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'विजय माल्या खेल नहीं समझते हैं' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विजय माल्या जो कर रहे हैं, वो मुझे क्रिकेट लगता ही नहीं. विजय माल्या को ये शिकायत है कि क्रिकेट ऐसा खेल है जिसमें कप्तान ही बॉस है. पिछले 200 साल ये मानी हुई बात है कि क्रिकेट के मैदान पर कप्तान बॉस ही होता है. लेकिन विजय माल्या मैदान में नए नए उतरे हैं, वो नवदौलतिए हैं और नई दौलत के गुरूर में उन्हें समझ नहीं आ रहा कि खेल क्या होता है. वो चाहते हैं कि क्रिकेट टीम का बॉस कप्तान के बजाए उसका मालिक होना चाहिए. ऐसी परिस्थिति में ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती कि वो लोगों से बेहतर व्यवहार करेंगे. मुझे लगता है कि उनके आसपास के लोगों ने उन्हें चढ़ाया है कि आप ख़ुद खिलाड़ियों की ख़रीद में शामिल नहीं हुए और राहुल द्रविड़ और चारू शर्मा के कहने में आ गए. इन लोगों ने एक टेस्ट टीम बना ली और ये कुछ नहीं कर सकती. ये तो मुझे समझ में आता है कि इस टीम के कारण व्यापार में नुक़सान हो रहा हो जिससे वो नाराज़ हैं. लेकिन क्रिकेट के प्रदर्शन से उनका क्या मतलब, ये मुझे समझ में नहीं आता है. मुझे नहीं लगता कि कोई टीम जीतती ही चली जाएगी और अगर हार रही है तो राहुल द्रविड़ और चारू शर्मा के कारण हार रही है और अगर विजय माल्या की टीम होती तो जीतती चली जाती. ये सोचना कि ज्यादा पैसा लगाया है तो टीम जीतती चली जाएगी, ऐसा तो फ़ुटबॉल में भी नहीं होता. सौभाग्य से खेल में हार और जीत ख़रीदी नहीं जा सकती. खेल में श्रेष्ठता को पैसे से नहीं तोला जा सकता. ये पैसे का दिखावा है और नवदौलतिए का गुरूर है. इससे क्रिकेट को लाभ नहीं होनेवाला है और यह खेल के तौरतरीकों को बर्बाद कर देगा. (आशुतोष चतुर्वेदी से बातचीत पर आधारित) |
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