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शुक्रवार, 10 नवंबर, 2006 को 23:02 GMT तक के समाचार
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सरकारी नौकरियों में 'पिछड़े' मुसलमान

मुसलमान
नौकरियों में मुसलमानों की भागीदारी उनकी जनसंख्या के अनुपात में काफ़ी कम है
अभी तक सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के जो अंश सामने आए हैं उससे संकेत मिलते हैं कि सरकारी सेवाओं में अल्पसंख्यकों, ख़ासतौर पर मुसलमानों की संख्या काफ़ी कम है.

कहा तो यहाँ तक गया है कि जेल ही शायद एक ऐसी जगह है जहाँ मुसलमानों की संख्या उनकी कुल आबादी के अनुपात से अधिक है.

भारत में मुसलमानों की आबादी कुल आबादी का 15.4 प्रतिशत है जबकि भारत में 4790 आइएएस अधिकारियों में से सिर्फ़ 108 अधिकारी मुस्लिम समुदाय से हैं यानि 2.2 प्रतिशत.

 लेकिन अगर मुसलमान प्रशासनिक सेवा में नहीं हैं तो इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं लगाया जाना चाहिए कि सारे के सारे मुसलमान बेरोजगार बैठे हैं
योगेश अटल

केंद्र के 83 सचिवों में से आज की तारीख़ में कोई भी मुस्लिम नहीं है.

भारतीय पुलिस सेवा के 3209 अधिकारियों में से सिर्फ़ 109 मुसलमान हैं.

लेकिन कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि उच्च पदों पर मुसलमानों के न होने का ये मतलब कतई नहीं है कि मुसलमानों का एक बड़ा तबका बेरोजगार है.

पिछड़ापन

जाने माने समाजशास्त्री और यूनेस्को में निदेशक रह चुके योगेश अटल कहते हैं,"आँकड़े झुठलाए नहीं जा सकते. लेकिन अगर मुसलमान प्रशासनिक सेवा में नहीं हैं तो इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं लगाया जाना चाहिए कि सारे के सारे मुसलमान बेरोजगार बैठे हैं.हो सकता है कि वो किसी और तरीके से अर्थव्यवस्था में अपना योगदान कर रहे हों."

विदेश सेवा में वरिष्ठतम मुस्लिम अधिकारी तलज़ीम अहमद नौकरियों में मुसलमानों के साथ होने वाले भेद-भाव पर कहते हैं,"मुझे नौकरी करते 32 साल हो गए. मेरा बड़ा ही शानदार करियर रहा है.दिक्कत है निचले तबके में.मुस्लिम समाज के निचले तबके की दिक्कतें भी हिंदू समाज के निचले तबके की दिक्कतों के जैसी ही हैं.दिक्कत है कि मुसलमानों में मध्य वर्ग नहीं है. विभाजन के समय मुस्लिम मध्य वर्ग का बड़ा तबका पाकिस्तान चला गया और मौजूदा निचले तबके के लोगों का स्तर ऊपर उठाना एक बड़ा काम है."

 मुझे नौकरी करते 32 साल हो गए. मेरा बड़ा ही शानदार करियर रहा है.दिक्कत है निचले तबके में.मुस्लिम समाज के निचले तबके की दिक्कतें भी हिंदू समाज के निचले तबके की दिक्कतों के जैसी ही हैं
तलज़ीम अहमद

गौर करने की बात यह है कि रक्षा और गुप्तचर एजेंसियों में भी मुसलमानों की गिनती न के बराबर है.

इंटेलिजेंस ब्यूरो में संयुक्त निदेशक रह चुके मलय कृष्ण धर कहते हैं,"विभाजन के समय गुप्तचर एजेंसियाँ भी बँट गईं और उस समय मुसलमानों को लेकर संदेह था. बाद में मैंने अपने स्तर पर कुछ प्रयास किए. मैंने जब कुछ मुसलमान अधिकारियों से पूछा कि तुम क्यों गुप्तचर सेवा में आना नहीं चाहते हो तो उन लोगों ने कहा कि हमारे मज़हब के बड़े नेता हमें मना करते हैं."

भेदभाव

सुनने में अज़ीब लगे लेकिन ये सच है कि आज की तारीख़ में कोई मुसलमान या सिख प्रधानमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था का सदस्य नहीं हो सकता.

मलय ने कहा,"हम आज भी 1930 की मानसिकता के साथ जी रहे हैं कि हिंदू अलग हैं मुस्लिम अलग.हमें इस मानसिकता को दूर करना पड़ेगा."

प्रधानमंत्री ने जब मुसलमानों को नौकरी में आरक्षण देने की बात कही तो उसकी काफ़ी आलोचना हुई और ये आशंका व्यक्त की गई कि वो धर्म के आधार पर आरक्षण देने की जमीन तैयार कर रहे हैं.

 धर्म के नाम पर आरक्षण क्या पहले नहीं दिया गया.जब आप कह रहे हैं कि दलित हिंदू ही हैं तो क्या उनको आरक्षण नहीं मिला हुआ है. धर्म के आधार पर आरक्षण आज की ज़रूरत है
ताहिर महमूद

आरएसएस के मुख पत्र 'ऑर्गेनाइजर' के पूर्व संपादक शेषाद्रिचारी कहते हैं,"ये एक राजनीतिक सोच है. उत्तर प्रदेश में होने वाले विधान सभा चुनावों में फायदा उठाने के लिए ये शिगूफा छोड़ा गया है.सारे तथ्य सामने आने के बाद ही प्रधानमंत्री को बयान देना चाहिए."

आरक्षण

वहीं धर्म के आधार पर आरक्षण के मसले पर मुसलमानों का कहना था कि इसमें बुरा क्या है.

अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष ताहिर महमूद कहते हैं,"धर्म के नाम पर आरक्षण क्या पहले नहीं दिया गया.जब आप कह रहे हैं कि दलित हिंदू ही हैं तो क्या उनको आरक्षण नहीं मिला हुआ है. धर्म के आधार पर आरक्षण आज की ज़रूरत है."

अपने समुदाय के पिछड़ेपन पर दिल्ली के सैयद मुज़ीब-उर-रहमान कहते हैं,"हमारे बीच साक्षरता की कमी है,एक-एक परिवार में लोगों की संख्या ज़्यादा है इसलिए परवरिश में दिक्कत आती है."

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