क्रिकेटर अर्चना देवी की कहानी: मां के संघर्ष से मैदान पर मिली सफ़लता तक

- Author, अमन द्विवेदी
- पदनाम, उन्नाव, उत्तर प्रदेश से, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर प्रदेश के उन्नाव का रतईपुरवा गांव. दक्षिण अफ्रीका में भारतीय महिला क्रिकेट टीम के अंडर19 वर्ल्ड कप जीतते ही इस गांव के नज़ारे बदले हुए हैं.
इन बदले नज़ारों में भी गांव की हक़ीक़त बदली नहीं है. गांव तक जाने के लिए न कोई पक्का रास्ता है और न ही यहां पहुँचने के लिए आसानी से कोई साधन मिलता है.
लेकिन इस गांव से ही निकलकर स्पिनर अर्चना देवी ने महिला अंडर 19 टीम में जगह बनाई और फिर दक्षिण अफ्रीका जाकर भारतीय टीम के साथ-साथ गांव और परिवार का नाम रोशन किया.
अर्चना देवी के घर के सामने न तो कोई पक्का रास्ता है. न ही कोई नाली बनी थी. घर के बाहर एक दीवार पर घास-फूस से बना छप्पर रखा था और पास में ही गाय और भैंस बँधी थी.
पहली नज़र में ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि ये घर भारतीय महिला टीम में खेलने वाले किसी खिलाड़ी का हो सकता है. लेकिन अब इस घर के बाहर रौनक है. नेता, विधायक और रिश्तेदारों की भीड़ है.

एक कमरे के घर में रहता है पूरा परिवार
अर्चना का पूरा परिवार एक कमरे में रहता है. कमरे में गृहस्थी के नाम पर एक गैस सिलेंडर, एक खाट और एक दिन पहले मिला नया इनवर्टर है.
कमरे की खूंटी पर अर्चना को यूपी क्रिकेट एसोसिएशन की तरफ से मिला बैग टंगा हुआ था. पास में अर्चना की तस्वीर और कुछ किताबें रखी हैं.
वर्ल्डकप जिताने में अहम भूमिका निभाने वाली अर्चना की मां सावित्री देवी ख़ुश हैं मगर ख़राब तबीयत के कारण कुछ परेशान भी हैं.
सावित्री देवी ने कहा, "सुबह नाश्ते में हमने दलिया बनाई थी. बेटे को खिला दी थी जैसे ही खुद खाने जा रहे थे तो लोग बधाई देने आ गए. उनसे मिलने लगे तो दलिया एक कुत्ता खा गया."
सुर्खियों में आने और सफ़लता मिलने के बाद भी अर्चना के परिवार के पास दो वक़्त के खाने का इंतज़ाम नहीं है.

परिवार ने मांगे हुए टीवी पर देखा बेटी का अहम मैच
इस तंगहाली में अर्चना की मां सावित्री देवी ने कैसे अपने बेटे और बेटी को पाला और उसके खेल के सपने को पूरा किया?
अर्चना के भाई रोहित ने बताया, "हमारे पिता शिवराम खेतों में काम करते थे. साल 2007 में पिता की मौत के बाद घर चलाने का सारा भार मां पर आ गया. हमारे घर पर एक गाय थी, मम्मी उस गाय के दूध का खोया बनाकर बेचती थीं और खेत में काम करती थीं. उसी से घर चलता था."
रोहित अपनी मां के संघर्ष के बारे में बोले, ''हमारी मम्मी अगर सामने से गुज़र जाएं तो लोग कहते थे कि आज का दिन ख़राब जाएगा. मम्मी किसी का कपड़ा छू लेतीं तो कहते- ये कपड़ा अब ख़राब है. ये डायन है. पता नहीं लोग क्या-क्या बोलते थे. कभी-कभार मन में आता है कि जवाब दूं पर नहीं दूंगा. लोग जवाब के काबिल नहीं हैं.''
रोहित अपने बचपन के बारे में कहते हैं, "पहले गांव के सरकारी स्कूल में हमने कक्षा 5 तक पढ़ाई की और फिर उसके बाद अर्चना कस्तूरबा गांधी स्कूल गई."
सावित्री देवी ने बताया, "अर्चना का एडमिशन कस्तूरबा गांधी स्कूल में सिर्फ़ इसलिए करवाया था. क्योंकि वहां रहने का इंतज़ाम था और हॉस्टल में दो वक़्त का खाना मिल जाता था."
स्कूल से हॉस्टल, फिर खेल का मैदान और फिर ऑफ स्पिनर के तौर पर अंडर 19 में चयन और फिर ख़बरों में जगह. अर्चना की अब तक की कहानी के कई पड़ाव हैं.
अर्चना के परिवार ने अंडर 19 वर्ल्डकप के ज़्यादातर मैच मोबाइल पर देखे. लेकिन जब फ़ाइनल मैच आया तो अर्चना के चाचा के घर से टीवी लाया गया. बिजली जाने पर मैच देखना रुके नहीं, इसका भी इंतज़ाम किया गया.
रोहित ने बताया, "हमें लखनऊ के एक पीसीएस अधिकारी ने फोन किया था और कहा था हम आपके घर इनवर्टर भिजवा रहे हैं. जो बांगरमऊ पुलिस थाने के लोग देकर गए थे. उससे पहले हम लोग मोबाइल में मैच देखते थे."

