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शनिवार, 21 अप्रैल, 2007 को 14:56 GMT तक के समाचार
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क्यों नहीं मिल पाई मेज़बानी?

एशियाई खेल
2014 में होने वाले एशियाई खेलों की मेज़बानी कोरिया को मिल गई
भारत का 32 वर्ष के अंतराल के बाद एशियाई खेलों की मेज़बानी करने का सपना उस समय टूट गया जब एशियाई ओलंपिक परिषद ने 2014 के एशियाई खेलों की मेज़बानी दक्षिण कोरिया के शहर इन्चोन शहर को दे दी.

वैसे मेज़बानी के लिए कड़े मुक़ाबले पहले भी कई बार हुए हैं. 2012 के ओलंपिक खेलों की मेज़बानी के लिए पेरिस को लंदन ने एक कड़े मुकाबले में हराया. फ्राँस में मातम मनाया गया तो इंग्लैंड में जश्न.

दक्षिण कोरिया में भी जश्न मनाया जा रहा है लेकिन भारत में भी कुछ वर्गों में एक अलग किस्म का संतोष है.

 कॉमनवेल्थ खेल के लिए कुल मिलाकर पाँच-छह हज़ार करोड़ रुपए का खर्चा होगा. मेरी सोच है पाँच-छह हज़ार करोड़ रुपए पंचायत युवा केंद्र शुरू करने पर पर लगाए जाएं.
मणिशंकर अय्यर, खेल मंत्री, भारत

भारत के खेल मंत्री मणिशंकर अय्यर इस नतीजे पर पहुँचे कि चाहे आप मेलबोर्न में राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन करें या नई दिल्ली में- इससे स्टेडियम के बगल में रहने वाले ग़रीबों की ज़िंदगी में कोई फ़र्क नहीं आ सकता.

बाद में बीबीसी से बात करने में वो उतने आक्रामक नहीं दिखे लेकिन उन्होंने अपनी बात पूरी मज़बूती से रखी.

पक्ष

सुरेश कलमाडी
मणिशंकर अय्यर के बयान पर कलमाडी ख़ासे नाराज़ हो गए

उन्होंने कहा, "राष्ट्रमंडल खेलों के लिए कुल मिलाकर पाँच-छह हज़ार करोड़ रुपए का ख़र्चा होगा. मेरी सोच है ये पाँच-छह हज़ार करोड़ रुपए पंचायत युवा केंद्र शुरू करने पर पर लगाए जाएँ."

भारत के खेल प्रदर्शन पर उन्होंने कहा, "2012 के ओलंपिक में हम दिखा देंगे कि हम कितने मेडल जीत सकते हैं. मुझे बस 2016 तक छूट दे दीजिए. हम विश्व के अव्वल देशों में पहुँच सकते हैं."

भारत में खेलों पर ख़र्च किए जा रहे पैसों पर उनका कहना था, "हम अपना पूरा पैसा राष्ट्रमंडल खेल और एशियन खेल में ख़र्च करते रहे हैं. हमारे संविधान में खेल राज्य का विषय है. सरकारी पैसा खेल संघों को देने के सिवाए हमें करने को कुछ नहीं है."

भारतीय ओलंपिक संघ के प्रमुख सुरेश कलमाडी खेल मंत्री के तर्कों से संतुष्ट नहीं दिखे और उन्होंने इन्चोन के हाथों दिल्ली की हार का ठीकरा अय्यर के ही सिर फोड़ा.

सुरेश कलमाडी ने कहा, "ये खेल मंत्री हैं और खेल के बारे में उनको कोई जानकारी नहीं है. मंत्रिमंडल जब निर्णय लेता है तो खेल मंत्री को उसका समर्थन करना चाहिए. अब खेल मंत्री की अलग राय हो तो हम क्या करें?"

