तारक सिन्हा: 'उस्ताद जी' कौन थे, जिन्होंने गढ़े 12 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर

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- Author, सूर्यांशी पाण्डेय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"मैंने 9 साल की उम्र में उनसे ट्रेनिंग लेनी शुरू की और तब क्लब की फ़ीस सिर्फ़ 50 रुपए हुआ करती थी. और आप समझ लो, वोउन खिलाड़ियों से फ़ीस तक नहीं लेते थे, जो आर्थिक रूप से कमज़ोर हुआ करते थे. उन्हें मुफ़्त में सिखाते थे."
- आकाश चोपड़ा, क्रिकेट कमेंटेटर और पूर्व क्रिकटेर
"दिसंबर 2001 में जब वोमहिला क्रिकेट टीम के कोच थे, मैं कप्तान बनी थी और हमारी टीम ने पहली बार इंग्लैंड को 5-0 से वनडे में हराया था."
- अंजुम चोपड़ा, क्रिकेट कमेंटेटर और पूर्व महिला क्रिकेट कप्तान
इन क़िस्सों के ज़रिए जिस शख़्सियत को याद किया जा रहा है, उन्होंने भारतीय क्रिकेट जगत को क़रीब 12 अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी सौंपे, जिनमें से ऋषभ पंत, शिखर धवन टीम इंडिया के लिए आज के समय में खेल रहे हैं.
दिल्ली के घरेलू क्रिकेट के दिग्गज कोच रहे तारक सिन्हा का 5 नवंबर को लंग कैंसर के चलते निधन हो गया.
उन्होंने 1969 में दिल्ली में अपनी क्लर्क की नौकरी से जमा किए पैसों से सोनेट क्लब की स्थापना की थी. उसी क्लब से शुरुआत कर रमन लांबा से लेकर ऋषभ पंत ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में जगह बनाई.
जब हम दिल्ली विश्वविद्यालय में स्थित उनके सोनेट क्लब पहुंचे, तो पता चला कि उनके अंतिम दर्शन के लिए वीरेंद्र सहवाग और उनका परिवार, ऋषभ पंत का परिवार, आशीष नेहरा का परिवार, पूर्व क्रिकेटर अतुल वासन और आकाश चोपड़ा का परिवार वहां पहुंचा हुआ था.
पूरा क्रिकेट ग्राउंड मौजूदा युवा खिलाड़ियों, पूर्व कोच, क्रिकेटरों और उनके परिजनों से भरा हुआ था. ये मंज़र खिलाड़ियों के दिल में बैठे उनके लिए सम्मान की एक बानगी भर था.
उनको याद करते हुए पूर्व क्रिकेटर संजीव शर्मा ने बीबीसी से कहा, "रमन लांबा ने उनसे कहा कि आप आशीष नेहरा पर क्यों मेहनत कर रहे हो? इसमें वो बात नहीं लग रही, तब उस्ताद जी कहते हैं- नहीं, यह खिलाड़ी काफ़ी आगे तक जाएगा."
वहीं अतुल वासन कहते हैं, "मैं 4 साल तक डीडीसीए का सिलेक्टर रहा लेकिन कभी भी उस्ताद जी ने मुझे कॉल करके किसी की सिफ़ारिश नहीं लगाई."
खेल पत्रकार इंद्रनील बसु बताते हैं कि तारक सिन्हा को 2018 में द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया, लेकिन वो अपनी असल उपलब्धि खिलाड़ियों को क्रिकेट के बारीक गुर सिखाने और उन्हें आगे बढ़ाने में ही मानते थे.
वो कहते हैं कि उन्हें पहचान और पुरस्कार की कोई भूख नहीं थी. इसका उदाहरण इस बात से मिलता है कि कई दिग्गज खिलाड़ियों ने द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए उनका नामांकन उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ जाकर ही करवाया था.

