दक्षिण भारत के तीन राज्यों में सरकारों और राज्यपालों के बीच तकरार से क्या संकेत मिले?

कर्नाटक विधानसभा की फ़ाइल फ़ोटो

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इमेज कैप्शन, पिछले हफ़्ते कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने विधानसभा के संयुक्त सत्र में अपना अभिभाषण बीच में ही रोक दिया था (फ़ाइल फ़ोटो)
    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

पिछले हफ़्ते कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने तमिलनाडु और केरल के अपने समकक्षों की तरह विधानसभा के संयुक्त सत्र में अपना अभिभाषण बीच में ही रोक दिया. इस घटना ने राजनीतिक और संविधान विशेषज्ञों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि कहीं यह कोई नया 'पैटर्न' तो नहीं बन रहा.

गहलोत का यह कदम कई लोगों के लिए चौंकाने वाला था, क्योंकि जब पश्चिम बंगाल के तत्कालीन राज्यपाल जगदीप धनखड़ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोल रहे थे और तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के साथ विधायी बिलों को लेकर टकराव की स्थिति में थे, तब उन्होंने संयम बनाए रखा था.

लेकिन पिछले हफ़्ते महज़ तीन दिनों के भीतर दक्षिण भारत के तीन राज्यों के राज्यपालों ने लगभग एक जैसा रुख़ अपनाया. गहलोत ने रवि की राह पकड़ते हुए मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित परंपरागत अभिभाषण पढ़ने से इनकार कर दिया और जब तक हैरान-परेशान अधिकारी राष्ट्रीय गान बजवाने का संकेत देते, वह बाहर निकल गए.

केरल के राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर ने तो इससे भी आगे बढ़कर अभिभाषण के कुछ पैराग्राफ़ अपनी ओर से बदल दिए. इसके चलते मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए विधानसभा के रिकॉर्ड में दर्ज कराने के लिए वे हिस्से खुद पढ़े जिन्हें राज्य मंत्रिमंडल ने विशेष रूप से मंज़ूरी दी थी. बीते रविवार को यह टकराव और गहरा गया.

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वहीं तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने माइक बंद होने जैसे दर्जन भर कारण गिनाए. इस तरह रवि तीन साल में तीसरी बार विधानसभा से अभिभाषण अधूरा छोड़कर चले गए.

उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्र गान न बजाकर उसका अपमान किया गया है, जबकि सरकार का कहना था कि परंपरा के अनुसार पहले राज्य गान बजाया जाता है.

मुद्दा क्या है?

डीएमके शासित तमिलनाडु सरकार, वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ़) की अगुवाई वाली केरल सरकार और कर्नाटक की कांग्रेस सरकार मनरेगा को हटाने के खिलाफ लगातार आंदोलन कर रही हैं

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इमेज कैप्शन, डीएमके शासित तमिलनाडु सरकार, एलडीएफ़ की अगुवाई वाली केरल सरकार और कर्नाटक की कांग्रेस सरकार मनरेगा को हटाने के खिलाफ लगातार आंदोलन कर रही हैं (फ़ाइल फ़ोटो)

गहलोत और अर्लेकर दोनों ने राज्य सरकारों द्वारा केंद्र सरकार की आलोचना किए जाने पर आपत्ति जताई थी.

इनमें केंद्रीय निधियों के बंटवारे में कटौती और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को बदलकर 'विकसित भारत गारंटी फ़ॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)' (वीबी- जीराम जी) अधिनियम लागू करने जैसे मुद्दे शामिल थे.

डीएमके शासित तमिलनाडु सरकार, एलडीएफ़ की अगुवाई वाली केरल सरकार और कर्नाटक की कांग्रेस सरकार मनरेगा को हटाने के खिलाफ लगातार आंदोलन कर रही हैं.

इन तीनों राज्यों को न सिर्फ़ रोज़गार योजना की मूल संरचना में बदलाव पर आपत्ति है, बल्कि इस बदलाव से राज्य सरकारों पर पड़ने वाले अतिरिक्त आर्थिक बोझ पर भी एतराज़ है.

लोकसभा के पूर्व महासचिव का पीडीटी आचारी का कोट

संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचारी ने बीबीसी हिंदी से कहा, "यह एक पैटर्न बनता जा रहा है. संविधान राज्यपाल को मंत्रिमंडल से अनुमोदित अभिभाषण पढ़ने से इनकार करने की अनुमति नहीं देता. भले ही उसमें केंद्र सरकार की आलोचना हो. राज्यपाल आपत्ति नहीं कर सकते क्योंकि जनता के प्रति जवाबदेह राज्य सरकार होती है."

वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार आनंद सहाय ने कहा, "तमिलनाडु और केरल (जब आरिफ़ मोहम्मद ख़ान राज्यपाल थे तब भी) 'आदतन अपराधी' बन गए हैं. केंद्र सरकार राज्यपालों का इस्तेमाल विधायी बिलों को रोकने और राज्य सरकार की नीतियों पर आधारित भाषणों को रोकने के लिए कर रही है. मेरा अंदाज़ा है कि उन्हें केंद्र से निर्देश मिल रहे हैं."

केंद्र सरकार की आलोचना

थावरचंद गहलोत

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इमेज कैप्शन, थावरचंद गहलोत का अभिभाषण छोड़कर जाना कई लोगों के लिए चौंकाने वाला था (फ़ाइल फ़ोटो)
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तीनों राज्यपालों ने साफ़ शब्दों में राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों से कहा कि वे उन्हें केंद्र सरकार की आलोचना करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते.

कर्नाटक के राज्यपाल गहलोत ने अपने भाषण से 11 पैराग्राफ़ हटाने की मांग की थी. उनके केरल समकक्ष ने भी कुछ हिस्सों को हटाने या बदलने की बात कही. लेकिन दोनों राज्य सरकारों ने इनकार कर दिया था.

राज्यपाल अर्लेकर ने आगे बढ़कर अभिभाषण में बदलाव कर दिए और कुछ पैराग्राफ़ में अपनी ओर से संशोधित संस्करण पढ़ दिया.

रविवार शाम उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष एएम शमशीर को पत्र लिखकर कहा कि वे 'उनके भाषण, मुख्यमंत्री के वक्तव्य और उसके अनुमोदन से जुड़ी कार्यवाही का वीडियो फुटेज साझा करें'.

लोक भवन के एक प्रवक्ता ने बीबीसी हिंदी को बताया कि सोमवार शाम तक अध्यक्ष के कार्यालय की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया था.

संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि राज्यपाल को सरकार को सुझाव देने का अधिकार है कि भाषा बदली जाए. कर्नाटक के विधि विभाग ने दो पैराग्राफ़ की भाषा बदली भी थी. लेकिन पूरे पैराग्राफ़ हटाने की मांग को दोनों राज्य सरकारों ने सिरे से खारिज कर दिया.

इसके लिए राज्यों ने संविधान के अनुच्छेद 176(1) का हवाला दिया.

पीडीटी आचारी ने कहा, "अगर सरकार राज्यपाल के सुझाव से सहमत नहीं होती तो राज्यपाल के पास कोई विकल्प नहीं बचता, उन्हें भाषण पढ़ना ही पड़ता है. इसका और कोई समाधान नहीं है."

राज्यपाल की शक्तियां

कर्नाटक का राजभवन

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इमेज कैप्शन, कर्नाटक का राजभवन

प्रोफ़ेसर अरुण थिरुवेंगदम बेंगलुरु स्थित नेशनल लॉ स्कूल (एनएलएस) में संवैधानिक कानून पढ़ाते और उस पर शोध करते हैं.

वह कहते हैं, "कर्नाटक के राज्यपाल के प्रस्तावित अभिभाषण में 11 पैराग्राफ़ नीति संबंधी मुद्दों पर थे. संविधान के अनुच्छेद 176(1) में कहा गया है कि राज्यपाल 'विधानमंडल को उसे बुलाए जाने के कारणों की जानकारी देंगे.' संविधान ने राज्यपालों को पर्याप्त शक्तियां दी हैं, जिनमें से कुछ का प्रयोग वे अपने विवेक से कर सकते हैं."

"लेकिन संसदीय परंपराएं और अदालतों के फ़ैसले यह स्पष्ट करते हैं कि इन विशेष शक्तियों का प्रयोग केवल मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही किया जा सकता है."

कर्नाटक के पूर्व महाधिवक्ता अशोक हरनाहल्ली कहते हैं, "राज्यपालों के विवेकाधिकार केवल कुछ मामलों तक सीमित हैं, जैसे कि विधायी बिलों को मंज़ूरी देना, रोकना या राष्ट्रपति को भेजना, मुख्यमंत्री की नियुक्ति, सरकार को बर्खास्त करना, राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश करना और विधानसभा भंग करना. बाकी सभी मामलों में राज्यपाल केवल औपचारिक प्रमुख होते हैं."

प्रोफ़ेसर थिरुवेंगदम ने शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य के फ़ैसले का हवाला देते हुए बताया कि राज्यपाल या राष्ट्रपति क्या कर सकते हैं और क्या नहीं.

