केरल में एसआईआर: धार्मिक संगठनों ने बीएलओ के लिए खोले अपने दरवाज़े, सियासी दल भी सक्रिय

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
केरल की कहानी कई मायनों में अलग है. राष्ट्रीय स्तर पर भले ही कांग्रेस और वाम दल मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का विरोध कर रहे हों लेकिन केरल में, दोनों पार्टियों ने बिल्कुल उल्टा रुख़ अपनाया है.
ये दोनों दो अलग-अलग गठबंधनों का नेतृत्व करते हैं- कांग्रेस की अगुवाई वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट (यूडीएफ़) और लेफ़्ट डेमोक्रेटिक फ़्रंट (एलडीएफ़).
दोनों गठबंधन सड़कों से चुनावी मैदान तक जमकर भिड़ते रहे हैं. लेकिन जब बात एसआईआर की आई, तो दोनों पार्टियों ने बिहार विधानसभा चुनाव को देखते हुए इसे अलग नज़रिए से परखा है.
दोनों गठबंधनों ने अलग-अलग फ़ैसले लेकर एसआईआर को अपनाया है.
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ज़मीनी स्तर पर, दोनों पार्टियों ने अपने बूथ लेवल असिस्टेंट्स (बीएलए) को बूथ लेवल ऑफ़िसर्स (बीएलओ) की मदद के लिए उतार दिया, ताकि लोग अपने वोटर होने का सबूत दे सकें.
इस क़दम ने बीएलओ और वोटरों दोनों को काफ़ी तनाव में डाल दिया, कुछ को तो उम्मीद से ज़्यादा.
'कोई वोटर बाहर न हो जाए'

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इस बीच, राजनीतिक पार्टियां यह सुनिश्चित करने में लगी हैं कि कोई भी वोटर तकनीकी वजहों से वोटर लिस्ट से बाहर न हो जाए क्योंकि बिहार में भी वोटर लिस्ट से नाम कटने के कुछ मामले देखे गए थे.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला ने बीबीसी हिंदी से कहा, "अगर कुछ ग़लत हुआ तो हम विरोध करेंगे. वह अल्पसंख्यकों या दूसरों के वोट हटाने की हिम्मत नहीं करेंगे. हम इसके ख़िलाफ़ लड़ेंगे."
सीपीएम के पूर्व वित्त मंत्री प्रोफ़ेसर थॉमस इसाक ने बीबीसी हिंदी को कहा, "एसआईआर का मक़सद उन लोगों को वोटर लिस्ट से हटाना है जिन्हें बीजेपी भरोसेमंद नहीं मानती और नए वोटर जोड़ना है."
लेकिन बीजेपी का नज़रिया अलग है. पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता वी मुरलीधरन ने बीबीसी न्यूज़ हिंदी से कहा, "केरल की स्थिति में एसआईआर का ख़ास अर्थ है. मौजूदा वोटर लिस्ट का फ़ायदा सीपीएम को मिल रहा है क्योंकि उन्होंने बहुत सारे फ़र्ज़ी वोटर जोड़ रखे हैं."
इस राजनीतिक लड़ाई के बीच वोटर यह साबित करने के लिए स्थानीय दफ़्तरों और बीएलओ के पास भाग-दौड़ कर रहे हैं कि उनके बूढ़े माता-पिता या भाई-बहनों ने 2002 में वोट डाला था. तब राज्य में आख़िरी बार एसआईआर हुआ था.
वोटर की परेशानी

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लुइस करिप्पेल ज़ेवियर एक रिटायर्ड बैंक मैनेजर हैं. उन्होंने कोच्चि के थोप्पिल कक्कनाड में मैरी क्वीन चर्च के पैरिश हॉल में बीबीसी न्यूज़ हिंदी से कहा, "पढ़ा-लिखा होने के बावजूद यह प्रक्रिया बहुत झंझट वाली है. मेरे माता-पिता का 25 साल पहले निधन हो गया था. वे 2002 की लिस्ट में नहीं थे. मेरे बड़े भाई की भी मृत्यु हो गई है."
ज़ेवियर का फ़ॉर्म तो बीएलओ ने जमा कर लिया है, लेकिन उन्हें यकीन नहीं है कि यह आख़िरकार उस ड्राफ्ट लिस्ट में शामिल होगा जो बाद में प्रकाशित होगी.
उसी पैरिश हॉल में, थॉमस वर्गीज़ की अलग समस्या है. परेशान वर्गीज़ कहते हैं, "हमें याद नहीं कि 2002 में हमने कहां वोट डाला था और किस बूथ पर. हमने कई चुनावों में वोट दिया है- 15 या 20 चुनावों में. हमारे पास वोटर आईडी कार्ड है, लेकिन यहां बूथ नंबर मैच नहीं कर रहा. यह मेरी दूसरी विज़िट है."
कुछ किलोमीटर दूर, एक रिटायर्ड टीचर गीता जोसेफ़ और बीएलओ नीनू पीएन यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि वोटरों की समस्या को कैसे हल किया जाए.
गीता जोसेफ़ ने बीबीसी हिंदी से कहा, "1968 में मेरी शादी हुई और मैं गुजरात चली गई. मेरे पति वहां फ़िशरीज़ डिपार्टमेंट में सुपरिंटेंडेंट थे. 2007 में मैं अपने शहर लौटी. मेरे पास कोई सबूत नहीं है. मेरे भाई भी विदेश में काम कर रहे थे. एक भाई यहां है. मुझे नहीं पता कि उसने 2002 में वोट दिया था या नहीं."
बीएलओ की जद्दोजहद