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जूनियर टीम में जब नहीं हुआ चयन, तो खोल दी एकेडमी
तारक सिन्हा दिल्ली के कमला नगर के सरकारी स्कूल (बिरला स्कूल) के विकेटकीपर-बल्लेबाज़ थे. वो सीके नायडू ट्रॉफ़ी के लिए दिल्ली की जूनियर टीम में जगह पाने की उम्मीद लगाए बैठे थे. लेकिन उनका चयन नहीं हुआ.
इससे आहत होकर उन्होंने आगे चलकर एक क्रिकेट एकेडमी खोलने का मन बना लिया, जहां सरकारी स्कूल के युवा खिलाड़ियों की अच्छे स्तर पर ट्रेनिंग दी जानी थी. साल 1969 में उन्होंने सोनेट क्लब का गठन किया, जिसकी शुरुआत सरकारी बिरला स्कूल से ही हुई.
बाद में तारक सिन्हा दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी कॉलेज में क्लर्क की नौकरी पर लगे और वहां से मिलने वाले वेतन को अपने क्लब को निखारने में लगाने लगे.
जब ये क्लब 20 बच्चों के साथ शुरू हुआ, तो किसी को भी अंदाज़ा नहीं था कि ये क्लब आगे जाकर दिल्ली के प्रतिष्ठित नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ स्पोर्ट्स से मुक़ाबला करेगा और दिल्ली के प्रमुख मुक़ाबले जीतेगा.
डीडीसीए (दिल्ली एवं ज़िला क्रिकेट संघ) ने 1971 में जाकर इस क्लब को मान्यता दी. यही नहीं, इस क्रिकेट क्लब को कम पैसों, सुविधाओं के कारण कई बार जगह बदलनी पड़ी. सबसे पहले ये बिरला स्कूल में था, फिर अजमल ख़ान पार्क इसका नया ठिकाना बना. उसके बाद, डीसीएम ग्राउंड, फिर डीयू का राजधानी कॉलेज और मौजूदा समय में ये वेंकटेश्वर कॉलेज ग्राउंड में स्थित है.

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बुरे वक्त में देते थे खिलाड़ियों का साथ
अतुल वासन बताते हैं कि वो 14 साल की उम्र में सोनेट क्लब गए थे. और वहां तारक सिन्हा से उन्होंने कड़ी मेहनत करने और बुरे वक्त में भी हौसला रखने की कला सीखी.
वो याद करते हैं कि सोनेट क्लब में कोई अमीर-ग़रीब नहीं होता था. सबको एक स्तर पर रखा जाता था. सभी बच्चों को विकेट लगाने से लेकर पिच पर ख़ुद रोलर चलाना सिखाया जाता था. उसके बाद ही उनकी कोचिंग शुरू होती थी.
उन्हें एक वाक़या याद आया, जब उनका प्रदर्शन अच्छा नहीं चल रहा था. उस वक़्त उन्होंने क्रिकेट ही छोड़ने का मन बना लिया था. जब 'उस्ताद जी' (तारक सिन्हा को सब प्यार से उस्ताद जी बुलाते हैं) को पता चला तो, वो सीधे अतुल वासन के घर चले गए. वहां जाकर उन्हें और उनके पिता को ख़ूब समझाया.
अतुल वासन कहते हैं, ''कौन कोच इतना ध्यान देता है? वो तब अपने खिलाड़ियों का हाथ थामते थे, जब वो अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते थे. उनकी वजह से ही आप मुझे इंडियन टीम में खेलते देख पाए, क्योंकि उन्होंने मुझे थामे रखा."
वहीं आकाश चोपड़ा ने बताया कि 9 साल की उम्र में उन्होंने क्लब में खेलना शुरू किया. आकाश चोपड़ा कहते हैं, ''उनकी सबसे बड़ी प्रतिभा छोटी उम्र में ही टैलेंट को पहचान लेना थी. वो तो यहां तक अनुमान लगा लेते थे कि कोई खिलाड़ी कहां तक जा सकता है. इसके साथ ही, वो ग़रीब बच्चों को मुफ़्त में ही ट्रेनिंग देते थे.''

