ओलंपिकः मेडल लाने में ग़रीब क्यों है भारत

दीपा करमाकर

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इमेज कैप्शन, दीपा करमाकर पहली महिला जिम्नास्ट हैं जिन्होंने ओलंपिक खेलों के लिए क्वालीफ़ाई किया है.

भारतीय धाविका द्युति चंद का कहना है, "दौड़ में हम कभी भी मेडल नहीं जीत पाए, लेकिन ईश्वर की कृपा से मैं फ़ाइनल में पहुंच जाउंगी और मेडल जीतूंगी."

अगर प्रति खिलाड़ी मेडल की बात की जाए तो आबादी के लिहाज से दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश का ओलंपिक रिकॉर्ड बहुत ख़राब है.

पिछले तीन दशकों में भारत ने केवल एक स्वर्ण पदक जीता वो भी 2008 में 10 मीटर राइफ़ल प्रतियोगिता में.

लंदन में 2012 में भारतीय टीम ने अपना बेहतरीन प्रदर्शन किया और छह मेडल हासिल किए. यानी 20 करोड़ आबादी पर एक मेडल.

साल 2008 में भारत ने तीन मेडल जीते. इससे पहले भारतीय टीम सिर्फ एक मेडल के साथ लौटी थी.

ग्रेनाडा और जमैका जैसे छोटे देशों से भारत की तुलना करें, जो कि नियमित रूप से कुछ लाख आबादी पर एक मेडल लाते रहते हैं.

तो क्यों भारत ऐसा नहीं कर पाता है? इसका एक कारण बेशक पैसा है.

द्युति चांद

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इमेज कैप्शन, द्युति चांद पिछले 36 सालों में पहली भारतीय महिला धाविका होंगी जो ओलंपिक में 100 मीटर दौड़ में भाग लेंगी.

अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों और अरबपतियों की बढ़ती संख्या के बावजूद भारत प्रति व्यक्ति आय के मामले में अभी भी बहुत ग़रीब देश है.

भारत के महान विंटर ओलंपियन शिवा केशवन का कहना है कि सरकार की वरीयता में स्पोर्ट्स कभी नहीं रहा.

सुपर फ़ास्ट स्लेज के खेल लज़ के वो खिलाड़ी हैं. पिछले पांच विंटर खेलों में, वो एकमात्र भारतीय थे जिन्होंने क्वालीफ़ाई किया. वो अपनी टीम के अकेले सदस्य थे. हालांकि सोची जाने के लिए टिकट का इंतज़ाम सरकार ने बल्कि लोगों से चंदा लेकर किया गया.

चूंकि सरकार या अन्य किसी एजेंसी से फंडिंग का कोई इंतज़ाम नहीं है. लज़ के लिए भारत में कोई सुविधा ही नहीं है.

इसलिए उन्होंने अपनी स्लेज की तली में पहिया फिट किया और हिमालयी सड़कों पर कारों और ट्रकों को पीछे छोड़ते हुए 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार हासिल की.

केशवन कहते हैं, "एक समय तो मैं अपने करियर को आगे नहीं जारी रख सकता था. मैं ट्रेनिंग के लिए नहीं जा सका. मैं प्रतियोगिताओं में नहीं जा सका क्योंकि मेरे पास पैसे नहीं थे."

वो आगे बताते हैं, "इसलिए मैंने प्रायोजकों को तलाशने का निर्णय लिया. और 100 कंपनियों के पास गया, इनमें से एक की ओर से सकारात्मक जवाब मिला. "

वो मानते हैं कि संसाधनों की भारी किल्लत ने उनके प्रदर्शन को प्रभावित किया है और ये उनके साथ ही नहीं बल्कि अन्य भारतीय एथलीटों के साथ हुआ है.

वो कहते हैं. "मैं समझता हूं खेल में टिके रहने के लिए हमारे पास आज के समय के हिसाब से एथलीटों के चुनावों के लिए एक सही तंत्र और ट्रेनिंग होना चाहिए."

