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गुरुवार, 01 जून, 2006 को 14:39 GMT तक के समाचार
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कहानी एक 'जेहादी' महिला की

सयैदा आसिया अंद्राबी
सयैदा आसिया अंद्राबी महिला अलगाववादी संगठन दुखतरन-ए-मिलत की प्रमुख हैं
"अपनी बेटियों की देखभाल करो. उनकी सुरक्षा आपके हाथ में है." सयैदा आसिया अंद्राबी की इस बात से श्रीनगर के ज़कूरा ख़्वाजा बाग इलाक़े में एक टेंट में इक्ट्ठा हुए क़रीब 50 महिलाएँ और बच्चे सहमत दिखाई देते हैं.

अंद्राबी कश्मीर में महिलाओं के अलगाववादी गुट दुख़तरान-ए-मिल्लत की प्रमुख हैं और कश्मीर मैं फैले सेक्स स्कैंडल के बारे में लोगों को जागरूक करने का काम कर रही हैं.

दुखतरान पिछले दिनों हुए सेक्स स्कैंडल के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने वाले गुटों में सबसे आगे रहा है और इस संगठन की प्रमुख अंद्राबी आए दिन सुर्खियों में बनी रहती हैं.

अद्राबी बताती हैं, "मैंने अपने पिता की लाइब्रेरी में एक किताब पढ़ी- ख़वातीनों के दिलों की बातें. इस किताब ने मेरी ज़िंदगी ही बदल डाली."

"मुझे अहसास हुआ कि मैं इस्लाम धर्म और उसमें महिलाओं के स्थान के बारे में कितनी अज्ञान हूँ." और तब अंद्राबी ने अरबी सीखी, कुरान का अध्ययन किया और वर्ष 1982 में एक अल्पकालिक स्कूल खोला जहाँ उन्होंने औरतों को इस्लाम की तालीम देनी शुरू की.

शुरुआत

सब कुछ ढर्रे पर चल रहा था फिर वर्ष 1987 में मार्च के महीने में दुख़तरान ने एक जुलूस निकाला, महिलाओं की तस्वीरों के अश्लील इस्तेमाल के ख़िलाफ़.

सड़क पर लगे बैनर और महिलाओं के पोस्टर इन्होंने काले कर डाले और माँग की कि महिलाओं के लिए बसों में अलग सीटों की व्यवस्था की जाए.

 अगर आप मुझे कट्टरपंथी कहें तो मुझे इससे कोई परेशानी नहीं है. मैं इस्लाम धर्म में विश्वास करती हैं. मैं धर्मनिरपेक्षता में विश्वास नहीं करती. मैं नहीं मानती कि सभी धर्म बराबर हैं और अच्छे हैं
सयैदा आसिया अंद्राबी

वो बताती हैं, "उस दिन पुलिस ने हमारे दफ़्तर पर छापा मारा और उसे सील कर दिया. हमारे मकान मालिक को हिरासत में ले लिया. मेरे परिवार को धमकी दी और मेरे घर पर छापा मारा."

इस घटना के दिन से अंद्राबी 21 दिनों के लिए भूमिगत हो गईं. जब वर्ष 1989 में कश्मीर में अलगाववाद की शुरूआत हुई तो उसके समर्थन में बोलनेवालों में अंद्राबी सबसे आगे थीं.

अंद्रबी ने बताया, "मुझे यह देखकर बहुत खुशी हुई कि हमारे नौजवान भारत के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए निकल पड़े. हमने उनसे कहा कि हम इस जेहाद में तुम्हारे साथ हैं. अगर तुम्हें कुछ हो गया तो हम तुम्हारी औरतों की ज़िम्मेदारी संभालेंगे."

अलगाववाद को समर्थन देने के आरोप में दुख़तरान को वर्ष 1990 में प्रतिबंधित कर दिया गया और इसके बाद शुरू हुआ अंद्राबी का वनवास, पूरे चौदह साल के लिए.

इस बीच में उन्होंने मोहम्मद क़ासिम से शादी की और दो बेटों की माँ भी बनी.

विचारधारा

अपने पति के बारे में वो बताती हैं, "मेरे पति एक बहुत भले चरमपंथी थे." कासिम अलगाववादी गुट जमियात-उल-मुजाहिद्दीन के कमांडर थे और अब श्रीनगर सेंट्रल जेल में आजीवन कारावास की सज़ा भुगत रहे हैं.

