधारित)

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