पांचवीं क्लास तक नहीं मालूम था कि क्रिकेट क्या होता है?
फ़ाइनल मैच के चौथे ओवर में 2 अहम विकेट लेकर भारत की जीत को आसान बनाने वाली खिलाड़ी अर्चना देवी के बारे में अब काफ़ी लोग जान रहे हैं.
लेकिन पांचवी क्लास तक उन्हें नहीं मालूम था कि क्रिकेट क्या है और कैसे खेला जाता है?
रोहित के मुताबिक, "अर्चना को कस्तूरबा स्कूल में पहली बार क्रिकेट के बारे में बताया गया. उसने स्कूल में ही सबकुछ सीखा."
वो इसका श्रेय अर्चना की कस्तूरबा विद्यालय की स्पोर्टस टीचर पूनम गुप्ता को देते हैं.
बीबीसी से पूनम कहती हैं, "न तो अर्चना और न ही यहां के बाक़ी लोगों को क्रिकेट के बारे में कोई जानकारी थी. लखनऊ-कानपुर-इलाहाबाद में बच्चा-बच्चा जानता है कि क्रिकेट क्या होता है. उस टाइम भी जानता था. लेकिन यहां पर 2014 में बच्चों को तो छोड़िए ज़्यादातर आदमी और औरतें भी नहीं जानते थे कि क्रिकेट कौन सा खेल है. मुझे थोड़ा आश्चर्य भी हुआ. महिला क्रिकेट की तो बात छोड़िए पुरुषों के क्रिकेट के बारे में भी यहां के कुछ लोग नहीं जानते थे."
पूनम गुप्ता ने बताया, "स्कूल में जब मैं अर्चना को खिलाती थी तो सबसे अहम होती है लाइन और लेंथ. बिना किसी कोचिंग के अर्चना की बॉल एक दम सटीक पड़ती थी. मैं बैटिंग करती थी और अर्चना बॉलिंग. ऐसे ही हम दोनों प्रैक्टिस करते थे. 2015 में अर्चना की मां मेरे पास आई थीं. बोलीं कि एक कमरे में वो ख़ुद रहें या बेटी को रखें. यह बात हमको दिल पर लगी. उसके बाद हमने कहा कि अपनी बेटी को हमें दे दो. फिर हमने उसका कानपुर में एडमिशन करवाया. किट बैग दिलवाया. हमने अर्चना से कहा कि अब तुम खेलो, जो ज़रूरत हो बिना झिझक मुझे बताओ."

इमेज स्रोत, Nathan Stirk-ICC
अर्चना की स्कूली पढ़ाई कहां तक पहुंची?
अर्चना इस समय 11वीं क्लास में पढ़ रही हैं और क्रिकेट भी खेल रही हैं.
घर के हालात देखते हुए यह सफ़र आसान नहीं था. पूनम गुप्ता बताती हैं, ''कानपुर में हर महीने मैं अर्चना को 5 हज़ार रुपए भेजती, जिससे कमरे का किराया और दूसरे खर्च चलते.''
पूनम गुप्ता ने कहा, "मैं भी क्रिकेट खेलती थी. अंडर-19 टीम में चुनी नहीं गई. उसी साल मेरे पिता की मौत हो गई थी जिस वजह से आगे नहीं खेल पाई और शिक्षक बन गई."
पूनम कहती हैं कि उनका सपना अर्चना ने पूरा कर दिया है. वो बोलीं, "अर्चना अब रुकने वाली नहीं हैं. अंडर-19 के बाद महिला आईपीएल और महिला टीम का हिस्सा भी ज़रूर बनेंगी."
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