वह कहते हैं, "जहां भी संविधान कहता है कि किसी शक्ति या कार्य के प्रयोग के लिए राष्ट्रपति या राज्यपाल की संतुष्टि आवश्यक है, तो वह उनकी निजी राय या व्यक्तिगत निर्णय नहीं होता, बल्कि यह उस मंत्रिपरिषद की सामूहिक संतुष्टि होती है, जिसके सहयोग और सलाह पर राष्ट्रपति या राज्यपाल अपने सभी अधिकारों और कार्यों का प्रयोग करते हैं."

क्या राज्यपाल की भूमिका का राजनीतीकरण हो रहा है?

केरल की वामपंथी सरकार के साथ राजभवन का टकराव आरिफ़ मोहम्मद ख़ान के समय में भी चर्चाओं में रहा था (फ़ाइल फ़ोटो)

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इमेज कैप्शन, केरल की वामपंथी सरकार के साथ राजभवन का टकराव आरिफ़ मोहम्मद ख़ान के समय में भी चर्चाओं में रहा था (फ़ाइल फ़ोटो)

राजनीतिक और संविधान विशेषज्ञों का सर्वसम्मति से मानना है कि राज्यपाल का पद लंबे समय से राजनीतीकरण का शिकार रहा है, चाहे वह इंदिरा गांधी के दौर में हो या साल 2014 के बाद.

अशोक का मानना है कि चूंकि कर्नाटक विधानसभा में मनरेगा को बदलने पर चर्चा तय थी, इसलिए राज्यपाल के अभिभाषण में इस मुद्दे पर सरकार का पक्ष शामिल करने की कोई ज़रूरत नहीं थी.

उन्होंने कहा, "राज्यपाल केंद्र सरकार की आलोचना वाले हिस्से पढ़ने से बच सकते थे, क्योंकि वे किसी भी हालत में विधानसभा के रिकॉर्ड में दर्ज हो जाते. राज्य सरकार केंद्र की नीतियों की आलोचना राज्यपाल के माध्यम से कर सकती है या नहीं, इसका फ़ैसला तो अदालत ही कर सकती है."

कर्नाटक के पूर्व महाधिवक्ता अशोक हरनाहल्ली भी कहते हैं कि इंदिरा गांधी के समय की तरह "आज भी राजनीतिक कारणों से ही फैसले होते हैं. कभी-कभी गृह मंत्रालय के निर्देशों के आधार पर भी कुछ कदम उठाए जाते हैं."

पूर्व आईएएस अधिकारी रंगराजन आर भी अशोक हरनाहल्ली की राय से सहमति जताते हैं.

वह कहते हैं, "राज्यपाल के पद का राजनीतीकरण बहुत पहले शुरू हो गया था और आज भी जारी है. यह एक व्यवस्थागत समस्या है जो कई दशकों से चली आ रही है. अब हस्तक्षेप की मात्रा और भी बढ़ गई है, और ऐसा तब होता है जब केंद्र में मज़बूत सरकार हो."

क्या यह संवैधानिक संकट की ओर बढ़ रहा है?

नरेंद्र मोदी, राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर, विजयन

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इमेज कैप्शन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 23 जनवरी को तिरुवनंतपुरम में तीन नई अमृत भारत ट्रेनों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया. इस मौके पर केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर, राज्य के मुख्यमंत्री विजयन भी मौजूद थे

पिछले कुछ समय में बार-बार उठ रहे इन मुद्दों का कोई 'समाधान' प्रोफ़ेसर थिरुवेंगदम को नज़र नहीं आता.

वह कहते हैं, "हम बेहद तनावपूर्ण और ध्रुवीकृत समय में जी रहे हैं. सभी स्तरों पर सरकारें और सत्ता के केंद्र 'या तो हमारे साथ हो या हमारे खिलाफ़' वाला रवैया अपनाए हुए हैं. यह माहौल किसी रचनात्मक संवाद के लिए अनुकूल नहीं है."

"सत्ता में बैठे लोग सुनने औेर सभी हितधारकों को शामिल करने जैसे संवैधानिक मूल्यों के प्रति दिल-दिमाग खुला नहीं रखते. ऐसे वातावरण में समाधान नहीं निकल सकते. मुझे डर है कि हम शक्ति के कठोर प्रयोग को तब तक देखते रहेंगे जब तक सभी सत्ता केंद्र और नागरिक यह न समझ लें कि इस तरीके से कुछ हासिल नहीं होना."

सहाय कहते हैं, "राज्यों और केंद्र के बीच खुला वैचारिक युद्ध चल रहा है. और राज्यपाल महज़ 'रबर स्टैम्प' की भूमिका निभा रहे हैं."

नाम न बताने की शर्त पर एक वकील ने कहा, "जंगल में जब बड़े जानवर लड़ते हैं तो छोटे जानवरों को दिक्कत होती है क्योंकि आम आदमी की तरह वे भी इस टकराव में फंस जाते हैं."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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