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गुरुवार, 28 जुलाई, 2005 को 11:07 GMT तक के समाचार
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परदे के पीछे आज़ादी की एक बयार

ईरानी लड़कियाँ
ईरानी लड़कियाँ इस तरह खुले आम बैठकर हुक्का पी सकती हैं
ईरान यात्रा की योजना के बारे में मैंने भारत में जिसे भी बताया उसका कहना था – दुनिया में बहुत देश हैं ईरान क्यों? बुर्क़ा पहनना पड़ेगा... कुछ भी ग़लती हो गई तो हवालात की हवा खानी होगी..आदि-आदि.

ख़ासकर ईरान में रह रही महिलाओं पर चर्चा थी और नए राष्ट्रपति के चुनाव के बाद महिलाओं के जीवन में आने वाले बदलावों का अंदेशा हर तरफ़ व्यक्त किया जा रहा था.

एक सवाल मन में था कि बला की ख़ूबसूरत इन महिलाओं की ख़ूबसूरती को क्या हिजाब और चादौर (सिर ढँकने वाले चादर को वे चादौर कहते हैं) से ढँका जा सकता था.

और दूसरी ओर मन चादौर के अंदर की महिलाओं को देखने के लिए बेक़रार था.

विरोधाभास

ईरान के समाज का विरोधाभास साफ़ तौर पर वहाँ की आधी आबादी के जीवन से झलकता है.

मेरी मुलाक़ात एक युवा फ़ोटोग्राफ़र से हुई जो एक महीने पहले विश्व कप में शामिल होने के लिए बाहरेन से जूझ रही ईरानी फ़ुटबाल टीम को अपना समर्थन देने फ़ुटबाल स्टेडियम पहुँच गई.

 इस्लामी क्रांति देख चुकी महिलाओं का कहना है कि युवा लड़कियाँ अधिकारों की पुरानी लड़ाई को भूल चुकी हैं और उनका सारा ध्यान अपनी बाहरी सुंदरता से पुरुषों का मन मोहना भर रह गया है

यहाँ स्टेडियम में महिलाओं को फ़ुटबाल देखने की मनाही है. वे टेलिविज़न पर ही इसका आनंद उठा सकती हैं.

पर छह घंटे के इंतजार के बाद कुछ महिलाऐं फुटबाल स्टेडियम पहुँचीं. उनके स्टेडियम में पहुँचने के तीन मिनट बाद ही उनकी टीम ने गोल दागा और विश्व कप में अपनी जगह बनाई.

और पच्चीस साल बाद लड़कियाँ स्टेडियम में फ़ुटबॉल मैच देख रही थीं.

चाहे लड़कियों की शादी की उम्र देश में तेरह साल हो पर आज साठ प्रतिशत लड़कियाँ उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं.

धार्मिक नेताओं ने बहुत कोशिश की कि इस्लाम के नाम पर महिलाऐं काले चादौर में सिमट के रहें, पर यहाँ की महिलाओं की फ़ितरत में सिमट के रहना नहीं है.

फ़ैशन भी

तेहरान की सड़कों पर रंग-बिरंगे कोट जिन्हें यहाँ मोनटू कहा जाता है, पहने युवतियाँ नजर आती हैं. ये तंग कोट घुटने तक लंबे होते हैं और बड़े फ़ैशनेबल होते हैं.

ईरानी महिलाएँ
वे फ़ैशन का कोई मौक़ा भी नहीं चूकतीं

इस कोट की एक विशेषता यह दिखी कि इससे शरीर तो ढँका रहता है लेकिन शरीर का हर वक्र बाक़ायदा और बखूबी उभरता है.

मेकअप, आम दिनों में भी इतना कि लगता है कि सभी किसी फ़िल्म की शूटिंग या किसी ख़ास मौके के लिए तैयार हुई हैं.

यहाँ कहा जाता है की जैसे- जैसे गर्मी बढ़ती है स्कार्फ खिसकने लगता है, पैंटें छोटी हो जाती हैं और उँची एड़ी के जूतों की ठक ठक सब ओर सुनाई देने लगती है .

बसीज़ या धार्मिक पुलिस की आखों के नीचे लड़कियां अपने प्रेमियों के हाथ में हाथ डाले शायद ये कहना चाहती है – कि हम जैसे चाहे जियेंगी, हिम्मत हो तो कुछ कर के दिखाओ.

वहीं इसका द्सरा पहलू भी है – अपनी युवा बेटियों पर पश्चिमी सभ्यता, सैटेलाइट टीवी की छाप से माताएं चिंतित हैं.

सुंदर दिखने की होड़ में कॉस्मेटिक सर्जरी ज़ोर पकड़ चुकी है और इस्लामी क्रांति देख चुकी महिलाओं का कहना है कि युवा लड़कियाँ अधिकारों की पुरानी लड़ाई को भूल चुकी हैं और उनका सारा ध्यान अपनी बाहरी सुंदरता से पुरुषों का मन मोहना भर रह गया है.

ईरान में आप जहाँ अपने पिता या पति की इजाज़त के बिना विदेश नहीं जा सकती.

जहां आज भी उच्च ओहदो पर महिलाएं नहीं पहुँचतीं, जहाँ आज भी अपने हर अधिकार और स्वतंत्रता के लिए उसे पुरुषों की इजाज़त मांगनी पड़ती है, वहीं नोबल पुरस्कार विजेता शिरिन इबादी भी रहती हैं.

समीरा मकमलबफ़ जैसी अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फ़िल्मकार रहती हैं और कामकाज के लिए निकली एक आम औरत पराए पुरुषों के साथ एक टैक्सी में सफ़र भी करती हैं.

शायद यही है एक ईरानी नारी – अपना जीवन अपनी शर्तों और अपने ढंग से जीने वाली.

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