....लेकिन लिएंडर को भूल मत जाइए

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- Author, पंकज प्रियदर्शी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित टेनिस टूर्नामेंट हो और भारत को विभिन्न वर्गों में तीन ख़िताब मिल जाए, तो भारत में जश्न तो बनता ही है.
इस साल विंबलडन में भारत ने ख़िताब की हैट्रिक लगाई. मिक्स्ड डबल्स में लिएंडर पेस, महिला डबल्स में सानिया मिर्ज़ा और लड़कों के डबल्स में सुमित नागल.
जश्न की बात थी, जश्न मना भी. क्या नेता, क्या अभिनेता, क्या खिलाड़ी- सभी में होड़ लगी थी बधाई देने में.
लेकिन इस जश्न और बधाई देने में धीरे-धीरे दो नाम पिछड़ गए और सिर्फ़ सानिया का नाम ही छाया रहा.
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मीडिया में सानिया के इंटरव्यू ख़ूब चल रहे हैं. उनकी जीत का ढोल क़रीब एक सप्ताह बाद भी ख़ूब पीटा जा रहा है.
लेकिन ऐसा तो नहीं कि सानियामय माहौल में एक उभरते हुए खिलाड़ी और भारतीय टेनिस के एक क़द्दावर व्यक्तित्व की अनदेखी हो रही है.
जीतने के एक-दो दिन बाद ही लिएंडर पेस और सुमित नागल सुर्ख़ियों से गायब थे.
सानिया की सफलता के अपने मायने हैं, उसका महत्व है. महिला टेनिस में भी सानिया की भूमिका अतुलनीय है.
लेकिन जब बात भारतीय टेनिस की आएगी, तो लिएंडर का योगदान सबसे बड़ा है और देश के लिए खेलने का उनका ज़ज्बा अन्य किसी भी खिलाड़ी पर हमेशा से भारी रहा है.
ग्रैंड स्लैम प्रतियोगिता हो या फिर डेविस कप और एशियन गेम्स जैसी प्रतियोगिता, जहाँ देश के लिए खेलना पड़ता है, पेस ने हमेशा जी-जान से अपना सब कुछ झोंका है.
संघर्ष

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सफलता के जश्न के बीच ये बात भी नहीं भूलनी चाहिए कुछ साल पहले भारतीय टेनिस विभाजन के कगार पर था और गुटबाज़ी के कारण टेनिस गर्त की ओर जा रहा था.
लंबे समय तक भूपति के जोड़ीदार रहे लिएंडर पेस के साथ एक समय कोई भी भारतीय खिलाड़ी नहीं था.
डेविस कप में उनकी कप्तानी में खिलाड़ियों ने खेलने से इनकार कर दिया था.
विंबलडन में मैंने लिएंडर को भारतीय खिलाड़ियों के कैंप से अलग अकेले में संघर्ष करते देखा था. ये समस्या एकतरफ़ा नहीं थी.
अनदेखी की कोशिश

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लिएंडर में भी कुछ कमियाँ थी, जिसे वे खुलकर स्वीकार भी करते थे.
लेकिन सच मानिए तो इस खिलाड़ी की उपलब्धि को कम करके आँकने और उनकी अनदेखी की कोशिश लंबे समय से हुई.
लेकिन लिएंडर इसलिए भी लिएंडर हैं क्योंकि प्रोफ़ेशनल मोर्चा हो या व्यक्तिगत मोर्चा या फिर शारीरिक परेशानियों का दौर, इन सबसे पार पाते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय टेनिस का झंडा बुलंद करते रहे.
मिक्स्ड डबल्स और डबल्स में कई अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी लिएंडर के जोड़ीदार रहे हैं.
वो चाहे मार्टिना नवरातिलोवा हों या मार्टिना हिंगिस, राडेक स्टेपानेक रहे हों या फिर मार्टिन डैम- हर कोई लिएंडर की सूझ-बूझ और तालमेल का दीवाना रहा है.
16 ग्रैंड स्लैम

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आंकड़ों पर भी नज़र डालिए, तो कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. 16 ग्रैंड स्लैम ख़िताब और ओलंपिक में सिंगल्स का कांस्य पदक.
42 साल के हो चुके लिएंडर ने इस साल दो ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीते हैं. ऑस्ट्रेलियन ओपन और विंबलडन में उन्होंने मिक्स्ड डबल्स में मार्टिना के साथ जीत हासिल की है.
लिएंडर का ये रिकॉर्ड किसी भी भारतीय खिलाड़ी से बहुत आगे हैं और उनका क़द भी बहुत ऊँचा है.
विंबलडन में सानिया की जीत किसी मायने में कम नहीं. लेकिन 2003 में उनकी भी शुरुआत विंबलडन में गर्ल्स का ख़िताब जीतने से हुई थी, जिसके बाद उन्होंने ख़ूब वाहवाही लूटी थी.
लेकिन ब्वॉयज ग्रुप में डबल्स का ख़िताब जीतने वाले सुमित नागल सुर्ख़ियों से कोसो दूर हैं.
सानिया की जीत का जश्न मनाइए, लेकिन सुमित का भी उत्साह बढ़ाइए और लिएंडर को भूल मत जाइए.
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