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मंगलवार, 21 जून, 2005 को 08:55 GMT तक के समाचार
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तेहरान के जग्गू चावला का क्रिकेट प्रेम

चुनावों की गहमागहमी के बीच
फ़ारसी में एक कहावत है, “गर हिंद रो नबीनीत दोनयारा नादीदीत” यानी अगर अपने भारत को नहीं देखा तो कुछ भी नहीं देखा.

शायद यही कारण है कि भारत का ज़िक्र आते ही ईरानियों की आँखों में अजीब सी चमक पैदा हो जाती है.

बहुत से ईरानी ऊँची शिक्षा के लिए भारत जाते हैं. यहाँ पर भारत से पढ़कर वापस आने वालों की एक एल्यूमनी एसोसिएशन भी है.

1500 वर्ग किलोमीटर में फैले, एक करोड़ बीस लाख आबादी वाले तेहरान शहर में अगर आप रास्ता भूल जाएं तो कोई ताज्जुब नहीं.

ऐसे में दिशा पहचानने का सबसे आसान तरीका है कि आपके उत्तर में बर्फ़ से ढँकी अलबोर्ज़ की पहाड़ियाँ हैं तो दक्षिण में ईमाम खुमैनी चौक पर टेलीकॉम का ऊँचा टावर.

अलबोर्ज़ पहाड़ियों पर ही ईरान की सबसे ऊँची चोटी है माउंट दावानंद. यहाँ पर बारह में से नौ महीने आइस स्केटिंग होती है और यहाँ पर पड़ने वाली बर्फ़ को दुनिया की सबसे अच्छी बर्फ़ में गिना जाता है.

शायद इन पहाड़ियों पर पर्वतारोहण के अभ्यास का नतीजा था कि इस साल ईरानी पर्वतारोहियों के एक दल ने माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने में सफलता प्राप्त की, इनमें कई महिलाएं भी हैं.

सबद कीर्तन और क्रिकेट

तेहरान में करीब सौ सिख परिवार रहते हैं और वहाँ एक गुरुद्वारा भी है. वहाँ रोज सुबह सबद कीर्तन होता है. जम्मू से ख़ास तौर से मोहन सिंह रागी को बुलाया गया है जो गुरुद्वारे में रहकर ही सबद कीर्तन करते हैं.

लंगर के लिए ईरान की सरकार रियायती दाम पर आटा मुहैया कराती है.

गुरुद्वारे से ही सटा हुआ एक केंद्रीय विद्यालय है जहाँ भारतीय दूतावास और कुछ अन्य विदेशी दूतावासों में काम कर रहे लोगों के बच्चे पढ़ते हैं.

तेहरान में ही मुलाकात हुई जग्गू चावला से. ये बहुत बड़े व्यापारी हैं और ईरान में बिजली की लाइने बिछाने के क्षेत्र के सबसे बड़े काँट्रेक्टर हैं.

इनका एक ही जुनून है - ईरान में क्रिकेट को लोकप्रिय बनाना.

यहाँ की टीमें लेकर वे दुबई जाते हैं और बाहर से भी टीमों को आमंत्रित करते हैं. इन्हीं के प्रयासों की वजह से ईरान आईसीसी यानी अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद का सदस्य बना है.

तालेज़ायी स्ट्रीट

कल ही मैं तालेज़ायी स्ट्रीट से गुज़रा जहाँ एक ज़माने में अमरीका का दूतावास हुआ करता था.

आज यहाँ एक निजी कंपनी का दफ़्तर है. इसी भवन में 66 अमरीकी दूतावास कर्मियों को सवा साल तक बंधक बनाकर रखा गया था और शायद इसी वजह से तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर दोबारा राष्ट्रपति बनने का अपना सपना पूरा नहीं कर पाए थे.

इसी भवन के बाहर एक किताब की एक दुकान है यहाँ एक सीडी बिकती है जिसमें अमरीकी दूतावास में पाए गए फटे हुए काग़जों को जोड़-जोड़कर दिखाया गया है कि किस तरह अमरीका ईरान की क्राँति के बाद वहाँ सैनिक विद्रोह की योजना बना रहा था.

दूतावास के मेन गेट पर अभी भी धुंधले अक्षरों में लिखा है 'डाउन विथ अमरीका'.

66ईरान का खुलापन
दुनिया भर में बंद समाज की छवि होने के बावजूद ईरानी समाज में खुलापन है.
66बॉलीवुड के दीवाने ईरानी
हमारे संवाददाता रेहान फ़ज़ल इन दिनों ईरान में है. उनका अनुभव उन्हीं की ज़ुबानी.
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