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नीनू बताती हैं कि गीता जोसेफ़ की समस्या अनोखी नहीं है. वह कहती हैं, "इस बूथ के 1428 वोटरों में से ज़्यादातर को यह फ़ॉर्म भरना नहीं आता. जब हम जानकारी को डिजिटाइज़ करना शुरू करते हैं, तो फ़ॉर्म रिजेक्ट हो जाते हैं. फिर हमें वोटरों से दोबारा संपर्क करना पड़ता है."
लेकिन परेशानी यहीं ख़त्म नहीं होती. नीनू बताती हैं, "ज़्यादातर लोग फ़ॉर्म वापस करने के लिए तैयार नहीं हैं. ख़ासकर अपार्टमेंट में रहने वाले 25% लोगों ने फ़ॉर्म नहीं भरा है. क़रीब 400 लोगों ने फ़ॉर्म वापस नहीं किया. वे उम्मीद करते हैं कि हम जाकर उनसे फ़ॉर्म ले आएं."
नीनू का अनुभव अनिल कुमार से अलग नहीं है, जो बीएलओ के एक ग्रुप के साथ राज्य की राजधानी तिरुवनंतपुरम के जवाहर नगर में एक स्कूल में काम कर रहे हैं.
वह बताते हैं, "शुरुआत में कई लोग दरवाज़ा तक नहीं खोलते थे. बस कहते थे कि फ़ॉर्म बाहर रख दो और चले जाओ. जब हम फ़ॉर्म लेने जाते थे, तो कोई जवाब नहीं मिलता था."
अनिल कुमार और उनके साथी सैयद अली और शाजी लाल उन टेबल-कुर्सियों पर बैठते हैं जो नर्सरी के बच्चों के लिए होती हैं.
शाजी लाल ने कहा, "जब तक हम वोटरों से बात करके, उनकी समस्याएं सुलझाकर निपटते हैं, तब हमारे लिए उठना भी मुश्किल हो जाता है. लेकिन इस बारे में हम कुछ कर नहीं सकते."
सैयद अली ने बीबीसी न्यूज़ हिंदी को बताया, "मैं सुबह 5 बजे से फ़ॉर्म अपलोड करना शुरू करता हूं, फिर यहां आकर वोटरों से मिलता हूं और फ़ॉर्म भरने में उनकी दिक्कतें सुलझाता हूं. शाम 6 बजे के बाद हम लोगों से फ़ॉर्म लेने निकलते हैं. घर पहुंचते-पहुंचते देर हो जाती है. फिर मैं कुछ पेपर छांटता हूं और रात 11-11:30 बजे तक फ़ॉर्म डिजिटाइज़ करने की कोशिश करता हूं."
लेकिन जब एक सॉफ़्टवेयर इंजीनियर एंथनी ने फ़ॉर्म भरने में काफ़ी समय लगाने के बाद कहा, "इनकी मदद के बिना मैं ये फ़ॉर्म नहीं भर पाता," तो अनिल कुमार, शाजी लाल और सैयद अली ख़ुश हो गए.

