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'मेरे वज़न से खेल पर फ़र्क़ नहीं पड़ता' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय क्रिकेट टीम के ऑफ़ स्पिनर रमेश पोवार मानते हैं कि चैम्पियंस ट्रॉफ़ी वर्ल्ड कप के बाद सबसे बड़ा टूर्नामेंट होता है और सभी प्रमुख टीमों के पास अपनी क्षमता को परखने का अच्छा मौका होता है. पवार ने अपने फ़िटनेस से जुड़े सवालों पर भी बीबीसी हिंदी के मानक गुप्ता से खुलकर बात की. उनका कहना है कि मोटे होने से उनके खेल पर कोई असर नहीं पड़ता. आज पूरी दुनिया के क्रिकटरों के फिटनेस को लेकर काफ़ी बात होती है लेकिन आप उतने फिट नहीं दिखाई देते हैं. इसकी क्या वज़ह है? मैंने मुंबई के लिए खेलने के दौरान भी फ़िटनेस को लेकर कोशिश की थी. देखिए क्रिकेट को लेकर मेरा मानना है कि या तो आप अच्छे एथलीट हो सकते हैं या फिर एक अच्छे क्रिकेटर. दोनों एक साथ होना मुश्किल है. आप देखेंगे कि जितने भी क्रिकेटर होंगे वे या तो बचपन से पतले होंगे या फिर मोटे हैं तो कुछ समय के लिए ही पतले हो सकते हैं. मैं फिटनेस पर इतना ध्यान नहीं देना चाहता था कि मेरा खेल प्रभावित हो बाक़ी फिटनेस पर ध्यान तो देता ही हूँ. कभी टीम प्रबंधन ने नहीं कहा फिटनेस पर ध्यान देने के लिए? नहीं, टीम प्रबंधन सिर्फ़ इतना चाहता है कि सौ ओवर का खेल मैं बिना घायल हुए खेलूँ. वे मुझसे केवल खेलने के लायक ज़रूरी फिटनेस की अपेक्षा करते हैं और कभी भी वज़न घटाने के लिए दबाव नहीं डाला जाता. क्या कभी भी ऐसा लगा कि वज़न के चलते खेल प्रभावित हुआ है या वज़न कम होता तो ज्यादा तेज़ भाग पाते? नहीं, मैं ऐसा नहीं मानता. अगर वज़न कम कर लूँ तो शायद बल्लेबाजी बढ़िया कर लूँ लेकिन गेंदबाजी शायद न कर पाऊँ. मैंने दो बार वज़न कम करके देखा है. वज़न कम करने के लिए खाना कम करना पड़ता है यानी सही डाइट पर का ध्यान रखना पड़ता है. लेकिन मैच के दौरान या कैंप में आप खाना नहीं छोड़ सकते यानी कि पेट में खाना होना ही चाहिए. किस तरह का खाना खाते हैं? सामान्य भोजन ही लेता हूँ लेकिन जब घर में रहता हूं तो अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रहता. घर पर मराठी खाना जो मेरी बीवी या सास पकाती है वही खाता हूँ. जब आप दौरे पर होते हैं तो खाने-पीने की दिक्कत नहीं होती है? लंबे दौरे मेरे लिए फिटनेस पर ध्यान देने का मौका होता है. जब भी मैं किसी लंबे दौरे से वापस आता हूँ तो मेरा वज़न अपने आप ही चार-पाँच किलो कम हो जाता है. लेकिन ये वज़न मैं क्रिकेट के लिए नहीं कम करता बल्कि घर आकर खाने के लिए कम करता हूँ क्योंकि इससे ये चिंता नहीं रहती कि घर में जमकर खाने से वज़न बढ़ जाएगा. वैसे भी मैंने इन चीजों पर बहुत ध्यान नहीं दिया है. मैं अपने आत्मविश्वास पर ज़्यादा ध्यान देता हूँ. क्रिकेट आत्मविश्वास का खेल है. अगर आपके पास आत्मविश्वास है तो फिर इससे फर्क़ नहीं पड़ता कि आपका वज़न 50 किलो है या 100 किलो. आपके और दूसरे खिलाड़ियों के खान-पान में कोई अंतर है? सबकी एक ही जैसी है. सब चाहते हैं कि घर का खाना मिले खा़सकर भारतीय और पंजाबी खाना. भारतीय टीम में एक-दो को छोड़कर सभी नॉन वेज़ खाना पसंद करते हैं. केवल अनिल कुंबले और वीवीएस लक्ष्मण ही शाकाहारी हैं. सुना है, वीरेंद्र सहवाग और महेंद्र सिंह धोनी एक-एक लीटर दूध पी जाते हैं, उन्होंने मीडिया के सामने भी इसे कबूल किया है. मेरे ख़याल से धोनी और सहवाग को बचपन से ही दूध पसंद है जबकि हमलोगों शुरू से ही इसे इतना पसंद नहीं करते थे. | इससे जुड़ी ख़बरें चौथे मैच के लिए तैयार अहमदाबाद11 अप्रैल, 2005 | खेल मैच के बाद कमाई भी गई गांगुली की10 अप्रैल, 2005 | खेल अगरकर को मिली बालाजी की जगह06 अप्रैल, 2005 | खेल भारत ने मैच जीता 58 रन से05 अप्रैल, 2005 | खेल धोनी ने पारी माता-पिता के नाम की05 अप्रैल, 2005 | खेल गोलकीपर से विकेटकीपर तक 05 अप्रैल, 2005 | खेल सहवाग, द्रविड़ और सचिन ने जीत दिलाई02 अप्रैल, 2005 | खेल | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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