जासिया अख़्तर: चरमपंथियों के ख़ौफ़ से छोड़ा था क्रिकेट, अब दिल्ली कैपिटल्स से खेलेंगी

- Author, प्रियंका झा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
34 साल की क्रिकेटर जासिया अख़्तर का भारतीय टीम के लिए खेलने का सपना अभी तक अधूरा है, लेकिन महिला प्रीमियर लीग तक के अपने सफ़र से उन्होंने तमाम लड़कियों के सपनों को एक नया आसमान दिया है.
महिला प्रीमियर लीग की पाँच टीमों में से एक दिल्ली कैपिटल्स की टॉप ऑर्डर बल्लेबाज़ जासिया अख़्तर को ज़्यादा लोग नहीं जानते लेकिन वो अपने इलाक़े में किसी स्टार से कम नहीं हैं.
जासिया भारत प्रशासित कश्मीर के उस शोपियां ज़िले से आती हैं जो गाहे-बगाहे चरमपंथ से जुड़ी घटनाओं की वजह से सुर्ख़ियों में रहता है.
जासिया ख़ुद भी इस चरमपंथ से जूझीं और एक समय पर उन्होंने बल्ला भी छोड़ दिया लेकिन उनके शिक्षक ख़ालिद हुसैन ने हौसला बढ़ाया और खेल जारी रखने को कहा.
इस सफ़र में जासिया को अपने पिता ग़ुलाम मोहम्मद वानी से बहुत हिम्मत मिली, जिन्होंने दिहाड़ी मज़दूरी करते हुए भी कभी अपनी बेटी के क्रिकेट करियर को रुकने नहीं दिया.
प्रीमियर लीग के लिए फ़िलहाल मुंबई में प्रैक्टिस कर रही जासिया ने बीबीसी हिन्दी से फ़ोन पर अपना सफ़र साझा किया.
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ख़ुद बैट बनाया, प्लास्टिक की गेंद से खेतों में खेलीं
कश्मीर के बैट, क्रिकेट के मैदानों के लिए नये नहीं हैं. कश्मीरी विलो बैट का एक बड़ा बाज़ार है.
लेकिन जासिया ने जब बल्ला पकड़ा तो उन्होंने ख़ुद लकड़ी के बड़े बड़े टुकड़ों से इसे तैयार किया.
शोपियां के एक छोटे से गाँव ब्रारीपुरा में जासिया अपने माता-पिता, दो बहनों और दो भाइयों के साथ रहती हैं.
जासिया कहती हैं कि अपने शुरुआती सालों में फ़सल कटने के बाद जब खेत खाली पड़े होते थे तब वो वहाँ कज़िन भाई के साथ रोज़ सुबह-शाम प्लास्टिक की गेंद से खेलती थीं.
जासिया कहती हैं कि छोटे गाँवों में बेटी को क्रिकेट में आगे बढ़ाना परिवार के लिए भी कम बड़ी चुनौती नहीं थी.

इमेज स्रोत, @MehboobaMufti
बेटी के लिए पिता का संघर्ष
इसके अलावा पैसों की तंगी भी एक बड़ा पहलू था. जासिया के पिता दिहाड़ी मज़दूरी करते थे.
जासिया ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "आज मैं जो भी हूं अपने माता-पिता की वजह से हूं. मैं ख़ुद को बहुत ख़ुशनसीब समझती हूं कि मुझे ऐसे माता-पिता मिले.
"उन्हें बहुत कुछ सुनना पड़ा लेकिन उन्हें मेरा सपना पूरा करना था. इसलिए लोगों की बातों को अनसुना कर के मुझे मेरा सपना पूरा करने के लिए छोड़ दिया."
वो कहती हैं, "कई बार पापा पूरा दिन मज़दूरी पर जाते थे या वो एक हफ़्ते का भी काम पकड़ते थे. इसके बाद जो भी पैसे उन्हें मिलते थे, उसमें से कुछ मुझे दे देते थे क्योंकि खेलने जाने के लिए किराया लगता था."
"बाकी कुछ पैसे मेरे छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई और खाने-पीने पर लगते थे. वो मेरे लिए पैसे उधार लेकर आते थे. पापा ने मेरे लिए बहुत संघर्ष किया है."
जासिया पिछले कुछ सालों से घरेलू क्रिकेट में अच्छा प्रदर्शन करती आ रही हैं. सीनियर विमेन वन डे ट्रॉफ़ी में जासिया ने 9 मुक़ाबलों में 501 रन जोड़े.
इसके अलावा सीनियर वीमेन टी-20 ट्रॉफ़ी में भी कश्मीर की क्रिकेटर सबसे ज्यादा रन बनाने वाले खिलाड़ियों में दूसरे नंबर पर रहीं. सात मुक़ाबलों में जासिया ने 273 रन बनाए. इसमें उन्होंने एक मैच में नाबाद 125 रन भी बनाए थे.
सीनियर विमेन टी-20 चैलेंजर ट्रॉफ़ी में जासिया ने चार मैचों में 114 रन जोड़े और चौथी सबसे अधिक रन बनाने वाली क्रिकेटर रहीं.

