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शुक्रवार, 09 जून, 2006 को 13:44 GMT तक के समाचार
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इस दर्द की दवा है क्या?

भारत
क्या भारतीय फ़ुटबॉल प्रेमी दूसरे खिलाड़ियों के पोस्टर ही लगाते रहेंगे?

विश्व कप फ़ुटबॉल में भले ही भारत हिस्सा नहीं ले रहा है. लेकिन यहाँ के लोगों में इस प्रतियोगिता का जुनून कम नहीं. देश के कई हिस्से में जाने-माने खिलाड़ियों के पोस्टर लहरा रहे हैं, तो टेलीविज़न पर भी विश्व कप मुक़ाबले का बेसब्री से इंतज़ार हो रहा है.

लेकिन क्या भारतीय टीम भी कभी विश्व कप में उतर पाएगी- ये सवाल सभी के मन में उमड़-घुमड़ रहा है. एक अरब से ज़्यादा की आबादी वाला देश इतना पिछड़ा क्यों है.

फ़ुटबॉल विशेषज्ञ नोवी कपाड़िया कहते हैं कि देश में फ़ुटबॉल का जो स्तर है, उस हिसाब से ये बहुत कठिन लग रहा है.

नोवी कहते हैं, "मुझे तो भारतीय फ़ुटबॉल की स्थिति पर परिवार नियोजन का वो नारा याद आता है जिसमें कहा जाता था- अगला बच्चा अभी नहीं, तीन के बाद कभी नहीं. वैसे ही भारतीय फ़ुटबॉल के बारे में कहा जा सकता है- अगला विश्व कप अभी नहीं, जैसा फ़ुटबॉल चल रहा है, उस हिसाब से कभी नहीं."

दरअसल विश्व कप के आते ही भारत में फ़ुटबॉल का जुनून फैल जाता है और फिर चार साल बाद लोग फ़ुटबॉल के साथ-साथ देश के फ़ुटबॉल के बारे में भी भूल जाते हैं.

मुश्किलें

प्रबंधन के स्तर पर देखा जाए तो अखिल भारतीय फ़ुटबॉल एसोसिएशन और राज्य एसोसिएशन की भूमिका भी बहुत ही नकारात्मक रही है. देश में नियमित कैंप नहीं चलाए जाते.

 मुझे तो भारतीय फ़ुटबॉल की स्थिति पर परिवार नियोजन का वो नारा याद आता है जिसमें कहा जाता था- अगला बच्चा अभी नहीं, तीन के बाद कभी नहीं. वैसे ही भारतीय फ़ुटबॉल के बारे में कहा जा सकता है- अगला विश्व कप अभी नहीं, जैसा फ़ुटबॉल चल रहा है, उस हिसाब से कभी नहीं
नोवी कपाड़िया, फ़ुटबॉल विशेषज्ञ

नोवी कपाड़िया मानते हैं कि देश में ऐसे युवकों की कमी नहीं, जो मौक़ा मिलने पर अपनी प्रतिभा साबित कर सकते हैं. वे कहते हैं, "भारत की ख़ासियत ये है कि यहाँ की आबादी न सिर्फ़ ज़्यादा है बल्कि हर तरह की आबादी है यानी लंबे-चौड़े फ़ुर्तीले लोग भी मिल सकते हैं और दिमाग़ वाले खिलाड़ी भी मिल सकते हैं. आवश्यकता इसका लाभ उठाने की है."

वैसे फ़िलहाल भारतीय टीम की जो स्थिति है, उसमें ये अंदाज़ा लगाना काफ़ी मुश्किल है कि भारतीय टीम को विश्व कप तक पहुँचने में कितना समय लगेगा.

विश्व कप में स्थान बनाने के लिए अभी भारत को एशियाई ग्रुप में क्वालीफ़ाई करना पड़ेगा. और मुश्किल की बात ये है कि अब ऑस्ट्रेलिया भी एशियाई ग्रुप में आ गया है जिसकी टीम काफ़ी शक्तिशाली है और खिलाड़ी यूरोपीय क्लब में भी खेलते हैं.

नोवी कहते हैं कि अगर इस समय तैयारी शुरू की जाए तो कम से कम 20 साल में तो एशियन ग्रुप के फ़ाइनल क्वालीफ़ाइंग राउंड में भारत पहुँच सकता है. इसलिए रास्त काफ़ी कठिन है.

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