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जब आशीष नेहरा ने ख़रीदा 'उस्ताद जी' के लिए घर
तारक सिन्हा के क्लब में ही क्रिकेट सीखने वाले पूर्व टेस्ट क्रिकेटर संजीव शर्मा एक क़िस्सा बताते हैं, ''जब आशीष नेहरा अपनी पहचान बना चुके थे, तब एक बार वो उस्ताद जी का सोनेट क्लब में इंतज़ार कर रहे थे. उस्ताद जी काफ़ी देर से आए, तो आशीष ने पूछा कि आप जल्दी क्यों नहीं आते?"
"इस पर तारक सिन्हा ने जवाब दिया कि 'मेरा घर गाज़ियाबाद में है. अब इतनी दूर से आऊंगा तो समय तो लगेगा ही.' ये सुनने के बाद आशीष नेहरा ने उस्ताद जी के लिए द्वारका में घर ले दिया.''
यही नहीं, उनके क्लब के लिए समय-समय पर बड़े खिलाड़ी आर्थिक रूप से मदद भी करते रहे. हालांकि उन्होंने कभी ख़ुद से किसी के पास जाकर कुछ नहीं मांगा.
उनकी कोचिंग के तरीके के बारे में संजीव शर्मा बताते हैं कि वो गेंदबाज़ और बल्लेबाज़ दोनों की तकनीक पर काम करते थे. गर्मी के समय में वो स्पिनर्स को और सर्दी के समय में तेज़ गेंदबाज़ों को कड़ा प्रशिक्षण देते थे.

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महिला क्रिकेट में अहम योगदान
भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान रहीं अंजुम चोपड़ा ने बीबीसी से हुई बातचीत में बताया कि दिसंबर 2001 में जब उनका चयन कप्तान के तौर पर हुआ, उस समय तारक सिन्हा ही कोच थे. उनके समय में ही 2002 में महिला क्रिकेट टीम ने पहली बार विदेशी टीम को घरेलू वनडे मुक़ाबलों में 5-0 से हराया था. तब इंग्लैंड की टीम वनडे सिरीज़ के लिए भारत आई थी.
वो बताती हैं कि भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने किसी विदेशी ज़मीन पर जाकर जो पहली टेस्ट सिरीज़ जीती, वो भी उन्हीं की कोचिंग के समय दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ खेली गई सिरीज़ थी.
संजीव शर्मा बताते हैं कि ''राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के जब वह एक मुख्य पदाधिकारी बने, तब दो साल तक राजस्थान टीम रणजी ट्रॉफ़ी विजेता रही. अच्छे खिलाड़ी की परख करने का उनमें एक नेचुरल टैलेंट था. साथ ही, वो कई विदेशी क्रिकेट कोच या खिलाड़ियों की क़िताबें भी पढ़ते रहते थे.''
इतने खिलाड़ियों को बड़े-बड़े मुक़ाम तक पहुंचाने के बाद भी 'उस्ताद जी' अंत तक सादा जीवन ही जीते रहे. उन्होंने कभी परिवार नहीं बनाया, शादी नहीं की. क्रिकेट को ही अपनी जीवनसंगिनी मानकर खिलाड़ियों की प्रतिभा में ही अपना परिवार तलाशते रहे.
जिन 12 अंतराष्ट्रीय राष्ट्रीय खिलाड़ियों को उन्होंने प्रशिक्षित किया: ऋषभ पंत, शिखर धवन, आकाश चोपड़ा, अंजुम चोपड़ा, आशीष नेहरा, अतुल वासन, संजीव शर्मा, केपी भास्कर, अजय शर्मा, मनोज प्रभाकर, रमन लांबा, सुरेंदर खन्ना और रणधीर सिंह.
दिल्ली के खिलाड़ी ही नहीं, बल्कि कई दूसरेराज्यों के खिलाड़ियों के भीउस्ताद रहे तारक सिन्हा. जैसे: मयंक सिंधाना (पंजाब), एकलव्य दीवान (यूपी), राजीव देओरा (बिहार).
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