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सपने पर अलगाववाद की जीत? | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मोहम्मद बिन क़ासिम 12 वीं क्लास के छात्र हैं. आम लड़कों की तरह वो भी पढ़ाई के साथ-साथ खेलने के शौक़ीन हैं. लेकिन क़ासिम के शौक़ पर उनके माता-पिता का अतीत और संस्कार भारी पड़ गए हैं. क़ासिम को क्रिकेट खेलना पसंद है, लेकिन माँ उन्हें उनके ही हमनाम एक अरब योद्धा मोहम्मद बिन क़ासिम जैसा योद्धा बनाना चाहती हैं, जिन्होंने आठवीं सदी में सिंध पर विजय हासिल की थी. क्रिकेट के शौक़ीन बालक मोहम्मद बिन क़ासिम हथियार डाल चुके अलगाववादी कमांडर शौकत अहमद उर्फ़ क़ासिम के बेटे हैं, जो पिछले सोलह साल से जेल में हैं. उनकी माँ कोई और नहीं अलगाववादी संगठन दुख़तरान-ए-मिल्लत (मज़हब की बेटियाँ) की प्रमुख आसिया अंद्राबी हैं. क़ासिम जब शिशु थे तब अपनी माँ के साथ जेल में भी रहे थे. हाल ही में जम्मू-कश्मीर क्रिकेट ऐसोशियसन ने क़ासिम को सोलह वर्ष से कम उम्र के बच्चों की टीम के लिए चुना. लेकिन वो राज्य की तरफ़ से पहले मैच में हिस्सा लेते पाते, माँ की ज़बर्दस्त नाराज़गी ने उन्हें घर बैठने पर मजबूर कर दिया. 'सच्चा हीरो बनाना चाहती हूँ' अपने बेटे को घर बैठने के लिए मजबूर करने वाली माँ आसिया अंद्राबी कहती हैं, "आजकल क्रिकेट का बहुत बोलबाला है, इसलिए क्रिकेट खिलाड़यों को हीरो जैसी इज़्ज़त मिलती है, लेकिन मैंने अपने बेटे को बताया कि दरअसल यहाँ हीरो जैसा कुछ भी नहीं हैं. मैं उसे मोहम्मद बिन क़ासिम जैसा सच्चा हीरो बनाना चाहती हूँ." आसिया क़बूल करती हैं कि जब उन्होंने अपने बेटे को क्रिकेट खेलने की इजाज़त नहीं दी तो वो बहुत रोया. क़ासिम को इस बात का ग़म है कि वो अपने माँ को नहीं समझा सके. वो अपने माता-पिता के उस तर्क से सहमत नहीं है कि क्रिकेट उन्हें उनकी ज़िंदगी के 'असल मक़सद' से भटका देगा. वो कहते हैं, "मेरे माता-पिता चाहते हैं कि मैं क्रिकेट को अपना करियर नहीं बनाऊँ, क्योंकि ये वक़्त की बरबादी है और ये खेल इंसान को उसके धर्म से दूर ले जाता है. मैं उनसे सहमत नहीं हूँ. मैं समझता हूँ कि ये दोनों चीज़ें (मज़हब और खेल) साथ-साथ चल सकते हैं." लेकिन क़ासिम क्रिकेट के शौक़ को अपने माता-पिता के प्यार के ऊपर नहीं आने देना चाहते. क्रिकेट या माता-पिता
क़ासिम कहते हैं, "मैं समझता था कि मैं अपने माता-पिता को मना लूंगा, लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सका. ये क्रिकेट और माता-पिता के बीच चुनने का मामला था, मैंने माता-पिता को चुना." आसिया बातती हैं कि वो क्रिकेट के ख़िलाफ़ नहीं हैं. उनका कहना है, "जहां तक शौक़ का मामला है मुझे इससे कोई परेशानी नहीं हैं. मैंने अपने दोनों बेटों को कह रखा है कि वो क्रिकेट या कोई दूसरा खेल खेल सकते हैं. लेकिन मैं नहीं चाहती कि उसे पेशेवर तौर पर अपनाया जाए." हालाँकि क़ासिम को नहीं खेलने की इजाज़त देने के पीछे सियासी वजहें भी बताई जा रही हैं. आसिया को डर था कि क्रिकेट में जिस तरह पैसा और नाम है, अगर संभव हुआ तो उनका बेटा भारत के लिए भी खेल सकता है. आसिया कहती हैं, "मेरा बेटा भारत के लिए नहीं खेल सकता है, क़तई तौर पर नहीं. भारत किसी कश्मीरी नौजवान पर गोलियों की बरसात और मेरे बेटे को करोड़ो रुपए एक साथ नहीं दे सकता." क़ासिम कहते हैं उन्होंने भारत की तरफ़ से खेलने के बारे में कभी नहीं सोचा है, लेकिन जहां तक क्रिकेट का सवाल है उसे छोडा़ नहीं है. वो कहते हैं, "मैं इस समय 12वीं क्लास में पढ़ रहा हूँ, ये मेरे लिए अहम साल है, इसलिए अभी मुझे अपने पढ़ाई पर ध्यान देना है, उसके अलाव मैं क्रिकेट खेलता रहूँगा. राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न स्कूलों के बीच प्रतियोगिता है, उसमें मैं अपने स्कूल का प्रतिनिधित्व करूंगा. " लेकिन आसिया क़ासिम को दीनी तालीम (धार्मिक शिक्षा) के लिए इस साल के आख़ीर तक किसी मदरसे में भेजना चाहती हैं, जहाँ क्रिकेट खेलने का मौक़ा मिलना एक सपना भर होता है. |
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