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उल्लेखनीय पहलू
केरल में एसआईआर का सबसे दिलचस्प पहलू धार्मिक अल्पसंख्यकों का रवैया है, जिनका राज्य में हिस्सा क़रीब 46% है.
मैरी क्वीन चर्च के थोप्पिल कक्कनाड स्थित पैरिश हॉल में बीएलओ की मौजूदगी कोई अकेला मामला नहीं है.
राज्यभर में बड़ी संख्या में चर्चों ने सक्रिय भूमिका निभाई है और अपने परिसर में आधा दर्जन या उससे ज़्यादा बीएलओ को बैठने की सुविधा दी है ताकि वे उनके समाज की मदद कर सकें.
नवंबर के पहले हफ़्ते में, जब एसआईआर शुरू हुआ तो सिरो-मलाबार चर्च ने औपचारिक सलाह जारी कर दी थी और वह ऐसा करने वाला पहला संगठन बन गया था.
इस बयान में ख़ासतौर पर चर्च के सदस्यों से कहा गया था कि "जब बीएलओ घरों में फ़ॉर्म लेकर आएं तो सहयोग करें और सुनिश्चित करें कि फ़ॉर्म सही तरीके़ से भरे जाएं. जो लोग 2002 के बाद वोटर लिस्ट में शामिल हुए हैं, वे चुनाव आयोग द्वारा मांगे गए दस्तावेज़ तैयार रखें."

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इसके अलावा, चर्च ने अपने सदस्यों से यह भी कहा कि विदेश में काम कर रहे रिश्तेदारों को ऑनलाइन फ़ॉर्म भरने के लिए कहें.
इसी तरह, मुस्लिम समुदाय ने भी अपने संगठनों, जिन्हें महल कमेटी कहा जाता है, उसके ज़रिए बीएलओ के लिए सुविधाएं उपलब्ध करवाई हैं.
मनक्कड़ वल्लुवली मस्जिद जमात के चेयरमैन अब्दुल खादर ने बताया, "हमने अपने समुदाय के अनुभवी और रिटायर्ड सरकारी अधिकारियों को लोगों के लिए फ़ॉर्म भरने के काम में लगाया है. इन अधिकारियों ने बीएलओ से सलाह भी ली है कि फ़ॉर्म कैसे सही तरीके़ से भरें."
खादर ने बीबीसी न्यूज़ हिंदी से कहा, "केवल मुसलमान ही नहीं, बल्कि केरल के सभी लोग फ़ॉर्म भर रहे हैं. मुसलमानों को एनआरसी और सीएए का डर है, इसलिए वे फ़ॉर्म भरने में ज़्यादा सक्रिय हैं. सिर्फ़ पिछले 10 दिनों में ही हमारे मदरसे में क़रीब 1,000 लोगों को फ़ॉर्म भरने में मदद की गई है और सलाह दी गई है."
मुख्य चुनाव अधिकारी क्या कहते हैं?

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केरल के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) डॉक्टर रतन यू केलकर ने बीबीसी हिंदी से कहा, "चुनाव आयोग का निर्देश बहुत सरल है. हर योग्य वोटर को वोटर लिस्ट में शामिल करना हमारी प्राथमिकता है. हमारा काम पूरी तरह पारदर्शी रहा है. लोग हर स्तर पर शामिल हुए हैं. पहले दिन से कोई भ्रम नहीं रहा. मैंने हर हफ़्ते राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ कई बैठकें की हैं."
उन्होंने बताया कि चुनाव आयोग ने पिता, माता, बच्चों, दादा-दादी और पहली पंक्ति के रिश्तेदारों (जैसे पिता के भाई-बहन) की वंशानुक्रम मैपिंग या पारिवारिक संबंधों का मिलान करने की अनुमति दी है.
उन्होंने कहा, "अगर पहली पंक्ति के रिश्तेदारों की जानकारी नहीं है, तो अन्य विवरण बाद में मैपिंग के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं. हम देख सकते हैं कि क्या उन्हें 2002 की लिस्ट से जोड़ा जा सकता है."
डॉक्टर केलकर कहते हैं, "अगर वे 2002 की एसआईआर से लिंक नहीं हो पाए, तब भी कोई समस्या नहीं है. उनका नाम ड्राफ्ट रोल में होगा. अगर चुनाव रिटर्निंग ऑफिसर (ईआरओ) तय करता है कि पात्रता की पुष्टि करनी है, तभी उनसे केंद्र सरकार द्वारा तय किए गए 12 दस्तावेज़ों में से एक मांगा जाएगा."
उन्होंने कहा, "दो करोड़ से ज़्यादा वोटर पहले ही 2002 की लिस्ट में मिल चुके हैं. हमने 2.78 करोड़ वोटरों में से 70% से ज़्यादा को फ़िजिकली मैप किया है. विदेश में काम करने वालों से ज़बरदस्त प्रतिक्रिया मिली है. एनआरआई के लिए बना कॉल सेंटर लगातार व्यस्त रहा है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