महिलाएं
अंद्राबी के संगठन में सदस्यों की संख्या कम ही है

अंद्राबी का मानना है कि 'ब्राह्मण भारत' का कश्मीर पर कोई हक़ नहीं बनता. "कश्मीर का भविष्य अभी तय होना बाकी है. हम मानते हैं कि कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा होना चाहिए. हम मुसलमानों की एकजुटता में विश्वास करते हैं."

अंद्राबी कहती हैं, "अगर आप मुझे कट्टरपंथी कहें तो मुझे इससे कोई परेशानी नहीं है. मैं इस्लाम धर्म में विश्वास करती हैं. मैं धर्मनिरपेक्षता में विश्वास नहीं करती. मैं नहीं मानती की सभी धर्म बराबर हैं और अच्छे हैं."

पिछले 20 वर्षों में अंद्राबी ने तरह-तरह के मुद्दों पर आवाज़ उठाई है. वेश्यावृत्ति और शराबियों के ख़िलाफ़ उन्होंने प्रदर्शन किए हैं. सिनेमा और टीवी पर दिखाए जाने वाले कार्यक्रमों को उन्होंने अश्लील करार कर उनके ख़िलाफ़ जुलूस निकाले हैं और इंटरनेट कैफ़े और रेस्टोरेंटों में युवक-युवतियों के मिलने पर रोक लगाने के लिए छापा भी मारा है.

इन कारणों से अंद्राबी कई बार जेल भी जा चुकी हैं.

फिलहाल उन्होंने माँग की है कि कश्मीर के सभी ब्यूटी पार्लर बंद कर दिए जाएं. उनका मानना है कि यहाँ सीधी-साधी लड़कियों को बहला-फुसलाकर उन्हें वेश्यावृत्ति में झोंक दिया जाता है.

वो मानती हैं, "एक औरत सिर्फ़ अपने पति के लिए सज-संवर सकती है. मेरे पति कहते हैं कि मेरी आँखें बहुत ख़ूबसूरत हैं और जब मैं सुरमा लगाती हूँ तो मेरी तारीफ़ों के पुल बाँध देते हैं. इसीलिए जब मैं उनके पास जाती हूँ तभी सुरमा लगाती हूँ क्योंकि इसपर सिर्फ़ उनका हक है. यहाँ तक कि मैं अपने भाई के सामने भी आँखों में सुरमा लगाकर नहीं जाती."

प्रभाव

अंद्राबी के इन ख़यालों की वजह से ही पिछले 25 वर्षों में भी दुख़तरान की सदस्यता काफ़ी कम महिलाओं को मिल सकी है.

पत्रकार शुजात बुखारी इस संगठन के बारे में अपनी राय व्यक्त करते हुए कहते हैं, "दुख़तरान एक चरमपंथी गुट है और यही कारण है कि इसकी सदस्यता सिर्फ़ पढ़ी-लिखी मुस्लिम महिलाओं तक सीमित है. आप श्रीनगर से बाहर ग्रामीण क्षेत्रों में जाएं तो वहाँ इनकी बात कोई नहीं सुनता."

पर अंद्राबी इसकी दूसरी वजह बताती हैं.

 दुख़तरान एक चरमपंथी गुट है और यही कारण है कि इसकी सदस्यता सिर्फ़ पढ़ी-लिखी मुस्लिम महिलाओं तक सीमित है. आप श्रीनगर से बाहर ग्रामीण क्षेत्रों में जाएं तो वहाँ इनकी बात कोई नहीं सुनता
पत्रकार शुजात बुखारी

वो कहती हैं कि ऐसा इसलिए है क्योंकि वो अपनी विचारधारा से कोई समझौता नहीं करना चाहती. "मैं अन्य राजनेताओं की तरह नहीं हूँ. मैं इस्लाम में विश्वास करती हूँ और हमारे गुट की सदस्यता हम उन्हीं औरतों को देते हैं जिनके चरित्र पर हमें भरोसा होता है और जो इस्लाम धर्म में विश्वास करती हैं."

अंद्राबी के बारे में अक्सर कहा जाता है कि अपने अभियान में वो शक्ति प्रदर्शन करने से भी नहीं चूकतीं.

हालाँकि वो इस बात का खंडन करती हैं. मगर श्रीनगर में कई लोगों ने इनके बारे में बात करने से साफ़ इनकार कर दिया.

बहुत पूछने पर एक कश्मीरी लेखक और समाज सेवी ने सिर्फ़ इतना कहा, "अंद्राबी को अपने विचारों में ज़रा ढील देनी चाहिए. मैं उसे लंबे अरसे से जानता हूँ मगर मैं उसके बारे में कुछ भी कहना नहीं चाहता. मुझे उससे डर लगता है."

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