|
ज़िम्बाब्वे क्रिकेट पर संकट के बादल | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ज़िम्बाब्वे में सरकार ने क्रिकेट बोर्ड का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया है. इस कारण अब ये आशंका व्यक्त की जा रही है कि ज़िम्बाब्वे का टेस्ट दर्जा छीना जा सकता है. टीम के शीर्ष खिलाड़ी पहले ही वेतन के मामले को लेकर हड़ताल पर हैं और अब तो ये लगता है कि वे टीम से अलग भी हो सकते हैं. ज़िम्बाब्वे की सरकार ने क्रिकेट बोर्ड का नियंत्रण अपने हाथ में लेते हुए बोर्ड के विवादित चेयरमैन पीटर चिंगोका को अंतरिम बोर्ड की कमान दे दी है और माना जा रहा है कि इस बोर्ड में श्वेत और एशियाई निदेशक नहीं होंगे. खेल और मनोरंजन आयोग के चेयरमैन गिब्सन मशिनगैद्ज़े ने हरारे में इसकी घोषणा की. उन्होंने कहा, "हम टेस्ट दर्जा वापस लेने की स्थिति को लेकर तैयार है. हम एक नई शुरुआत कर रहे हैं. हमें इसकी कोई चिंता नहीं." खिलाड़ियों की स्थिति पर उन्होंने कहा कि जो यहाँ रहना चाहते हैं रह सकते हैं, लेकिन जो जाना चाहते हैं, वे जाने को स्वतंत्र हैं. वे भारत, कनाडा या कहीं भी जा सकते हैं. पूछताछ पिछले साल रिजर्व बैंक ऑफ़ ज़िम्बाब्वे ने वित्तीय घोटाले के आरोपों के बीच चिंगोका और क्रिकेट बोर्ड के प्रबंध निदेशक ओसियस ब्यूते से पूछताछ की थी. ब्यूते को भी अंतरिम बोर्ड में पद मिला है. क्रिकेट बोर्ड में चिंगोका की मौजूदगी ही खिलाड़ियों के हड़ताल ख़त्म करने में सबसे बड़ी बाधा थी क्योंकि उनकी एक मांग ये भी थी कि चिंगोका को हट जाना चाहिए. खिलाड़ियों के प्रवक्ता क्लाइव फ़ील्ड ने इस पर चिंता व्यक्त की कि चिंगोका को अंतरिम बोर्ड की भी कमान दी गई है. हड़ताल पर गए एक खिलाड़ी ने कहा, "हमें इस बात पर चिंता है कि भविष्य अंधकारमय है. हम इस बात से ख़ुश नहीं है कि चिंगोका को बोर्ड की कमान दे दी गई है. अब तो जो भी खिलाड़ी बाहर खेल सकता है वह देश से चला जाएगा." फ़ील्ड ने कहा, "मेरा मानना है कि हमें दबाया जा रहा है और पहले से कहीं ज़्यादा दबाया जा रहा है. अब तो ये क्रिकेट रहा ही नहीं, अब तो बस ये लाश भर रह जाएगा." 'आर्थिक आत्महत्या' उन्होंने कहा कि अगर ये लोग अगले छह महीने में हमें क्रिकेट खेलने में मदद के लिए आ रहे हैं तो वे नहीं जानते कि वे लोग क्या करने जा रहे हैं.
फ़ील्ड ने कहा कि एक ऐसे देश के लिए क्रिकेट खेलना आर्थिक आत्महत्या है जिसका टेस्ट दर्जा ही ख़तरे में है. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने अभी तक उस दावे पर कोई कार्रवाई करने से इनकार किया है जिसमें कहा गया है कि ज़िम्बाब्वे में रंग के आधार पर टीम का चयन होता है. लेकिन जानकार इससे इनकार नहीं करते कि ज़िम्बाब्वे क्रिकेट बोर्ड की मौजूदा स्थिति और क्रिकेट पर मँडरा रहे संकट के मद्देनज़र आईसीसी क़दम उठा सकता है. अगले सप्ताह कराची में आईसीसी की होने वाली बैठक में इस पर विचार-विमर्श हो सकता है. पिछले साल नवंबर में तटेंडा टाएबू ने ज़िम्बाब्वे की कप्तानी छोड़ दी थी और दावा किया था कि उन्हें फ़ोन पर धमकियाँ मिल रही हैं. उसी समय से अन्य शीर्ष खिलाड़ी भी हड़ताल पर हैं. क्योंकि भारत और न्यूज़ीलैंड दौरे के लिए उन्हें पैसे नहीं दिए गए. | इससे जुड़ी ख़बरें | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||