हिजाब के साथ फुटबॉल पर रोक ख़त्म हो

इमेज स्रोत, Getty
मुस्लिम महिलाओं के हिजाब पहन कर फुटबॉल खेलने पर लगे प्रतिबंध के खिलाफ़ अब अपील की जा रही है.
फुटबॉल की नियामक संस्था फीफा ने मुस्लिम महिलाओं को हिजाब पहनकर फुटबॉल खेलने पर पाबंदी लगा रखी है.
फीफा की नियम समिति ने महिलाओं के हिजाब पहन कर सुरक्षा कारणों से, खास तौर पर गर्दन पर लगने वाली चोटों के चलते, प्रतिबंध लगा दिया था. पिछले साल यह मामला तब सुर्ख़ियों में आया था जब ओलंपिक के क्वलिफ़ाईन्ग मैच को खलेने के लिए जॉर्डन गई ईरान की महिला खिलाडियों को मैच नहीं खेलने दिया गया था.
ईरानी महिला फुटबॉल खिलाडियों ने अपने सिर पर बंधे हिजाब या स्कार्फ को उतारने से मना कर दिया था.
पर अब फीफा की नियम बनाने वाली समिति के सामने हिजाब का एक नया डिजायन पेश किया जाएगा.
इस प्रतिबंध के विरोधियों का कहना है कि इसकी वजह से हजारों महिला फुटबॉल खिलाड़ी इस खेल से वंचित रह जाती हैं.
फीफा का कहना था कि मैच के दौरान अन्य खिलाड़ियों द्वारा हिजाब पकड़ कर खींचने से हिजाब पहने वालों को घातक चोटें लग सकती हैं.
खेल समग्र बने
पर अब हिजाब के नए डिजायन में वेल्क्रो फिट किया गया है ताकि इससे फीफा की आपत्त्तियों का निदान हो सके.
मुस्लिम महिला खेल संगठन की प्रमुख रमिला अख्तर कहती हैं कि फीफा को अपने नियम इस तरह से रखने चाहिए कि इस्लामी देशों की तमाम मुस्लिम महिलाएं खेलों में अपने-अपने देशों का प्रतिनिधित्व कर सकें.
अख्तर के अनुसार "यह फुटबॉल के परिवार को बढ़ाने के लिए बहुत ज़रूरी है. फीफा कहता है कि वह दुनिया में आशा और समग्रता की प्रतिनिधित्व करता हैं, अगर यह सही है तो इस तरह के नियमों में बदलाव करना चाहिए ताकि खेल और समग्र बने सके."
मुस्लिम महिलाओं को दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेल से जोड़ने की यह मुहिम रफ़्तार पकड़ती जा रही है. इसके समर्थकों में संयुक्त राष्ट्र भी है. दुनिया भर के फुटबॉल खिलाड़ियों के संघ एफआईएफपीआरओ ने भी महिलाओं को हिजाब के साथ खेलने देने की अनुमति देने की मांग का समर्थन किया है.
फीफा के उपाध्यक्ष जॉर्डन के शहजादे अली भी इस मांग के समर्थन में हैं. उनका कहना है कि यह कोई धार्मिक मसला नहीं है बल्कि एक सांस्कृतिक मसला है और महिलाओं को अपने पसंद से चुनाव करने की अनुमति मिलना चाहिए.












