टोक्यो ओलंपिक: हॉकी में क्या 41 साल बाद मिल पाएगा मेडल?

    • Author, मनोज चतुर्वेदी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

भारतीय पुरुष हॉकी टीम ओलंपिक में 41 साल बाद मेडल हासिल करने की उम्मीदों के साथ जर्मनी के ख़िलाफ़ मुक़ाबले में उतरेगी.

135 करोड़ देशवासियों की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए भारतीय खिलाड़ियों को बेल्जियम के ख़िलाफ़ सेमीफ़ाइनल मैच में की गई ग़लतियों से भी उबरना होगा.

दोनों टीमों के टोक्यो ओलंपिक में किए प्रदर्शन को पैमाना मानें तो भारतीय टीम जर्मनी के ख़िलाफ़ किसी भी तरह से कमज़ोर नहीं दिख रही है. असलियत तो यह है कि ग्रुप मैचों में भारतीय प्रदर्शन थोड़ा बेहतर ही है.

यह सही है कि दोनों टीमें अपने पूल में दूसरे स्थान पर रहीं. पर इन मैचों में भारत की एक हार के मुक़ाबले जर्मनी को दो हार का सामना करना पड़ा.

जर्मनी की विश्व चैंपियन बेल्जियम के ख़िलाफ़ हार को तो समझा जा सकता है पर पूल की निचले क्रम की टीम दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ 3-4 की हार से यह उम्मीद बंधती है कि इस टीम पर दवाब बनाया जाए तो यह बिखर भी सकती है.

भारत को डिफेंस में मुस्तैद रहना होगा

भारत ने बेल्जियम के ख़िलाफ़ सेमीफ़ाइनल में पहले दो क्वार्टर में ज़ोरदार प्रदर्शन करने के बाद आख़िरी दो क्वार्टर में डिफ़ेंस में कमज़ोरी दिखाने की वजह से ही मैच हारा था. अब जर्मनी से मुक़ाबला करते समय इन ग़लतियों से पार पाने की ज़रूरत है.

असल में हमारे डिफ़ेंडर कई बार प्रतिद्वंद्वी हमले के समय हड़बड़ाहट दिखाने की वजह से टैकलिंग में ग़लतियां कर जाते हैं, जिससे सामने वाली टीम को इसका फ़ायदा मिल जाता है. सेमीफ़ाइनल में भारतीय डिफ़ेंस की कमज़ोरी की वजह से बेल्जियम को 14 पेनल्टी कार्नर और एक पेनल्टी स्ट्रोक मिला.

जब आप सेमीफ़ाइनल जैसे महत्वपूर्ण मैच में इतने पेनल्टी कार्नर दे देंगे, तो जीत की उम्मीद कैसे की जा सकती है. वह भी उस टीम के ख़िलाफ़ जिसके पास दुनिया का सर्वश्रेष्ठ ड्रैग फ्लिकर एलेक्जेंडर हेंड्रिक्स हो, जो इस ओलंपिक में अब तक 14 गोल ठोक चुके हैं.

जर्मनी की आक्रामक खेल के लिए पहचान

जर्मनी टीम को आक्रामक हॉकी खेलने के लिए जाना जाता है और वह ताबड़तोड़ हमले बनाकर सामने वाली टीम पर दवाब बनाने का प्रयास करती है. इस सूरत में भारत डिफेंस को और भी मजबूती से डटना होगा.

वैसे भारत ने स्पेन, पिछली ओलंपिक चैंपियन अर्जेंटीना के ख़िलाफ़ अच्छे बचाव का प्रदर्शन किया था लेकिन पहले ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ और बाद में बेल्जियम के ख़िलाफ़ डिफेंस में दरारें साफ़ नजर आई.

भारत यदि 41 साल बाद पदक पाना चाहता है तो उसे बचाव में ज़्यादा मज़बूती से डटना होगा. इस मैच में भारत के सामने एक और समस्या होगी कि डिफेंडर अमित रोहिदास के खेलने की संभावनाएं कम हैं. यह वही खिलाड़ी है जिसने सेमीफ़ाइनल में 14 पेनल्टी कार्नरों में से सात पर तेज गति से दौड़कर अपने शरीर पर गेंदें झेलकर बचाव किया था.

इन पेनल्टी कार्नरों पर 150 से लेकर 160 किमी की गति से आने वाली गेंदों के सामने इस तरह से डटना आसान बात नहीं है. पर लगता है यह जज्बा ओडिशा के सुंदरगढ़ के खिलाड़ियों में ही हो सकता है. इस गांव से ही भारत के मशहूर डिफेंडर दिलीप टिर्की भी ताल्लुक रखते थे.

डिफेंस करते समय थोड़ा कूल रहने की ज़रूरत

भारतीय डिफेंडर रूपिंदर हों या हरमनप्रीत या मिडफील्डर मनप्रीत और विवेक प्रसाद सभी को यह ध्यान रखना ज़रूरी होगा कि टैकलिंग सफाई से की जाए, ख़ासतौर से सर्किल में. आजकल टीमें सर्किल में पहुंचने पर गोल जमाने का मौका नहीं देखने पर बचाव वाली टीम के किसी खिलाड़ी के ख़िलाफ़ कैरिड करके पेनल्टी कार्नर हासिल करने का प्रयास करती हैं.