नारायना रामचंद्रन

भारतीय ओलंपिक संघ का मानना है कि देश ने अपने खिलाड़ियों की पर्याप्त मदद नहीं की. लेकिन संघ का कहना है कि भारत के बुरे प्रदर्शन के लिए पैसे या संगठन से ज़्यादा बड़े कारण हैं.

संघ के अध्यक्ष नरायण रामचंद्रन कहते हैं कि स्पोर्ट्स शायद ही किसी के एजेंडे में सबसे ऊपर हो, ये बात एथलीट और उनके परिवारों पर लागू होती है.

वो कहते हैं, "शिक्षा के मुक़ाबले स्पोर्ट हमेशा वरीयता में दूसरे नंबर पर रहता है."

रामचंद्रन का कहना है कि अधिकांश भारतीय परिवार अपने बच्चों को ओलंपियन की बजाय डेंटिस्ट या अकाउंटेंट बनाना ज्यादा पसंद करते हैं.

सिंगापुर यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर रॉनोजोय सेन कहते हैं कि भारत की सांस्कृतिक और जाति व्यवस्था की भी इसमें भूमिका है.

उन्होंने भारत में खेलों के इतिहास पर किताब लिखी है और मानते हैं कि देश के ख़राब ओलंपिक रिकॉर्ड के बहुत गहरे कारण हैं.

वो कहते हैं, कि परम्परागत रूप से भारतीय खुद एक व्यक्ति की बजाय सबसे पहले अपनी जाति, अपने कबीले या अपने इलाक़े से जोड़कर देखते हैं.

भारतीय टीम

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यहां तक कि जब लोग खेल में आगे बढ़ते हैं तो आम तौर पर अपने परिवारों और व्यापक समुदाय की ओर से शीर्ष पर पहुंचने में हतोत्साहित किए जाते हैं.

और जातिगत भेदभाव का मतलब होता है कि अलग अलग जाति के लोग एक साथ नहीं खेलें.

प्रोफ़ेसर सेन के मुताबिक़, "भारत की आबादी में निचली जातियों की संख्या खासी है और इनकी शिक्षा, अच्छा पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच नहीं है."

वो कहते हैं, "इसका मतलब है कि भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा स्पोर्ट में हिस्सा नहीं ले पाता है और ना ही खेल सुविधाओं तक उनकी पहुंच होती है."

केवल एक खेल है जिसमें भारत अपना दम दिखाता है, वो है क्रिकेट. पेशवर टीमें इसमें अकूत धन लगा सकती हैं, जिससे बेहतरीन एथलीट क्रिकेट की ओर चले जाते हैं, इससे अन्य खेल उपेक्षित रह जाते हैं.

हालांकि अब निजी कंपनियां ओलंपिक खेलों में फंडिंग के लिए आगे आ रही हैं.

ये ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे उन देशों के उदाहरण अपना रही हैं, जो बेहतरीन चुनाव और ट्रेनिंग प्रोग्रामों में निवेश के मार्फत नाटकीय तरीक़े से पदकों की संख्या बढ़ाने में सफल रहे हैं.

एक अनुमान के मुताबिक़, 2012 में ब्रिटेन जो पदक जीते, उनमें हरेक मेडल क़रीब 45 करोड़ रुपये का बैठा.

द्युति चांद समेत कई एथलीटों को फंड करने वाली कंपनी एंग्लियन मेडल हंट के मनीष बहुगुणा का मानना है कि आने वाले समय में इन कोशिशों का असर दिखेगा.

बहुगुणा का कहना है, "हम इन एथलीटों के बेहतरीन अभ्यास और ओलंपिक गेम्स के प्रदर्शन के बीच की खाई को भरने की कोशिश कर रहे हैं."

वो कहते हैं, "हम उनकी शारीरिक, मानसिक और कंडीशनिंग में सुधार लाने में मदद करते हैं."

भारत इस बार रियो में अपनी बेहतरीन ट्रेनिंग पाए खिलाड़ियों की अबतक की सबसे बड़ी टीम भेज रहा है.

और उम्मीद कर रहा है कि देश की विशाल आबादी की उम्मीदों पर वो खरा उतरे.

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