नीरज चोपड़ा लड़खड़ाए, धड़कनें बढ़ाईं फिर वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में ले आए सिल्वर

ओलंपिक चैंपियन नीरज चोपड़ा ने वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भारत के लिए इतिहास रच दिया. अमेरिका के ओरेगन में हो रही चैंपियनशिप के पुरुष जैवलिन थ्रो (भाला फेंकने) में नीरज चोपड़ा ने सिल्वर मेडल जीता है.

19 साल बाद किसी भारतीय को वर्ल्ड एथलिटिक्स चैंपियनशिप में मेडल मिला है. इससे पहले अंजू बॉबी जॉर्ज ने साल 2003 में महिला लॉन्ग जंप में कांस्य पदक जीता था.

देश के तमाम लोग टीवी पर नीरज चोपड़ा के इवेंट का लाइव प्रसारण देख रहे थे. इनमें उनकी मां सरोज देवी और परिवार के दूसरे सदस्य भी थे.

नीरज का पदक पक्का होते ही उनकी मां की भावनाएं उमड़ पड़ीं. वो बोलीं, "हमें भरोसा था कि वो देश के लिए मेडल ज़रूर जीतेगा."

नीरज चोपड़ा को देश और दुनिया से बधाइयां मिल रही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत राजनीति, खेल और सामाजिक क्षेत्र के लोगों ने नीरज को बधाई दी है.

नीरज चोपड़ा ने चौथी कोशिश में 88.13 मीटर लंबा थ्रो किया. ग्रेनेडा के एंडर्सन पीटर्स ने गोल्ड मेडल जीता है. उन्होंने अपने आख़िरी थ्रो में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 90.54 मीटर दूर भाला फेंका.

चेक रिपब्लिक के जैकब वादले कांस्य पदक के साथ तीसरे नंबर पर रहे. उन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 88.09 मीटर दूर भाला फेंका.

इस प्रतिस्पर्धा में पाकिस्तान के अरशद नदीम भी शामिल थे. वो पांचवे स्थान पर रहे. उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 86.16 मीटर रहा.

गोल्ड पर नज़र जमाकर उतरे नीरज चोपड़ा पहली कोशिश में फाउल कर बैठे. दूसरे राउंड में उन्होंने 82.39 मीटर तक भाला फेंका था.

तीसरी कोशिश में उन्होंने 86.37 मीटर दूर भाला फेंका था. चौथे प्रयास में 88.13 मीटर दूर भाला फेंककर वह दूसरे स्थान पर आ गए थे. नीरज चोपड़ा पांचवीं और छठी कोशिश में भी फाउल कर बैठे.

भारत की ओर से एक और जेवलिन थ्रो खिलाड़ी रोहित यादव भी इस प्रतिस्पर्धा में थे लेकिन वो शीर्ष आठ में जगह नहीं बना पाए. अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 78.72 के साथ वो दसवें नंबर पर रहे.

इसके पहले अंजू बॉबी जॉर्ज एकमात्र भारतीय थीं, जिन्होंने वर्ल्ड एथलिटिक्स चैंपियनशिप में 2003 में कांस्य पदक जीता था. अब उनके साथ नीरज चोपड़ा का नाम भी शामिल हो गया है.

वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में नीरज चोपड़ा ने 88.39 मीटर के अपने पहले ही थ्रो के साथ फ़ाइनल में जगह बनाई थी. यह उनके करियर का तीसरा सबसे बेहतरीन थ्रो था. तब वो सिर्फ़ एंडर्सन पीटर्स से पीछे थे.

अगर नीरज चोपड़ा गोल्ड मेडल जीत जाते तो पुरुष जैवलिन थ्रो में दुनिया के तीसरे एथलिट बन जाते, जिन्होंने ओलंपिक चैंपियन के साथ वर्ल्ड चैंपियनशिप में भी गोल्ड मेडल जीता. नॉर्वे के एंड्रीआस थोरकिल्डसन (2008-09) और वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने वाले चेक रिपब्लिक के जैन ज़ेलेज़्नी के बाद नीरज चोपड़ा इस फेहरिस्त में आ जाते.

नीरज चोपड़ा की इस उपलब्धि पर उनका मां सरोज देवी ने बेहद खुशी ज़ाहिर की. उन्होंने कहा, ''हम बहुत खुश हैं कि उसकी मेहनत रंग लाई है. मुझे विश्वास था कि वो इस बार मेडल ज़रूर जीतेगा.''