यही वजह है कि ज़्यादातर मैचों के नतीजे पेनल्टी कार्नरों के माध्यमों से ही तय हो रहे हैं. इस मामले में हम सेमीफ़ाइनल में बेल्जियम टीम के डिफ़ेंस से सीख ले सकते हैं. उन्होंने ज़्यादा सफाई से टैकिल करके हमें ज़्यादा पेनल्टी कार्नर नहीं दिए थे. इसके अलावा सर्किल में हमले के समय या मैदान में कहीं भी ग़लत ढंग से टैकिल करने पर कई बार फाउल करके मुश्किल में फंस जाती है.

2018 के विश्व कप के क्वार्टर फाइनल में अमित रोहिदास को ग्रीन कार्ड दिखाया गया था. वो बाहर हो गए थे और भारत को हारना पड़ा था.

टोक्यो ओलंपिक के सेमीफ़ाइनल में कप्तान मनप्रीत सिंह के आख़िरी क्वार्टर में हरा कार्ड देखने से भारत की जो दुर्दशा हुई उसे हम देख सकते हैं. मुश्किल पलों में 10 खिलाड़ियों के साथ खेलना, हार की ओर धकेलता है.

आख़िरी समय की ढिलाई से बचना होगा

पहले तो हम आख़िरी समय में ख़राब प्रदर्शन करके जीते मैचों को हारने के लिए जाने जाते थे. इसकी वजह खिलाड़ियों की ख़राब फ़िटनेस हुआ करती थी. लेकिन पिछले कुछ सालों से खिलाड़ियों की फ़िटनेस पर ख़ास ध्यान देने से हमारे खिलाड़ी इस मामले में किसी भी टीम से कम नहीं हैं.

2016 के रियो ओलंपिक के ग्रुप मैच में हम जर्मनी से इसी वजह से हारे थे. दोनों टीमें 1-1 से बराबरी पर थीं और लग रहा था कि मैच बराबर हो जाएगा. पर अंतिम सेकेंड की चूक की वजह से क्रिस्टोफर रूहर ने गोल जमाकर भारत को हरा दिया था. यह खिलाड़ी मौजूदा टीम में भी है.

हमारे पक्ष में जाने वाली एक बात यह भी है कि जर्मनी के पास हेंड्रिक्स जैसा ड्रेग फ्लिकर नहीं है. हालांकि उनके ड्रैग फ्लिकर लुकास को कम करके नहीं आंका जा सकता है और वह इस ओलंपिक में अब तक पांच गोल जमा चुके हैं. इस स्थिति में हम यदि गोल खाने से बचने के अलावा कम से कम पेनल्टी कार्नर देने पर ध्यान दें तो बाजी को पक्ष में किया जा सकता है.

पदक का जज़्बा दिला सकता है जीत

वैसे भारतीय टीम ही नहीं पूरा देश इस पदक को पाने के लिए बेकरार है. भारतीय खिलाड़ी सेमीफ़ाइनल में भी जीत के जज़्बे से उतरे थे और उस तरह की शुरुआत भी की थी. पर उस असफलता को सफलता में कैसे बदला जाए, यह करने की उनमें क्षमता है.

जर्मनी के दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ ग्रुप मैच की हार पर निगाह डालें तो साफ़ होता है कि उनका डिफेंस बहुत मज़बूत नहीं है और उसे छितराया भी जा सकता है. भारतीय फारवर्ड गुरजंत, ललित उपाध्याय, दिलप्रीत सिंह और मनदीप सिंह में यह माद्दा है.

भारतीय फारवर्ड लाइन यदि हमलावर रुख अपनाकर जर्मनी को बचाव में व्यस्त करने में सफल हो जाती है तो समझिए उसका आधा काम हो गया. इस तरह वह जर्मनी के खेल की लय तोड़ सकती है. पर इसके लिए मौकों को गंवाने से बचना भी ज़रूरी होगा. बेल्जियम के ख़िलाफ़ भी भारत ने यदि मिले मौकों को भुना लिया होता तो मैच की तस्वीर बदल भी सकती थी.

ओवरऑल रिकॉर्ड जर्मनी का बेहतर

भारत और जर्मनी के बीच खेले गए मैचों के रिकॉर्ड पर नजर डालें तो जर्मनी हमसे बेहतर स्थिति में है. दोनों के बीच अब तक खेले गए 100 मुक़ाबलों में से 20 को ही भारत जीत सका है और वह 53 हारा है और 27 मैच ड्रॉ रहे हैं.

पर ओलंपिक जैसे खेलों में इस तरह के आंकड़ों के कोई मायने नहीं होते हैं. इन खेलों की शुरुआत में हुए तैयारी मैच में भी भारत हार गया था. लेकिन इसके बाद भारत ने ग्रुप मैचों में पिछले कुछ दशकों का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करके यह जताया है कि उनमें किसी को भी फ़तह करने की क्षमता है. पर इसके लिए उसे जर्मनी के स्टार फारवर्ड फ्लोरियन फुक्स की अगुआई वाली फारवर्ड लाइन पर लगाम लगाकर रखनी होगी.

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