कोच नया, मर्ज़ पुराना, कैसे संभले हॉकी

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- Author, आदेश कुमार गुप्त
- पदनाम, खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
पिछले दिनों भारतीय हॉकी टीम के कोच नीदरलैंड्स के पॉल फ़ान एस ने यह कहकर सनसनी फैला दी कि हॉकी इंडिया ने उन्हें उनके पद से हटा दिया है.
इसके बाद घटनाचक्र तेज़ी से बदला और हॉकी इंडिया ने अब नीदरलैंड्स के ही रोलेंट ओल्टमंस को भारतीय टीम का कोच बना दिया है. इससे पहले ओल्टमंस हॉकी इंडिया में बतौर हाई परफॉरमेंस डायरेक्टर तैनात थे.
इससे यह तो साफ़ हो गया है कि भारतीय हॉकी टीम का कोच देसी नहीं विदेशी ही होगा. अब सबसे बड़ा सवाल कि रियो ओलंपिक की तैयारियों में जुटी भारतीय टीम के पदक जीतने की कितनी संभावनाए हैं और उसका मनोबल कैसा है?
उल्लेखनीय है कि रियो ओलंपिक खेलों का आयोजन 5 से 12 अगस्त 2016 तक किया जाएगा.
इससे पहले भारतीय टीम पिछले 2012 लंदन ओलंपिक में 12वें और आख़िरी पायदान पर रही थी.
रणनीति

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इस पूरे मुद्दे को लेकर पूर्व ओलंपियन अशोक कुमार कहते हैं कि भारत सरकार, स्पोर्टस अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के अलावा हॉकी इंडिया हर तरह से भारतीय खिलाड़ियों की मदद कर रही है. ऐसे में कोच का हटाया जाना टीम के हित में नही है. पिछले कुछ सालों में नीदरलैंडस, जर्मनी, स्पेन और ऑस्ट्रेलिया से कोच आए हैं.
उनका मानना है कि यह अंहकार की लड़ाई है. हर साल कोच बदलने से टीम जीतना शुरू नहीं कर देगी. कोच ऐसा हो जिस पर खिलाड़ी भरोसा कर सकें. अब इस घटना से भारतीय खिलाड़ियों का मनोबल गिरेगा.
दूसरी तरफ़ पिछले दिनों उस नौ सदस्यीय समिति के अध्यक्ष जिसने पॉल फ़ान एस को हटाकर रोलेंट ओल्टमंस को कोच बनाने की सिफ़ारिश की और पूर्व ओलंपियन हरबिंदर सिंह का कहना है कि पिछले दिनों यह देखने में आया कि कमज़ोर टीमों के ख़िलाफ़ हमारी जीत का अंतर बहुत कम था जबकि मज़बूत टीमों के ख़िलाफ़ हार का अंतर बेहद अधिक था.
अब जबकि रियो ओलंपिक में केवल एक साल बचा है तो टीम क्या करे इन सभी बातों पर समिति ने अपनी रिपोर्ट हॉकी इंडिया को दे दी है जिस वह विचार करेगी.
हरबिंदर सिंह ने आगे कहा कि टीम के मनोबल पर कोई असर नहीं पड़ेगा. खिलाड़ियों से बातचीत के बाद पाया गया कि वह उनकी रणनीति के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पा रहे थे.
तालमेल

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भारत के एक और पूर्व ओलंपियन और दो बार भारत को एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक जीता चुके एम के कौशिक कहते हैं कि विदेशी कोच का काम पैसा कमाना है. वे सब अपना पद छोड़ने के बाद ही रोते हैं, काम करते समय क्यों नहीं.
दरअसल आज हॉकी इंडिया को लगता है कि वर्तमान हॉकी में विदेशी कोच की मदद से ही टीम का स्तर ऊंचा किया जा सकता है इसिलिए पिछले कुछ समय में विदेशी कोच आए.
वैसे वे भी मानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आठवें पायदान पर मौजूद भारतीय टीम के लिए रियो में पदक जीतना आसान नहीं है. काउंटर अटैक पर खिलाड़ियों का गेंद को अपने क़ब्ज़े में लेकर आगे बढ़ना, पेनाल्टी कॉर्नर को गोल में बदलना और विरोधी टीमों को अधिक पेनाल्टी कॉर्नर ना देना जैसी बुनियादी बातों पर अधिक ध्यान देने की ज़रूरत है.
वैसे यह मर्ज़ तो पुराना है, कोच भले ही नया हो. फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि पिछले कुछ सालों से टीम के साथ हाई परफॉरमेंस डायरेक्टर के रूप में साथ रहे ओल्टमंस को सभी खिलाड़ी जानते हैं, उनसे तालमेल बन जाएगा. इसके बावजूद रातों-रात भारतीय हॉकी की क़िस्मत बदल जाएगी मुश्किल ही लगता है.
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