क़ानून मंत्री ने नीरज चोपड़ा को बधाई देते हुए कहा, ''नीरज चोपड़ा ने वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में रजत पद जीतते हुए इतिहास रच दिया है. वो विश्व एथलेटिक्स में अंजू बॉबी जॉर्ज के 2003 में मेडल जीतने के बाद मेडल पाने वाले पहले पुरुष और दूसरे भारतीय बने हैं.''

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा, ''नीरज चोपड़ा को वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में चमकदार सिल्व मेडल प्रदर्शन के लिए बधाई. एक सराहनीय उपलब्धि जो भारतीय खेल को आगे ले जाएगी.''

टोक्यो ओलंपिक में जीता था गोल्ड मेडल

नीरज चोपड़ा ने पिछले साल टोक्यो ओलंपिक में भी इतिहास रचा था. वो एथलेटिक्स प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीतने वाले भारत के पहले खिलाड़ी बने थे.

उन्होंने 87.58 मीटर जैवलिन थ्रो (भाला फेंक) के साथ भारत की झोली में गोल्ड मेडल डाल दिया था.

नीरज ने अपने पहले प्रयास में 87.03 मीटर, दूसरे में 87.58 और तीसरे प्रयास में 76.79 मीटर भाला फेंका था.

पानीपत के गाँव से शुरू हुई कहानी

नीरज की कहानी शुरू हुई पानीपत के एक छोटे से गाँव से. यहाँ लड़कपन में नीरज भारी भरकम होते थे. उनका वजन क़रीब 80 किलो था. कुर्ता पायजामा पहने नीरज को सब सरपंच कहते थे.

फ़िटनेस ठीक करने के लिए से वो पानीपात में स्टेडियम जाने लगे और दूसरों के कहने पर जैवलिन में हाथ आज़माया और वहीं से सफ़र शुरू हुआ.

बेहतर सुविधाओं की तलाश में नीरज पंचकुला शिफ्ट कर गए और पहली बार उनका सामना राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों से हुआ. उन्हें बेहतर सुविधाएं मिलने लगीं.

जब राष्ट्रीय स्तर पर खेलने लगे तो ख़राब क्वॉलिटी वाली जैवलिन की बजाय हाथ में बढ़िया जैवलिन आ गई. धीरे-धीरे नीरज के खेल में तब्दीली आ रही थी.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमके

जब 2016 में भारत पीवी सिंधु और साक्षी मलिक के मेडल का जश्न मना रहा था तो एथलेक्टिस की दुनिया में कहीं और एक नए सितारे का उदय हो रहा था.

ये वही साल है, जब नीरज ने पोलैंड में U-20 विश्व चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता.

जल्द ही ये युवा खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छाने लगा. उन्होंने गोल्ड कोस्ट में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में 86.47 मीटर के जैवलिन थ्रो के साथ स्वर्ण पदक जीता तो 2018 में एशियाई खेलों में 88.07 मीटर तक जैवलिन थ्रो कर राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया था और स्वर्ण पदक भी जीता.

चोट ने मुश्किलों में डाला

लेकिन 2019 नीरज चोपड़ा के लिए बेहद मुश्किलों भरा रहा. कंधे की चोट के कारण वे खेल नहीं पाए और सर्जरी के बाद कई महीने तक आराम करना पड़ा. फिर 2020 आते-आते तो कोरोना के चलते अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ नहीं हो पाईं.

हालांकि ये पहली बार नहीं है, जब घायल होने की वजह से नीरज को इस कदर परेशानी हुई हो.

2012 में जब वो बास्केटबॉल खेल रहे थे, तो उनकी कलाई टूट गई. वही कलाई जिससे वो थ्रो करते हैं. तब नीरज ने कहा था कि एक बार उन्हें लगा था कि शायद वे न खेल पाएँ.

लेकिन नीरज की मेहनत और उनकी टीम की कोशिश से वो उस पड़ाव को भी पार गए.

आज की तारीख़ में भले उनके पास विदेशी कोच हैं, बायोमैकेनिकल एक्सपर्ट हैं, पर 2015 के आस-पास तक नीरज ने एक तरह से ख़ुद ही अपने आप को ट्रेन किया, जिसमें घायल होने का ज़्यादा ख़तरा बना रहता है. उसके बाद ही उन्हें अच्छे कोच और दूसरी सुविधा मिलने लगी.

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