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जम्मू-कश्मीर में पर्सनल लॉ विधेयक | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर की विधानसभा ने मुस्लिम समुदाय से जुड़े दीवानी मामलों को सुलझाने के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ यानी शरीयत क़ानून के विधेयक को मंज़ूरी दे दी है. यह शरीयत क़ानून इंडियन शरीयत एक्ट, 1937 के तहत मुस्लिम पर्सनल लॉ के आधार पर तैयार किया गया है. पारित विधेयक राज्यपाल की मंज़ूरी के बाद लागू हो सकेगा. इस संदर्भ में राज्य हाईकोर्ट ने भी कुछ वर्ष पहले ही कहा था कि विरासत जैसे मामलों में फ़ैसला शरीयत क़ानून के आधार पर ही होगा. न्यायालय का कहना है कि पारंपरिक क़ानून का सहारा तभी लिया जा सकता है जबकि दोनों ही पक्ष इसके लिए राज़ी हों. अभी तक पिछले 100 वर्षों से पारंपरिक रूप से न्याय देने की जो व्यवस्था लागू थी उसके तहत पैतृक संपत्ति, शादी-तलाक, घरेलू संबंध और वसीयत जैसे जुड़े मामलों को निपटारा किया जाता था. इस विधेयक को पहले विधानसभा में मंज़ूरी दी गई जिसके बाद विधान परिषद ने भी बुधवार को इसे अपनी मंज़ूरी दे दी. अगर राज्यपाल के पास से भी इसे मंज़ूरी मिल जाती है तो राज्यभर में दीवानी मामलों के लिए एक समान क़ानून लागू हो सकेगा. यह व्यवस्था मुस्लिम समुदाय के संदर्भ में ही लागू होगी. हिंदू समुदाय के संदर्भ में 1956 में लागू हुआ हिंदू विरासत क़ानून ही प्रभावी बना हुआ है. यह विधेयक दो वर्ष पहले ही विधानसभा में पेश किया गया था जहाँ इसे एक समिति के पास भेज दिया गया था. इसके बाद इस सत्र में इसपर बहस के बाद इसे पारित कर दिया गया. नया क़ानून विधेयक को सदन में पेश करने वाले विपक्षी दल नेशनल कान्फ्रेंस के नेता, अब्दुर्रहीम राथर ने कहा, "इस तरह की सैकड़ों मिसालें मौजूद हैं जहाँ एक ही परिवार के लोगों ने एक ही तरह के मामलों में कभी पारंपरिक क़ानूनों का सहारा लिया तो कभी शरियत क़ानूनों का. इससे लोगों को परेशानी उठानी पड़ीं और भ्रष्टाचार भी हुआ है." राथर बताते हैं कि नया क़ानून इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पारंपरिक व्यवस्था में महिलाओं और नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा था. नई व्यवस्था के तहत जो शरीयत क़ानून लागू किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं, उसमें लड़की को भी पैतृक संपत्ति में अधिकार दिया जाएगा. इसके अलावा इसमें पारंपरिक क़ानूनों की कई पेचीदगियों को भी ख़त्म करने की कोशिश की गई है. इंडियन शरीयत एक्ट, 1937 के तहत मुस्लिम पर्सनल लॉ देशभर में मुस्लिम समुदाय से जुड़े दीवानी मामलों को सुलझाने के लिए लागू किया गया था. पर इस राज्य को विशेष दर्जा हासिल होने के कारण यहाँ यह प्रभावी नहीं हो सका था. | इससे जुड़ी ख़बरें 'मुसलमानों के लिए ख़ास कार्यक्रम हों'07 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस सरकारी नौकरियों में 'पिछड़े' मुसलमान10 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस 'शरीयत अदालतें समानांतर अदालतें नहीं'28 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस शरीयत अदालतों पर नोटिस16 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस मुस्लिम पर्सनल क़ानूनों में सुधार की माँग28 जून, 2005 | भारत और पड़ोस आदर्श निकाहनामे को मंज़ूरी26 दिसंबर, 2004 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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