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जेहाद की अवधारणा क्या है? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान में कुछ प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों का कहना है कि इस्लाम में जेहाद यानी पवित्र युद्ध की अवधारणा को मुस्लिम युवाओं को सही परिप्रेक्ष्य में परिभाषित कर पाना बहुत मुश्किल साबित हो रहा है. पाकिस्तान के एक उच्च श्रेणी के इस्लामी विद्वान मुफ़्ती रफ़ी उस्मानी कहते हैं, "इराक़, अफ़ग़ानिस्तान और फ़लस्तीन के हालात युवाओं में आक्रोष भर रहे हैं और क्रोधित युवा किसी के भी नियंत्रण में नहीं होता है." कुछ अन्य प्रतिष्ठित विद्वान भी इस विचार से सहमत हैं. मुफ़्ती रफ़ी उस्मानी कराची के एक इस्लामी स्कूल दारुल उलूम के अध्यक्ष हैं. वह कहते हैं, "इस्लाम किसी भी हालत में बेक़सूर लोगों और ऐसे लोगों को मारने की क़तई इजाज़त नहीं देता जो लड़ाई में शामिल नहीं हैं." मुफ़्ती रफ़ी उस्मानी से जब जेहाद की अवधारणा को ज़रा विस्तार से बताने को कहा तो उनका कहना था कि क़ुरान में इस बारे में बहुत विस्तार से बताया गया है. उनका कहना है, "जेहाद सभी मुसलमानों के लिए अनिवार्य नहीं है और जेहाद का ऐलान कुछ बहुत ही विशेष हालात में किया जा सकता है." बीबीसी ने तीन प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों से जेहाद की अवधारणा स्पष्ट करने की गुज़ारिश की तो सबने तीन प्रमुख बिंदु बताए- अगर किसी मुस्लिम समुदाय पर हमला किया जाता है तब उस समुदाय में जेहाद सभी मुसलमानों के लिए अनिवार्य बन जाता है-मर्द और औरतों, सभी पर. अगर वह विशेष समुदाय सोचता है कि वह हमले का मुक़ाबला अपने दम पर नहीं कर सकता तो आसपास रहने वाले मुस्लिम समुदाय पर भी जेहाद अनिवार्य हो जाता है. अगर किसी देश का मुस्लिम शासक जेहाद की पुकार लगाता है तो उस शासक के अधीन रहने वाले सभी मुसलमानों के लिए जेहाद में शामिल होना कर्तव्य बन जाता है. जेहाद 'अनिवार्य नहीं' मुफ़्ती रफ़ी उस्मानी कहते हैं कि इन तीन तरह के हालात में भी जेहाद तभी अनिवार्य होता है जब हमले का सामना कर रहे देश की रक्षा के लिए ज़्यादा मुसलमानों की ज़रूरत होती है.
वह मिसाल देते हुए कहते हैं, "मान लीजिए कि पाकिस्तान पर हमला किया जाता है और अगर इसकी सेना सुरक्षा के लिए पर्याप्त है तो आम लोगों पर जेहाद में शामिल होने की कोई मजबूरी नहीं है." अनेक इस्लामी विद्वान कहते हैं कि दूसरा सिद्धांत जेहाद के नियम-क़ायदे बयान करता है और किसी भी तरह के हालात में महिलाओं, बच्चों, वृद्धों, बीमारों और आम लोगों पर हमला करने की इजाज़त नहीं है. कुछ मुस्लिम कट्टरपंथी दलील देते हैं कि अगर दुश्मन की कार्रवाई में मुसलमान मारे जाते हैं तो मुसलमानों को बदले में आम लोगों को मारने की इजाज़त है. लेकिन इस्लामी विद्वान इस तर्क से बिल्कुल भी सहमत नहीं हैं और कहते हैं कि इस्लाम इस बात की बिल्कुल भी इजाज़त नहीं देता कि 'एक ग़लती' का जवाब दूसरी ग़लती से दिया जाए. मुफ़्ती उस्मानी कहते हैं कि इस्लाम इस बारे में बिल्कुल साफ़ हिदायत देता है कि गणित के नियम की तरह दो ग़लत बातें मिलकर एक सही बात नहीं बन सकती. उस्मानी कहते हैं, "अगर कुछ लोग सोचते हैं कि अमरीका या ब्रिटेन इराक़ या अफ़ग़ानिस्तान में निर्दोष लोगों को मार रहे हैं तो इससे उन्हें लंदन या न्यूयॉर्क में बेक़सूर लोगों को मारने का अधिकार नहीं मिल जाता." कर्तव्यों की ज़िम्मेदारी कराची में एक इस्लामी स्कूल जामिया बिनोरिया के अध्यक्ष डॉक्टर सिकंदर कहते हैं कि अगर किसी देश में रहने वाले मुसलमान उस देश की विदेश नीति से सहमत नहीं हैं तो इस्लाम में उनके विकल्प बिल्कुल साफ़ तरीक़े से बयान किए गए हैं.
जामिया बिनोरिया के बारे में कहा जाता कि वहाँ से शिक्षा हासिल करने वाले अनेक छात्रों ने कट्टरपंथी रास्ता अपनाया जिनमें प्रतिबंधित संगठन जैशे मोहम्मद के संस्थापक मौलाना मसूद अज़हर का नाम भी लिया जाता है. डॉक्टर सिकंदर कहते हैं कि अगर किसी देश में रहने वाले मुसलमान सोचते हैं कि उनका देश किसी मामले में बहुत ग़लत काम कर रहा है तो वह उस देश को छोड़ सकते हैं. वह कहते हैं, "अगर ब्रिटेन में रहने वाला कोई इराक़ी इराक़ में ब्रिटेन की भूमिका पर क्रोधित है तो वह इराक़ में जाकर लड़ाई कर सकता है लेकिन उसे ऐसा कोई अधिकार नहीं है कि वह ब्रिटेन में रहने वाले आम लोगों को निशाना बनाए." पाकिस्तान के इस्लामी विद्वानों का कहना है कि यह विचार अपने कर्तव्यों को पूरा करने के इस्लामी सिद्धांत से उभरा है. मुफ़्ती उस्मानी कहते हैं, "अगर कोई मुसलमान किसी पश्चिमी देश की यात्रा करता है या वहीं रह रहा है तो उसका यह परम कर्तव्य है कि वह वहाँ के क़ानून का सम्मान और पालन करे." लौहार में एक अन्य इस्लामी स्कूल जामिया अशरफ़िया के प्रमुख मुफ़्ती अकरम कश्मीरी कहते हैं कि यह अवधारणा मुस्लिम युवाओं को समझाना बहुत मुश्किल साबित हो रहा है. वह कहते हैं, "क्रोधित मुस्लिम युवा इस अवधारणा से संतुष्ट नज़र नहीं आते इसलिए वे अपने अंदर के ग़ुस्से को बाहर निकलाने के लिए कई बार ऐसे उलेमाओं के पास भी चले जाते हैं जिनकी साख प्रमाणित नहीं होती." पाकिस्तान के प्रतिष्ठित उलेमाओं का मानना है कि दुनिया में आतंकवाद का हल मुसलमानों या उलेमाओं के हाथ में नहीं है. उनका कहना है कि पश्चिमी देशों को तमाम समस्याओं का समाधान खोजना चाहिए और इसमें मुसलमानों को भी शामिल करें, साथ ही जिन समस्याओं की वजह से आतंकवाद फैला है उनकी जड़ तक पहुँचकर उन्हें दूर करना चाहिए. |
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