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गुरुवार, 22 फ़रवरी, 2007 को 09:58 GMT तक के समाचार
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अपनों को खोज रहे कश्मीरियों का प्रदर्शन

मोहम्मद अशरफ वाणी
अशरफ वाणी का भाई गुलाम नबी भी पुलिस मुठभेड़ में मारा गया था
अनंतनाग के मोहम्मद लतीफ़ वाणी की कहानी बहुत लंबी है लेकिन वो इसे छोटा कर के सुनाते हैं.

कहानी लंबी इसलिए है क्योंकि कहानी कश्मीर की है. इसमें पुलिस है मुठभेड़ है. लाशें हैं तलाश है और अब लड़ाई है.

लतीफ़ चाहते हैं कि उनके लापता भाई गुलाम नबी वाणी के बारे में प्रशासन जानकारी दे. वे अकेले नहीं हैं, और भी कई लोग हैं जो अपने परिजनों के बारे में जानकारी चाहते हैं.

कश्मीर से आए ऐसे ही कई परिवारों ने गुरुवार को जंतर-मंतर पर धरना दिया और मांग रखी कि उनके लापता परिजनों के बारे में जानकारी दी जाए और जो मामले स्पष्ट हैं उनमें मुआवज़ा दिया जाए.

पिछले दिनों एक ऐसा मामला सामने आया था जिसके बाद एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को हिरासत में लिया गया. इसके बाद से कश्मीर के कई लोग अपने लापता परिजनों की तलाश में एक बार फिर जुटे हैं.

 मेरा भाई गुलाम नबी फुटपाथ पर दुकान लगाता था. बारह साल पहले की बात है. एक दिन अचानक स्पेशल टास्क फ़ोर्स के जवान आए और उसे उठा कर ले गए
गुलाम अशरफ वाणी

लतीफ़ का आरोप है, "मेरा भाई गुलाम नबी फ़ुटपाथ पर दुकान लगाता था. बारह साल पहले की बात है. एक दिन अचानक स्पेशल टास्क फोर्स के जवान आए और उसे उठा कर ले गए".

गुलाम नबी की लाश 11 महीने बाद मिली.

ऐसे कई और भी लोग हैं जो इसी तरह के आरोप लगा रहे हैं और अब मुआवज़ा चाहते हैं.

कई और हैं जो चाहते हैं कि कम से कम उनके लापता लोगों की जानकारी ही मिल जाए.

अब धीरे धीरे ऐसे कई और मामले सामने आने की संभावना भी जताई जा रही है.

कश्मीरी लोग
कश्मीर में बड़ी संख्या में लोग लापता हुए हैं

इन कश्मीरियों का दावा है कि 1990 में लापता लोगों की संख्या 8000 से अधिक थी.

हालांकि 2003 में राज्य सरकार ने यह संख्या 3931 बताई. दो साल बाद यह संख्या सरकार की ओर से 1017 हो गई.

इन कश्मीरियों के प्रदर्शन में जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के यासीन मलिक भी मौजूद थे. साथ ही कई और लोग भी कश्मीरियों के मानवाधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद कर रहे थे.

सड़क के दूसरी ओर कश्मीरी पंडितों का प्रदर्शन भी चल रहा था. हालांकि लोग बहुत कम थे लेकिन नाराज़गी उनकी भी साफ़ थी.

पंडितों का कहना था कि वो कश्मीर के लापता लोगों के परिजनों से सहानुभूति रखते हैं लेकिन उनके मानवाधिकार की कोई नहीं सोच रहा है.

1990 के दशक में चरमपंथ के दौर शुरु होने के बाद लाखों की संख्या में कश्मीरी पंडित घाटी छोड़ने पर मजबूर हुए हैं.

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