 आपको बिजली तो दिल्ली में लानी है. होटल के कमरे बढ़ाने हैं. हिंदुस्तान में आज पर्यटक को ढाई सौ डॉलर के एक-एक कमरे किराये पर मिलते हैं. अगर आप 20 हज़ार और कमरे बनाएँगे तो अपने पैसे से तो नहीं बनाएँगे. आप तो केवल प्लॉट नीलाम कर रहे हैं, इसे प्राइवेट होटल वाले ही बनाएँगे. इसमें आपका कहाँ से ख़र्चा है. अगर आप दिल्ली में मेट्रो सिस्टम बढ़ा रहे हैं तो ये एशियाई खेल के खिलाड़ियों का ख़र्चा तो नहीं है.
रणधीर सिंह, महासचिव, भारतीय ओलंपिक संघ

भारतीय ओलंपिक संघ और एशियाई ओलंपिक परिषद के महासचिव रणधीर सिंह भी मणिशंकर अय्यर के तर्कों से सहमत नहीं है.

वो कहते हैं कि ये कहना सही नहीं है कि आयोजन के सिलसिले में दिल्ली में किए ख़र्चों को खेलों के कुल ख़र्च में सम्मिलित किया जाना चाहिए.

रणधीर सिंह ने कहा, "आपको बिजली तो दिल्ली में लानी है. होटल के कमरे बढ़ाने हैं. हिंदुस्तान में आज पर्यटक को ढाई सौ डॉलर के एक-एक कमरे किराये पर मिलते हैं. अगर आप 20 हज़ार और कमरे बनाएँगे तो अपने पैसे से तो नहीं बनाएँगे, आप तो केवल प्लॉट नीलाम कर रहे हैं, इसे प्राइवेट होटल वाले ही बनाएंगे. इसमें आपका कहाँ से ख़र्चा है. अगर आप दिल्ली में मेट्रो सिस्टम बढ़ा रहे हैं तो ये एशियाई खेल के खिलाड़ियों का ख़र्चा तो नहीं है."

खेल मंत्री के इस ऱुख़ से काफ़ी नाराज़ रणधीर सिंह कहते हैं कि वो देखना चाहेंगे कि बचाए गए पैसों को खेल मंत्री खिलाड़ियों पर किस तरह ख़र्च करते हैं.

सवाल ये उठता है कि 2014 के एशियाई खेलों की मेज़बानी न मिलना भारत के लिए कितने घाटे का सौदा रहा.

2010 के राष्ट्रमंडल खेलों से दिल्ली की अर्थव्यवस्था को कितना फ़ायदा होने जा रहा है ये पूरी तरह से सामने नहीं आया है लेकिन ये अनुमान ज़रूर है कि 2012 में ओलंपिक खेलों की मेज़बानी कर रहे लंदन में 2005 और 2012 के बीच 35 हज़ार नई नौकरियाँ पैदा होंगी.

फ़ायदा

खेल
इन खेलों का भव्यता के साथ आयोजन किया जाता है

इकॉनॉमिक टाइम्स से संपादक एमके वेनू कहते हैं, "आँकड़ों के अनुसार आज की तारीख़ में 45 लाख पर्यटक हिंदुस्तान आते हैं जो बहुत कम है. चीन में क़रीब दस करोड़ पर्यटक आते हैं. सिंगापुर को लीजिए वहाँ क़रीब एक करोड़ पर्यटक आते हैं जो एक छोटा सा नगर-राज्य है जबकि हिंदुस्तान बहुत बड़ा देश है. तुलना करें तो भारत में जो पर्यटक आते हैं वह बहुत कम है. और पर्यटन से होने वाली क़रीब 320 अरब रुपए की आमदनी भी बहुत कम है."

उन्होंने कहा, "अगर एशियाई खेल होते तो पर्यटन को बढ़ावा मिलता. एक आँकड़ा ये भी बताता है कि अगर राष्ट्रमंडल और एशियाई खेल दोनों होते तो विश्व पर्यटन में हिंदुस्तान की हिस्सेदारी आधे प्रतिशत से बढ़कर 1.5 प्रतिशत तक हो सकती थी. इसके अलावा निर्माण क्षेत्र में उछाल आता. दिल्ली के लोगों को याद होगा कि 1982 के एशियाई खेल दिल्ली के बुनियादी ढाँचे में बड़ा बदलाव आया था."