- पहले महिला प्रीमियर लीग में दिल्ली कैपिटल्स ने 20 लाख रुपये में अपनी टीम से जोड़ा.
- चरमपंथियों के डर से छोड़ा क्रिकेट, टीचर के कहने पर 2011-12 में की वापसी.
- जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन छोड़कर पंजाब से जुड़ीं, अब राजस्थान से खेलती हैं.
- जासिया अख़्तर अब कश्मीर में लड़कियों के लिए क्रिकेट एकेडमी खोलना चाहती हैं.


जब चरमपंथ के डर से रुका जासिया का क्रिकेट
जासिया अख़्तर ने एक एथलीट के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की थी. उन्होंने स्कूल में शॉटपुट यानी गोला फेंक प्रतिस्पर्धा में हिस्सा लिया.
लेकिन उन्हें इसमें ख़ास मज़ा नहीं आया और फिर उनकी रुचि क्रिकेट में बढ़ने लगी. स्कूल क्रिकेट टीम से कई टूर्नामेंट में अच्छा परफॉर्म करने के बाद उन्होंने क्रिकेट को प्रोफेशन बना लिया.
हालाँकि कुछ ही सालों में जासिया ने शोपियां में ख़ौफ़ के माहौल की वजह से खेलना छोड़ दिया, लेकिन जासिया के हुनर को पहचानने वाले उनके फिजिकल एजुकेशन टीचर ख़ालिद हुसैन ने उनसे दोबारा खेलने को कहा.
हुसैन ने जासिया के पिता को भरोसा दिया कि वो उनकी बेटी को हर संभव मदद देंगे. इसके बाद जासिया साल 2012 में फिर से क्रिकेट मैदान पर लौटीं और जम्मू कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन से जुड़ीं.
हालाँकि यहाँ बुनियादी सुविधाओं का अभाव जासिया के लिए एक बड़ी चुनौती बना रहा.
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हरमनप्रीत से मुलाक़ात के बाद पंजाब से जुड़ीं
कश्मीर में क्रिकेट के अनुकूल मैदान जैसी बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव जासिया के लिए अभी भी चुनौती बना हुआ था.
इसी बीच उनकी मुलाकात भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान हरमनप्रीत कौर से हुई और इसके बाद जासिया ने पंजाब से घरेलू क्रिकेट खेलना शुरू किया.
जासिया बताती हैं, "2013 में पंजाब के साथ हमारा एक टी-20 मैच था. मैंने 40-45 रन बनाए थे. हरमन ने मुझे उस वक्त बैट गिफ़्ट किया था."
वे कहती हैं, "मुझे उस दिन बहुत खुशी मिली थी. उस बैट से मैं चार साल तक क्रिकेट खेली. उसी साल मैंने पंजाब क्रिकेट एसोसिएशन जॉइन कर लिया और अगले छह साल उसी से खेली."
जासिया फिलहाल राजस्थान से घरेलू क्रिकेट खेलती हैं.

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अनुच्छेद 370 हटने पर क्या बदला?
पाँच अगस्त 2019, वो तारीख है जब भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को रद्द कर दिया और इसे केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया.
अनुच्छेद 370 को हटाने के पक्ष-विपक्ष में लोगों की अलग-अलग राय है.
हमने जासिया अख़्तर से भी जानना चाहा कि क्या इससे महिला क्रिकेट की सूरत में कोई बदलाव आया.
इस पर उन्होंने कहा, "मैं अब जम्मू-कश्मीर से खेलती नहीं हूं, लेकिन मुझे लगता है स्थिति वैसी की वैसी ही है."
"किसी चीज़ को हम हटाते हैं या लागू करते हैं तो उसकी वजह ये होती है कि लोगों को इससे फ़ायदा पहुँचे. एक खिलाड़ी के तौर पर मैं ये कहूंगी कि कश्मीर में बेरोज़गारी बहुत है. जितनी भी सरकारें आईं वहां पर सब अपना देखती हैं, लोगों का कुछ नहीं."

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अब जासिया कई युवाओं के लिए रोल मॉडल हैं. कश्मीर की छोटी-छोटी लड़कियाँ उन्हें मेसेज करती हैं और क्रिकेट खेलने की इच्छा ज़ाहिर करती हैं.
जासिया कहती हैं कि वो ख़ुद अब एक एकेडमी खोलेंगी, जहाँ लड़कियों को क्रिकेट खेलने के लिए अच्छे कोच, मैदान जैसी हर सुविधा मिले.
जासिया जब अपने गाँव में होती हैं तो अब भी फ़िटनेस के लिए जिम की बजाय खेती करती हैं.
जासिया इंडिया ए के लिए खेलती हैं और अब उनका सपना भारतीय क्रिकेट टीम की जर्सी पहनना है. हालाँकि उनका ये सपना सच होगा या नहीं ये काफ़ी हद तक महिला प्रीमियर लीग में उनके प्रदर्शन पर भी निर्भर करता है.
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