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मंगलवार, 13 मई, 2008 को 12:01 GMT तक के समाचार
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'टीम से उम्मीद रखने में ग़लत क्या है'

विजय माल्या
विजय माल्या अपनी टीम के खिलाड़ियों के प्रदर्शन से नाखुश हैं
बंगलौर रॉयल चैलेंजर्स की इंडियन प्रीमियर लीग क्रिकेट प्रतियोगिता में हालत बिगड़ती ही जा रही है.

सात मैच हारने के बाद अब टीम लीग तालिका में सबसे नीचे है और ज़ाहिर है कि टीम के मालिक इस प्रदर्शन को लेकर बेहद नाराज़ हैं.

बंगलौर टीम के कप्तान राहुल द्रविड़ को मालिक विजय माल्या से खुली चेतावनी भी मिल चुकी है. बहुत से लोग माल्या के इस व्यवहार से खुश नहीं हैं पर क्या कोई भी टीम इस तरह का प्रदर्शन बर्दाश्त कर सकती है?

भारतीय टीम में पहली बार पेशेवर पहलू नज़र आ रहा है. खिलाड़ियों के लिए खुली बोली लगी तो अब उन खिलाड़ियों से मैदान पर प्रदर्शन की अपेक्षा भी की जा रही है.

अगर क्लब या निजी फ्रेंचाइजी की बात करें तो यह कहना ग़लत नहीं होगा कि जो भी पैसे खर्च करेगा वह परिणाम की उम्मीद करे तो ज़्यादती नहीं कही जानी चाहिए.

आख़िर जब मैनचेस्टर यूनाइटेड के प्रशिक्षक सर ऐलक्स फ़र्गुसन को डेविड बेकम की ज़रूरत महसूस नहीं हुई तो उन्हें स्पेन की रियल मैड्रिड के हाथों बेचने में जरा भी देरी महसूस नहीं की.

या फिर चेलसी के प्रशिक्षक जोस होसेमोरिनियो को क्लब के मालिक रोमन एब्रामोविच ने टीम के लगातार ख़राब प्रदर्शन पर बाहर का रास्ता दिखा दिया.

और अब आलम यह है कि बेकम फुटबॉल मैदान से ज्यादा ग्लैमर की दुनिया में नज़र आते हैं.

भारत में हमेशा ही खेल में जवाबदेही ग़ायब रही है. पर अब आईपीएल ने इसके दरवाजे मज़बूती से खोल दिए हैं.

माल्या यह नहीं कह रहे हैं कि क्रिकेट खिलाड़ी उनकी कंपनी के उत्पाद बेचें.

उनकी माँग है कि बंगलौर रॉयल चैंलेजर्स मैच जीते, आख़िर जब खिलाड़ियों पर बोली लग रही थी तो कप्तान को अपनी टीम चुनने की पूरी छूट मिली थी. तब जो व्यक्ति पैसा खर्च कर रहा है वह उसके बदले टीम से बढ़िया प्रदर्शन की माँग करता है तो इसमें ग़लत क्या है.

कई लोग इसे पूर्व राष्ट्रीय कप्तान या फिर दिग्गज खिलाड़ी का अपमान भले ही कहें पर यही पेशेवर खेल जगत की असलियत है. अगर आपका प्रदर्शन बढ़िया नहीं हो सकता तो फिर उसके दुष्परिणाम के लिए तैयार रहना चाहिए.

आख़िर जब अमरीकी बास्केटबॉल फ़्रैंचाइजी लॉस एजेंलिस लेकर्स को शक़ीलओ निल की ज़रूरत महसूस नहीं हुई तो उन्हें आनन-फानन में मियामी हिट को बेच दिया गया. वही वो निल 'प्ले ऑफ़ मुक़ाबलों' तक खेलने के लिए तरस रहे हैं.

पेशेवर खेल

पेशेवर खेल का मूल मंत्र है कि जो टीम के हित में है वही सही है. यह बात बंगलौर रॉयल चैंलेजर्स पर भी पूरी तरह लागू होती है.

 आख़िर जब खिलाड़ियों पर बोली लग रही थी तो कप्तान को अपनी टीम चुनने की पूरी छूट मिली थी. तब जो व्यक्ति पैसा खर्च कर रहा है वह उसके बदले टीम से बढ़िया प्रदर्शन की माँग करता है तो इसमें ग़लत क्या है.

अभी टीम को आईपीएल में मैच जीतने की ज़रूरत है और द्रविड़ के खिलाड़ी फिलहाल ऐसा करने में ख़ुद को असमर्थ पा रहे हैं. ऐसी स्थिति में टीम के मालिक अगर कुछ नया करना चाह रहे हैं तो ग़लत क्या है.

भारत में आख़िर पहली बार पेशेवर खेल ने क़दम रखा है. भावुक होकर इस पर पाबंदी नहीं लगनी चाहिए. तभी खेल आगे बढ़ पाएँगे.

आईपीएल के बदौलत क्रिकेट खिलाड़ियों को मोटी कमाई हो रही है. पर इसके बदले उन्हें लगातार बढ़िया खेल दिखाना ज़रूरी हो गया है. एक बात तो तय है- पैसा और प्रदर्शन अलग-अलग नहीं मापे जा सकते हैं. जहाँ जितना पैसा है वहाँ उतना ज़्यादा ख़तरा भी है.

आख़िर माल्या की कंपनी ने बंगलौर की क्रिकेट टीम पर लगभग 20 करोड़ डॉलर खर्च किए हैं. ऐसे में खिलाड़ियों से बढ़िया खेल की माँग करना भी तो माल्या का हक़ बनता है.

सबसे ज़्यादा जो बात माल्या को चुभ रही है कि उनकी टीम हारी नहीं है बल्कि बुरी तरह पिट रही है. यह बात सबसे शोचनीय है क्योंकि खिलाड़ी तो वही हैं जिन पर कप्तान द्रविड़ ने बोली लगाई थी अब यदि टीम नहीं जम पा रही हैं तो इसकी जिम्मेदारी भी द्रविड़ के कंधों पर ही होनी चाहिए.

यह मामला भारतीय टीम का नहीं है जहाँ चयन समिति कप्तान से सलाह तो करती है लेकिन कप्तान को चयम समिति में वोट देने का अधिकार नहीं होता है.

समय बदल रहा है और बदलते समय की माँग है कि खिलाड़ी अपने प्रदर्शन के आधार पर पैसा कमाएँ. आख़िर राजस्थान रॉयल्स पर कोई उँगली नहीं उठ रही है.

माल्या ने अच्छा उदाहरण दिया है कि यदि खेल में पैसा चाहिए तो उसके लिए प्रदर्शन करना पड़ेगा.

अगर ऐसा नहीं हुआ को बदलाव आते देर नहीं लगेगा. आमदनी का सीदा संबंध प्रदर्शन से होना सही है.

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