उनका कहना था कि बड़े खेलों के आयोजन से आर्थिक वृद्धि होती है. चीन के शहर बीजिंग में ओलंपिक खेलों के लिए जो तैयारी हो रही है उस वजह से शहर की सकल घरेलू उत्पाद दर में पिछले दो-तीन सालों में दो प्रतिशत से वृद्धि हुई है.

भारतीय दल के साथ कुवैत गए खेल पत्रकार नौरिस प्रीतम का कहना है, "कोई एक वजह नहीं होती जो खेल की मेज़बानी आपको न मिले. कोई भी खेल मिलने की कई वजहें होती हैं. ये कहा जा रहा है कि खेल मंत्री के कुछ बोलने से लोग उखड़ गए और आयोजन की ज़िम्मेदारी हमें नहीं मिली. कुवैत में मेरी कुछ खेल प्रतिनिधियों से बात भी हुई. उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा था. एक वजह शायद पैसा भी था. जिस तरह प्रस्तुतीकरण से पहले 45 देशों के प्रतिनिधियों से मिलना था शायद उसमें कमी रह गई हो. प्रस्तुतीकरण के लिए तो हमारे पास सिर्फ़ 40 मिनट का टाइम था.

 अगर एशियाई खेल होते तो पर्यटन को बढ़ावा मिलता. एक आँकड़ा ये भी बताता है कि अगर कॉमनवेल्थ और एशियन खेल दोनों होते तो विश्व पर्यटन में हिंदुस्तान की हिस्सेदारी आधे प्रतिशत से बढ़कर 1.5 प्रतिशत तक हो सकती थी. इसके अलावा निर्माण क्षेत्र में उछाल आता.
एमके वेनू, संपादक, इकोनोमिक टाइम्स

उन्होंने कहा, "फिर कोरिया खेलों का देश माना जाता रहा है. ओलंपिक अनुशासन और ओलंपिक खेल जिसे कहा जाता है वो भारत में नहीं है. भारत में क्रिकेट है, अगर हम क्रिकेट में कुछ करना चाहें तो वह जल्दी से मिल जाता है."

अगर पैसे से ही खेलों का आयोजन सुनिश्चित होता है तो इसका मतलब ये हुआ कि वियतनाम, फिलीपींस और बांग्लादेश जैसे ग़रीब देश इन खेलों की मेज़बानी की कल्पना भी नहीं कर सकते.

इस बारे में रणधीर सिंह का सुझाव है कि ये खेल बारी-बारी से अलग-अलग देशों में होने चाहिए.

रणधीर सिंह कहते हैं, "मेरे हिसाब से खेल बारी-बारी से जानी चाहिए. ये नहीं कि एक ही क्षेत्र में बार-बार खेल हो रहा है. पिछले कई सालों से एक ही क्षेत्र में खेल हो रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति की कोशिश होती है कि खेल अलग-अलग महाद्वीप में हों."

इन खेलों के आयोजन पर मणिशंकर अय्यर के विरोधी रवैए पर नौरिस प्रीतम कहते हैं, "राष्ट्रमंडल खेलों की जो आयोजन समिति बनी है उसमें दोनों ही मुखिया बनना चाहते हैं. यही एक मुद्दा है जिसको लेकर विवाद चल रहा है और जिसकी वजह से आज हमें यह दिन देखना पड़ रहा है. इस विवाद को जल्दी से जल्दी सुलझा लिया जाए नहीं तो आने वाले दिनों में खेलों को और नुकसान पहुँचेगा."

क्या वास्तव में मुद्दा ग़लत प्राथमिकताओं पर ख़र्च करने का है या फिर ग़लत जगह पर बोलने का? शायद इनमें से कोई भी नहीं.... सीधे तौर पर ये मामला दो राजनीतिज्ञों के बीच स्थान की लड़ाई या टर्फ़ वार का है.

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