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किन मुद्दों पर लड़ा जा रहा है चुनाव? | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ईरान में हो रहे राष्ट्रपति चुनाव में मतदाताओं में उदासीनता है. कुछ लोगों का कहना है कि चाहे कोई भी राष्ट्रपति बने ईरान में कुछ नहीं बदलेगा और कुछ को लगता है कि उम्मीदवार वादे तो बहुत करते हैं लेकिन उन्हे निभाते नहीं. सात करोड़ की आबादी वाले ईरान दो तिहाई लोग 30 साल से कम उम्र के हैं. मतदान की आयु सीमा पंद्रह वर्ष है यानी इस चुनाव का परिणाम काफ़ी हद तक युवा मतदाताओं के रुख़ पर निर्भर करेगा. बीबीसी की ईरानी सेवा के हसन सोल्हजू का कहना है कि लोग अधिक नागरिक अधिकार चाहते हैं, वे कहते हैं, "ईरान में चुनाव के प्रमुख मुद्दे हैं मानवाधिकार, अर्थव्यवस्था और नागरिक अधिकार. लोग बेहतर ज़िन्दगी चाहते हैं और सभी उम्मीदवार उन्हे बेहतर भविष्य देने का आश्वासन दे रहे हैं." ईरान में 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद से जो सत्ता आई उसने जनजीवन पर बहुत सी पाबंदियाँ लगाईं. रहा एक पढ़ी लिखी युवती हैं और चाहती हैं कि उन्हे अपना काम अपने ढंग से करने की आज़ादी होनी चाहिए, "मैं एक पत्रकार हूं मैं चाहती हूं कि मैं पूरी स्वतंत्रता से अपना काम कर सकूं. मैं फ़िल्मकार भी हूं और चाहती हूं कि अपने ढंग से फ़िल्म बनाऊं और जो कहना चाहूं कहूं, मुझे इसकी पूरी आज़ादी हो." अर्थव्यवस्था नागरिक अधिकारों के साथ साथ अर्थव्यवस्था भी एक महत्वपूर्ण विषय है. ईरान में इस समय मुद्रा स्फीति की दर 14 प्रतिशत है, 40 प्रतिशत से ज़्यादा लोग ग़रीबी रेखा के नीचे रहते हैं. बेरोज़गारी बहुत है. तेहरान में ईरान न्यूज़ अख़बार के सम्पादक इरफ़ान परवेज़ कहते हैं, "सन 1920 के दशक से तेल ईरान का प्रमुख उद्योग रहा है. कच्चे तेल के उत्पादन में ईरान दुनिया का चौथा देश माना जाता था. और दूसरा सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश था. लेकिन इराक़ युद्ध ने उसकी क्षमता को बहुत कम कर दिया. तेल उद्योग सरकारी नियंत्रण में है, लालफीता शाही के कारण और विदेशी निवेश के अभाव में इस क्षेत्र में विकास नहीं हो पाया है. लोग परिवर्तन चाहते हैं लेकिन मौजूदा माहौल में उन्हे परिवर्तन होता दिखाई नहीं देता." बीबीसी की ईरानी सेवा के हसन सोल्हजू इसकी वजह बताते हैं, "असल में मुश्किल ये है कि ईरान के राष्ट्रपति के पास केवल 20 प्रतिशत अधिकार हैं बाक़ी के अधिकार ईरान के धार्मिक नेता अयातुल्ला अली ख़मनेई के हाथों में हैं. यूं तो देश चलाने की ज़िम्मेदारी राष्ट्रपति पर है लेकिन असलियत ये है कि देश अयातुल्लाह की मर्ज़ी से चल रहा है." सरकार कोशिश कर रही है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग मतदान में हिस्सा लें जिससे इस चुनावी प्रक्रिया को वैधता मिल सके लेकिन इसबार मतदाताओं में कुछ उदासीनता दिखाई दे रही है. एक मतदाता ने कहा, "मैं इस चुनाव में हिस्सा नहीं लूंगा क्योंकि अतीत में जो भी राष्ट्रपति चुनकर आए उन्होने अपने वादे पूरे नहीं किए. खोखले नारों से लोगों की समस्याएं नहीं सुलझतीं. एक उम्मीदवार ने ये नारा लगाया कि मैं ताज़ा हवा का झोंका लेकर आऊंगा. भला बताइए इससे क्या होगा. इससे हमारा पेट तो नहीं भरेगा न." लेकिन युवा पत्रकार रहा और वजह से मतदान में हिस्सा लेना नहीं चाहती, "मैं मतदान में हिस्सा न लेकर असल में इस्लामिक गणतंत्र को नकार रही हूं. शायद मैं उस आन्दोलन का हिस्सा बनना चाहूंगी जो कोशिश कर रहा है कि इस्लामिक गणतंत्र को कम से कम वोट मिलें जिससे वास्तव में बदलाव आ सके." लेकिन यह बदलाव आसानी से आने वाला नहीं दिखता. |
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